तेज बहादुर वाराणसी के चुनावी रण से क्यों बाहर हुए

Awais Ahmad

सेना से बर्खास्त तेज बहादुर का जब बनारस की लोकसभा सीट से नामांकन रद्द हुआ तो वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और चुनाव आयोग के फैसले को रद्द करने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग के फैसले के सही माना और तेज बहादुर की अर्ज़ी को खारिज कर दिया।

तेज बहादुर के नामांकन के रद्द होने पर बहुत से लोग इसको एक सैनिक का अपमान के तौर पर देखने लगे क्योंकि तेज बहादुर बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव में चुनौती दे रहे थे। और सोशल मीडिया से लेकर खुद तेज बहादुर इनको ‘असली चौकीदार बनाम नक़ली चौकीदार’ की तरह पेश करने लगे। सोशल मीडिया पर तरह तरह की बातें होने लगी कि पीएम मोदी तेज बहादुर से डर गए इसलिए चुनाव आयोग ने तेज बहादुर का नामांकन रद्द कर दिया।

सोशल मीडिया की बहुत बात हो गई अब आते है मुद्दे पर की तेज बहादुर का नामांकन क्यों रद्द हुआ। इससे पहले आपको तेज बहादुर की उस अर्ज़ी के बारे में बता देते है जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी।

तेज बहादुर ने अपनी अर्ज़ी में कहा था कि रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका नामांकन उस पेपर के खतिर रद्द किया जिसकी ज़रूरत ही नही थी। तेज बहादुर ने अपनी अर्ज़ी में यह भी लिखा था कि चुनाव आयोग का निर्णय भेदभावपूर्ण और आतर्किक है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।

यहां तक तो लग रहा है तेज बहादुर जो कह रहे है वह सही है। सच में चुनाव आयोग ने तेज बहादुर का नामांकन जानबूझ कर रद्द किया क्यों कि वह पीएम मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे।

अब आपको यह बताते है कि तेज बहादुर की सेना से बर्खस्तगी क्यों हुई थी। तेज बहादुर यादव ने जवानों को दिए जाने वाले खाने के बारे शिकायत करते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। जिसके बाद 2017 में तेज बहादुर को सेना से बर्खास्त कर दिया गया था।

अब यह जानना भी ज़रूरी हो जाता है कि चुनाव आयोग ने तेज बहादुर का नामांकन क्यों रद्द किया। निर्वाचन अधिकारी ने तेज बहादुए यादव का नामांकन यह कहते हुए रद्द किया कि उसने वह प्रमाणपत्र जमा नही किया जिसमें यह स्पष्ट किया गया हो कि तेज बहादुर भ्र्ष्टाचार या विश्वासघात की वजह से बर्खास्त नही किया गया था।

अब यहां यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि चुनाव आयोग के कानून में ऐसे मामले में क्या कहता है। चुनाव कानून के मुताबिक सरकारी सेवा से भ्र्ष्टाचार या देशद्रोह के आरोप में बर्खास्त शख्स को ही यह प्रमाणपत्र देना होता है। किसी और कारण से बर्खास्त शख्स को कोई प्रमाणपत्र नही देने की ज़रूरत नही होती है। तेज बहादुर अनुशासनहीनता की वजह से बर्खास्त हुआ था लेकिन उसे भ्र्ष्टाचार या देशद्रोह के आरोप में बर्खास्त उम्मीदवार से मांगे जाने व्ला प्रमाणपत्र मांगा गया और उसका नामांकन रद्द कर दिया गया।

यहां आपको लग रहा होगा की तेज बहादुर के साथ सच मे नाइंसाफी हुई और उसका नामांकन जानबूझ कर रद्द किया गया है। तो ऐसे में अब बात आपके लिए यह जानना ज़रूरी है कि तेज बहादुर का नामांकन असल में क्यों रद्द किया गया। इसके लिए आपको थोड़ा सा जनप्रतिनिधत्व कानून  1951के बारे में जानना होगा।

जनप्रतिनिधत्व कानून 1951 की धारा 33 की उपधारा 3 में लिखा हुआ है कि अगर कोई भी सरकारी नौकरी वाला आदमी नौकरी से बर्खास्त हुआ है और उसको बर्खास्त हुए 5 साल का अरसा नही बीत है तो वह शख्स चुनाव नही लड़ सकता है।ऐसे शख्स को 5 साल से पहले चुनाव लड़ने के लिए चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित एक विशेष फॉर्मेट में एक प्रमाणपत्र देना होगा की उसकी बर्खस्तगी भ्र्ष्टाचार या देशद्रोह के मामले में नही हुई है। मतलब किसी अन्य आरोपी में बर्खस्तगी हुई है तो भी नामांकन के पर्चे के साथ वह प्रमाणपत्र लगाना अनिवार्य है। तेज बहादुर की दलील थी किसकी बर्खस्तगी अनुशासनहीनता की वजह से हुई थी और उसने उसके लिए बर्खास्तगी वाला आदेश लगाया त।लेकिन कानून साफ कहता है कि चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित प्रारूप में ही प्रमाणपत्र देना होगा तभी आपका नामांकन पर्चा मान्य होगा।

तेज बहादुर ने रिटर्निंग ऑफिसर को वह प्रमाणपत्र नही दिया और रिटर्निंग ऑफिसर ने अपना कर्तव्य निभाते हुए तेज बहादुर का नामांकन रद्द कर दिया। अब आप बताइए क्या तेज बहादुर का नामांकन चुनाव आयोग ने जानबूझ कर रद्द किया या कानून का पालन करते हुए। हालांकि अगर ट्ज़ बहादुर ने वह प्रमाणपत्र दे दिया होता तो शायद उनका नामांकन रद्द नही हित और 19 मई को बनारस की जंग देखने में ज़्यादा मज़ा आता।

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