कोई बंदूक़, कोई तलवार, कोई ज़बान से लड़ता है… 

Asia Times Desk

डॉ. यामीन अंसारी 
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अहिंसा का अपना दर्शन पेश किया तो लोग हैरान थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर इतना बड़ा आंदोलन और इतनी बड़ी लड़ाई अहिंसा के दर्शन पर चल कर कैसे जीती जा सकती है। लेकिन महात्मा गांधी ने न केवल इस दर्शन का पालन किया, बल्कि दुनिया ने देखा कि एक दुबले पतले से व्यक्ति ने किस तरह दुश्मनों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। गांधी जी ने अहिंसा के दर्शन के साथ स्वतंत्रता आंदोलन शुरू किया तो शायद बहुत कम लोगों को विश्वास हो था कि यह आंदोलन सफल हो सकता है, लेकिन आज दुनिया का एक बड़ा तबका गांधीजी की महानता को सलाम करने के साथ उनके सार्वभौमिक सिद्धांतों को अपना भी रहा है। अगरचे दुर्भाग्यवश गांधी ही के देश में न केवल गांधी के सिद्धांतों और आदर्शों को तोड़ा जा रहा है, बल्कि उनके व्यक्तित्व को मलिया-मेट करने की कोशिश भी की जा रही है।
शायद किसी शायर ने गांधी के दर्शन से प्रभावित होकर यह शेर कहा हे؎
कोई बंदूक़, कोई तलवार, कोई ज़बान से लड़ता है 
कमाल का शख़्स है, खाली हाथ हर तूफान से लड़ता है 
गांधीजी ने पूरी दुनिया को बता दिया कि युद्ध, हिंसा, इंतक़ाम, या रक्तपात किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि अहिंसा के रास्ते पर चल कर भी अपने उद्देश्य और गंतव्य को प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन आज गांधी जी के मार्ग को छोड़ कर कुछ लोग समझते हैं कि बंदूक या हिंसा के द्वारा अपनी मंज़िल को पाया जा सकता है। जम्मू-कश्मीर के हालात भी इसी ओर इशारा करते हैं। लगभग तीन दशकों से हाथों में बंदूक उठाए और गोला बारूद को अपनी किस्मत बना लेने वालों को जान-माल के नुकसान के सिवा क्या हासिल हुआ? वह क्यों नहीं समझते कि दुनिया के किसी भी क्षेत्र में युद्ध और रक्तपात के ज़रिए कोई भी अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाया है।
वहीं दूसरी ओर भी ‘इंतक़ाम’ या ‘बदला’ के नाम पर जो माहौल तैयार किया जा रहा है इससे तबाही व बर्बादी और रक्तपात के कुछ नहीं होने वाला है। ना जाने क्यों गांधीजी के अहिंसा के रास्ते को छोड़कर युद्ध का जुनून पैदा करने की कोशिश की जा रही हे। पुलवामा हमले के बाद देश भर में एक विशेष वर्ग द्वारा जो माहौल बनाया जा रहा है वह संदेह के बादलों को गहरा कर देता है। एक ओर जहां पूरा देश एकता और एकजुटता का प्रदर्शन कर रहा है, एक दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर चलने का ऐलान कर रहा है, शहीद जवानों के परिजनों को हौसला देने का प्रयास कर रहा है, उनके के ग़म को हलका करने में मदद कर रहा है, पर यह विशेष वर्ग अपने हितों की खातिर देश के ताने-बाने को बिखेरने के प्रयासों में व्यस्त है।
हमें इस समय बंदूक, तलवार और ज़बान से नहीं लड़ना है, बल्कि गांधी की तरह खाली हाथ बहुत सूझबूझ के साथ तूफान का सामना करना है, आखिर यह कैसे संभव है कि हम अपने ही नागरिकों को निशाना बनाकर, अपने ही लोगों को दुश्मन या ग़द्दार ठहराकर, शांति की बात करने वाले पत्रकारों व अन्य लोगों को मौखिक हिंसा का शिकार बनाकर, मारकाट तक की धमकी देकर दुश्मन से कैसे मुक़ाबला कर सकते हैं? सोशल मीडिया पर अमन पसंद लोगों के खिलाफ होने वाला आक्रमण बताता है कि सत्तारूढ़ वर्ग की ओर से पिछले पांच वर्षों के दौरान देश के युवाओं की जो मनोस्थिति बनाई गई है, उसका खामियाजा हमारा दुश्मन नहीं, बल्कि इस देश के नागरिक ही भुगत रहे हैं।
