सनसनीखेज खबरों के बजाय उम्मीद, उपचार और संघर्ष से उबरने की कहानियां सामने लाए मीडिया; बच्चों की पहचान और गरिमा की रक्षा जरूरी
एशिया टाइम्स | विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली, 2 नवंबर 2026। बच्चों और किशोरों में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों तथा आत्महत्या की घटनाओं के बीच मीडिया की भूमिका को लेकर यूनिसेफ इंडिया ने सोमवार को नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण गोलमेज बैठक आयोजित की। इसमें वरिष्ठ पत्रकारों, मीडिया संस्थानों के संपादकों, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का व्यक्तिगत अनुभव रखने वाले युवाओं ने हिस्सा लिया।
बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग केवल घटनाओं की जानकारी देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसके माध्यम से समाज में जागरूकता, संवेदनशीलता और सहायता प्राप्त करने का सकारात्मक वातावरण भी तैयार किया जाना चाहिए।
‘शब्दों का महत्व: बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े स्टिग्मा को कम करने और आत्महत्या रोकथाम के लिए जिम्मेदार मीडिया रिपोर्टिंग’ शीर्षक से आयोजित इस गोलमेज बैठक में मीडिया से अपील की गई कि वह सनसनीखेज सुर्खियों और नकारात्मक रूढ़ियों से आगे बढ़कर ऐसी पत्रकारिता को बढ़ावा दे जो उपचार, स्वस्थ होने की प्रक्रिया, संघर्ष से उबरने और उम्मीद की कहानियों को सामने लाए।
मानसिक स्वास्थ्य बच्चों के अधिकारों का महत्वपूर्ण हिस्सा: जेस्पर मोलर
यूनिसेफ के उप-प्रतिनिधि (कार्यक्रम) जेस्पर मोलर ने अपने उद्घाटन संबोधन में मानसिक स्वास्थ्य को बच्चों के अधिकारों और उनके समग्र विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया।
उन्होंने कहा, “मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक सुख-समृद्धि बच्चों के अधिकारों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मानसिक स्वास्थ्य इस बात पर गहरा प्रभाव डालता है कि बच्चे कैसा महसूस करते हैं, कैसे सीखते हैं, सार्थक संबंध कैसे बनाते हैं और अपने जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में कैसे भाग लेते हैं। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े स्टिग्मा के कारण कई बच्चे और किशोर सहायता लेने में संकोच करते हैं।”
मोलर ने मीडिया से सकारात्मक भूमिका निभाने का आह्वान करते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में समझ और विश्वास पैदा करने वाला सार्वजनिक संवाद जरूरी है।
उन्होंने कहा, “स्टिग्मा को कम करने के लिए ऐसा सार्वजनिक संवाद आवश्यक है जो मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को लेकर समझ और विश्वास बढ़ाए। मीडिया सहयोगपूर्ण वातावरण बनाने, भेदभाव कम करने और उपचार तक पहुंच को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि यूनिसेफ प्रत्येक बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक कल्याण के अधिकार को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
दुनिया का हर सातवां किशोर मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में 10 से 19 वर्ष की आयु के प्रत्येक सात में से एक किशोर किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या का सामना कर रहा है। इनमें से बड़ी संख्या में समस्याओं की समय रहते पहचान नहीं हो पाती और प्रभावित बच्चों को आवश्यक उपचार भी नहीं मिल पाता।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी आधी समस्याओं की शुरुआत 14 वर्ष की आयु तक हो जाती है। ऐसे में शुरुआती पहचान, परामर्श और उपचार बच्चों के भविष्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य उपचार की कमी बड़ी चुनौती
भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के सामने सामाजिक कलंक और उपचार सेवाओं तक सीमित पहुंच बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार, मानसिक विकारों के उपचार में 84.5 प्रतिशत का अंतर पाया गया था। यह स्थिति मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और आम लोगों में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
NCRB के आंकड़े: आत्महत्या से 1.70 लाख से अधिक मौतें
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट ‘भारत में आकस्मिक मृत्यु एवं आत्महत्या 2024’ के अनुसार, देश में आत्महत्या से 1,70,746 मौतें दर्ज की गईं। इनमें 14,488 छात्र और 18 वर्ष से कम आयु के 11,184 बच्चे शामिल थे।
ये आंकड़े बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता दर्शाते हैं। हालांकि, पुलिस रिकॉर्ड पर आधारित आंकड़े आत्महत्या के पीछे मौजूद मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करते।
बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि किसी आत्महत्या को किसी एक घटना, व्यक्ति या परिस्थिति से जोड़कर प्रस्तुत करना उचित नहीं है। पत्रकारिता में व्यापक संदर्भ, सावधानी और तथ्यात्मकता आवश्यक है।
‘जिम्मेदार रिपोर्टिंग केवल यह नहीं कि क्या न लिखें, बल्कि यह भी कि क्या शामिल करें’
