By : Advocate Karan Shankar Mani
हमारे पूर्वजों ने कहा था ”धर्मो रक्षति रक्षित”अर्थात् जो न्याय और सत्य की रक्षा करता है, कानून और सत्य भी उसकी रक्षा करते हैं। एक अधिवक्ता के रूप में हमारा जीवन विरोधाभासों और एक निरंतर चलने वाले आंतरिक संघर्ष (अंतर्द्वंद्व) से भरा होता है। कानून की चौखट पर खड़े होकर हम रोज इस कशमकश को झेलते हैं—कभी हम किसी के पक्ष में खड़े होते हैं, तो कभी किसी के खिलाफ।
कई बार मन के किसी कोने में यह सवाल कौंधता है कि क्या मेरे किसी कदम से जाने-अनजाने किसी के साथ अन्याय तो नहीं हो रहा? क्या मैं अपने मुवक्किल (Client) को सही समय पर न्याय दिला पा रहा हूँ?? लेकिन इस तमाम मानसिक उथल-पुथल और अंतर्द्वंद्व के बीच, हमारे भीतर एक अटूट और अटूट विश्वास हमेशा जीवित रहता है— “यह कि हम न्यायालय की शरण में हैं, और जब तक यह अदालतें मौजूद हैं, तब तक हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा होगी और न्याय की जीत होगी।”
29 और 30 अक्टूबर 2026 को पटियाला हाउस न्यायालय, नई दिल्ली में दो अलग-अलग मामलों (FIR संख्या 00035/2026, थाना स्पेशल सेल (IFSO) और (FIR संख्या 0074/2026 )में आए न्यायिक आदेश इस पेशे की इसी विशेषता को सामने लाते हैं।
पहले मामले में लगभग 85 लाख रुपये की कथित ऑनलाइन निवेश धोखाधड़ी के प्रकरण में हमलोगों ने (एडवोकेट विकास कुमार और एडवोकेट करण शंकर मणि) शिकायतकर्ता की ओर से पैरवी की। अभियुक्त की जमानत का विरोध किया गया और न्यायालय ने जमानत याचिका खारिज कर दी
अगले ही दिन, दूसरे मामले में लगभग 3.32 करोड़ रुपये की कथित ऑनलाइन निवेश धोखाधड़ी से जुड़े प्रकरण में इन्हीं हमने अभियुक्त की ओर से पैरवी की। शिकायतकर्ता को संबंधित खाते में प्राप्त 4.90 लाख रुपये वापस किए जाने, जांच में सहयोग और शिकायतकर्ता के प्रतिनिधि की अनापत्ति सहित अन्य परिस्थितियों पर विचार करते हुए न्यायालय ने अग्रिम जमानत प्रदान कर दी
दो दिन, दो मुकदमे और दो अलग-अलग भूमिकाएँ और यही अधिवक्ता के जीवन का सबसे बड़ा अंतर्द्वंद्व है। कभी वह किसी पीड़ित की आवाज बनता है, तो कभी किसी अभियुक्त के कानूनी अधिकारों की ढाल। कभी स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा होता है, तो कभी जमानत के विरोध में अपनी दलीलें रखता है लेकिन इसमें विरोधाभास नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की खूबसूरती है क्योंकि अधिवक्ता का धर्म किसी को दोषी या निर्दोष घोषित करना नहीं, बल्कि कानून और तथ्यों के आधार पर अपने पक्ष को न्यायालय के समक्ष ईमानदारी से प्रस्तुत करना है।
अंततोगत्वा बड़े भाई और वरिष्ठ अधिवक्ता Vikash Sikarwar के मेहनत,लगन और समर्पण के कारण हमें दोनों मामले में सफलता मिली लेकिन इस सफलता से भी अधिक प्रेरणादायक मुझे बड़ें भाई और अपने साथी अधिवक्ता श्री विकास कुमार के इन शब्दों से मिली —इस पेशे की असली पहचान केवल जीत नहीं, बल्कि अध्ययन, ईमानदारी, निर्भीकता और अपने दायित्व के प्रति निष्ठा है
समाज को भी समझना होगा कि जमानत मिलना निर्दोष होने का अंतिम प्रमाण नहीं और जमानत खारिज होना दोष सिद्ध होने का अंतिम निर्णय नहीं। न्याय का उद्देश्य पीड़ित को न्याय दिलाना और प्रत्येक व्यक्ति के कानूनी अधिकारों की रक्षा करना, दोनों है।
एक अधिवक्ता की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि उसने कितने मुकदमे जीते, बल्कि यह है कि उसने कितनी ईमानदारी से न्याय की आवाज को बुलंद किया।
अंततः उसकी भूमिका बदल सकती है, पक्ष बदल सकता है, लेकिन उसके हृदय में न्याय के प्रति विश्वास नहीं बदलना चाहिए क्योंकि अधिवक्ता कभी किसी की उम्मीद, कभी किसी के अधिकारों का प्रहरी और हमेशा न्याय की चौखट पर खड़ा एक ऐसा व्यक्ति है, जिसका अंतिम विश्वास यही है—न्याय होना चाहिए और न्याय पर समाज का विश्वास बना रहना चाहिए।
एक अधिवक्ता की कलम से