पुलवामा में अपनी जानों का नज़राना पेश करने वाले जवानों की शहादत को ताक पर रखकर शासक अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं और उनके समर्थक अपने ही देश के लोगों पर हमले कर रहे हैं। ये लोग आखिरकार इस देश को किस राह पर ले जाना चाहते हैं? इन्होंने अपनी आँखों पर पर्दा क्यों डाल लिया है? क्या उन्हें मुस्लिम आबादी, मदरसों, मस्जिदों, खानक़ाहों और मुस्लिम संगठनों की ओर से आतंकवाद के खिलाफ बुलंद होने वाली आवाज क्यों सुनाई नहीं देती? पुलवामा हमले के बाद उर्दू अखबारों को उठाकर क्यों नहीं देखते कि जिस वर्ग को वह संदेह की नजर से देख रहे हैं, उसे निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वह वर्ग पुलवामा घटना, आतंकवाद और दुश्मनों के खिलाफ कितना आक्रोश में है। उर्दू अख़बारों का उल्लेख इसलिए किया क्योंकि हिंदी और अंग्रेजी मीडिया, विशेषकर समाचार चैनलों से मुसलमानों की सकारात्मक गतिविधियों के प्रसारण की क्या उम्मीद की जाए? हाँ, अगर कोई नकारात्मक ख़बर हो तो निश्चित रूप से वह उनका शीर्षक बन सकती है। अगर समय रहते हमने होश के नाखून नहीं लिए तो यह सब हमारी बर्बादी का कारण बन सकता है।
जहां तक कश्मीर में रक्तपात का सवाल है तो न तो हथियार उठाने वाले कश्मीरी नोजवानों को इतने बरस बाद भी कुछ मिला है और न ही उनका इस्तेमाल करने वालों को, और वह जिस रास्ते पर चल रहे हैं, शायद ही कभी प्राप्त हो। फिर भी इन युवाओं को मौत के मुंह में डाला जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ समय के दौरान आतंकवादी संगठनों ने स्थानीय कश्मीरी युवकों की भर्ती तेज कर दी है। खास तौर पर 2016 के बाद इस में काफी तेजी आई है। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल घाटी में 191 स्थानीय युवा विभिन्न आतंकवादी संगठनों से जुड़े। 2017 में इन युवाओं की संख्या 126 दर्ज की गई थी। हालात पर नज़र रखने वाले लोगों के अनुसार यह धारणा भी समाप्त हो गई है कि गरीब और कम पढ़े लिखे युवा आतंकवादी संगठनों में शामिल हो रहे हैं। क्यों कि अब तो उच्च शिक्षित और समृद्ध घरों से संबंधित नौजवान भी इनमें शामिल हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर किस आधार पर वह प्रभावित होते हैं और ऐसा क्यों कर रहे हैं? एक फिदायीन और आतंकवादी को वह क्यों अपना हीरो मानते हैं? इस पर हम सबको विचार करने की जरूरत हौ। इन्ही कश्मीरियों में से कोई नज़ीर अहमद वानी बनता है तो इन्हीं कश्मीरियों में से भटक कर कोई बुरहान वानी बन जाता है। कश्मीर के नौजवानों के भटकने के बहुत सारे कारण हो सकते हैं, जिन्हें रोकने के लिए गंभीर कोशिशें होना चाहिए। इसमें राज्य के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे को मजबूत बनाने और आर्थिक विकास को नया रूप देने की सख्त ज़रूरत है। हम देखते हैं कि निराशा के शिकार कश्मीरी युवकों के पास राज्य में न तो अपना कैरियर बनाने के बहुत अवसर हैं और न ही कश्मीर से बाहर देश के अन्य भागों में उन्हें अपना भविष्य उज्ज्वल नजर आता है। सरहद पार से आतंकवाद के कारण शिक्षा, खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियों में उनकी ऊर्जा का उपयुक्त और रचनात्मक उपयोग नहीं हो पाता है। लिहज़ा जैसे भी हो, आम कश्मीरी युवाओं को यह एहसास दिलाना होगा कि हम उन्हें अपना मानते हैं और यह पूरा देश उनका अपना घर है। भटके हुए कश्मीरी युवाओं को भी समझना होगा कि हिंसा और ताक़त के ज़रिए आज तक दुनिया की कोई भी समस्या हल नहीं हुई है। शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज को उठाया जा सकता है। बेहतर होगा कि वह हिंसा का रास्ता छोड़कर बातचीत का रास्ता अपनाएं।
दूसरी ओर पुलवामा हमले के बाद महज़ चार दिन के बाद ही जिले में एक और खूनी मुठभेड़ हो गई और इसमें हुए जान व माल के नुक़सान से साबित होता है कि यहां आतंकवाद की जड़ें काफी मजबूत हैं। हमारी सरकार और नीति निर्माता यह सुनिश्चित करने में विफल रहे हैं कि हमारा जानी नुकसान कम से कम हो। अब तो हमारे ख़ुफिया तंत्र की विफलता पर भी सवाल उठ रहे हैं। पांच फरवरी को संसद में खुद ग्रह राज्य मंत्री ने आश्चर्यजनक आंकड़े पेश किए, जिसमें बताया गया कि कश्मीर में 2014 से 2018 के बीच शहीद जवानों की संख्या 94 प्रतिशत तक बढ़ गई है और आतंकवादी हमलों में तो 177 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
बकौल साहिर लुधियानवी؎
ए शरीफ इंसानों, जंग टलती रहे तो बेहतर है 
आप और हम सभी के आँगन में, शमा जलती रहे तो बेहतर है

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