गोलमेज बैठक में पत्रकारों और विशेषज्ञों ने इस बात पर विचार किया कि समाचार कक्ष मौजूदा मीडिया दिशानिर्देशों को किस प्रकार लागू कर सकते हैं और आत्महत्या से संबंधित खबरों में नैतिक मानकों का पालन कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं।
समूह चर्चा में सामने आए प्रमुख निष्कर्षों में एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि जिम्मेदार रिपोर्टिंग केवल उन चीजों तक सीमित नहीं है जिनसे पत्रकारों को बचना चाहिए, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि वे अपनी खबरों में किन बातों को जगह देते हैं।
प्रतिभागियों ने कहा कि सनसनीखेज सुर्खियों और किसी समस्या के लिए एकमात्र कारण तलाशने वाली रिपोर्टिंग के बजाय ऐसी कहानियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो संदर्भ, मानवीय गरिमा और उम्मीद प्रदान करती हों।
चर्चा में बच्चों की पहचान सुरक्षित रखने, सटीक और निष्पक्ष भाषा अपनाने, विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म पर हेल्पलाइन और सहायता सेवाओं की जानकारी देने तथा प्रभावित लोगों को केवल उनके संकट के क्षणों तक सीमित करके प्रस्तुत न करने पर सहमति बनी।
मानसिक स्वास्थ्य की रिपोर्टिंग आत्महत्या की घटनाओं तक सीमित न रहे
यूनिसेफ इंडिया के क्रिटिकल एप्रेजल स्किल्स (CAS) कार्यक्रम के मार्गदर्शकों ने जोर दिया कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी पत्रकारिता का दायरा आत्महत्या की घटनाओं से कहीं अधिक व्यापक होना चाहिए।
इसमें गरीबी, पारिवारिक परिस्थितियां, दिव्यांगता, जलवायु संबंधी आपदाएं, स्कूल का वातावरण, शैक्षणिक दबाव और मानसिक स्वास्थ्य सहायता सेवाओं तक पहुंच जैसे विषयों की भी पड़ताल होनी चाहिए।
चर्चा में यह भी रेखांकित किया गया कि उपचार से स्वस्थ होने की प्रक्रिया, चुनौतियों से उबरने की क्षमता और सहायता प्राप्त करने के रास्तों से जुड़ी कहानियां मीडिया के लिए महत्वपूर्ण अवसर हैं।
ऐसी रिपोर्टिंग से मदद मांगने को कमजोरी या शर्मिंदगी के बजाय एक सामान्य और सकारात्मक कदम के रूप में स्थापित करने में मदद मिल सकती है।
सरकार की योजनाएं और सहायता के उपलब्ध माध्यम
भारत में बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को समर्थन देने के लिए कई सरकारी कार्यक्रम और संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इनमें प्रमुख रूप से राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK), आयुष्मान भारत स्कूल स्वास्थ्य एवं कल्याण कार्यक्रम और किशोर-अनुकूल स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परामर्श और सहायता के लिए टेली-मानस (Tele-MANAS) जैसी डिजिटल सेवाएं भी उपलब्ध हैं।
यूनिसेफ भारत सरकार के मिशन वात्सल्य, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम और आयुष्मान भारत स्कूल स्वास्थ्य एवं कल्याण कार्यक्रम जैसी पहलों के माध्यम से किशोरों के अनुकूल मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने और जागरूकता को प्रोत्साहित करने में सहयोग कर रहा है।
12 से 14 नवंबर तक दिल्ली में वैश्विक सम्मेलन
यूनिसेफ की यह मीडिया गोलमेज बैठक 12 से 14 नवंबर 2026 तक नई दिल्ली में आयोजित होने वाले वैश्विक सम्मेलन ‘टुगेदर अगेंस्ट स्टिग्मा 2026’ की तैयारी के हिस्से के रूप में आयोजित की गई।
विश्व मनोचिकित्सा संघ (World Psychiatric Association) के इस वैश्विक सम्मेलन में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, मीडिया संस्थानों और सामुदायिक संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच संवाद होगा।
इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक कलंक को चुनौती देना, प्रमाण-आधारित जानकारी को बढ़ावा देना और विशेष रूप से बच्चों तथा युवाओं के लिए उपचार एवं सहायता सेवाओं तक पहुंच बेहतर बनाने के उपाय तलाशना है।
मीडिया के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल
डिजिटल मीडिया और सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म के विस्तार ने खबरों की पहुंच और प्रभाव दोनों को बढ़ा दिया है। आज किसी संवेदनशील खबर का असर कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। ऐसे में पत्रकारों, संपादकों और डिजिटल कंटेंट निर्माताओं की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है।
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी खबरों में इस्तेमाल किए गए शब्द, तस्वीरें और सुर्खियां प्रभावित बच्चों, किशोरों तथा उनके परिवारों पर गहरा असर डाल सकती हैं।
यूनिसेफ की इस पहल ने मीडिया के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखा है कि क्या मानसिक स्वास्थ्य की पत्रकारिता केवल आत्महत्या और त्रासदी की खबरों तक सीमित रहेगी या फिर वह उपचार, सामाजिक परिस्थितियों, सहायता सेवाओं और जीवन में दोबारा आगे बढ़ने की संभावनाओं को भी पर्याप्त जगह देगी?
आत्महत्या की घटना की रिपोर्टिंग करना पत्रकारिता का एक हिस्सा है, लेकिन आत्महत्या रोकथाम के प्रति जागरूकता पैदा करना, मदद के रास्ते बताना और उम्मीद को जीवित रखना भी मीडिया की सामाजिक जिम्मेदारी है।
स्रोत: यूनिसेफ इंडिया की प्रेस विज्ञप्ति, 2 नवंबर 2026।
