इंडिया का वेब जर्नलिज्म अभी किशोरावस्था में क़दम रख रहा है : रितु कपूर

इंडिया में इंटरनेट पर खबरों को नया अंदाज़ देने में क्विंट की महत्वपूर्ण भूमिका है

Ashraf Ali Bastavi

यह विशेष इंटरव्यू दिल्ली से ऑनलाइन प्रकाशित प्रतिष्टित न्यूज़ वेबसाइट www.thequint.com की Co – Founder रितु कपूर का है। रितु कपूर ने सी एन एन आई बी एन में लंबे समय तक सेवा की है, भारतीय मीडिया में आम जनता से सीधे संबंध स्थापित करने के लिए Citizen journalist की परिकल्पना पेश करने वाली रितु कपूर ही हैं। यही कारण है कि quint बहुत ही कम समय में वेब मीडिया में अपना स्थान बनाने में सफल रहा, कई प्रमुख ब्रेकिंग क्विंट के ही हिस्से में आयी , इंडिया में इंटरनेट पर खबरों को नया अंदाज़ देने में क्विंट की महत्वपूर्ण भूमिका है ,अपनी इसी कामयाब कोशिश के लिए क्विंट को कई अवार्ड्स भी मिले है। वास्तव में वरिष्ठ पत्रकार राघव बहल और उनकी पत्नी रितु कपूर का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से निकलकर वेब मीडिया में कदम रखना एक बड़ा फैसला साबित हुआ और इन्हों ने वेब पत्रकारिता को एक नई राह दिखाई है। वेब जर्नलिज्म में क्विंट के इस सफल प्रयास को सामने लाने के लिए अशरफ अली बस्तवी ने एशिया टाइम्स के लिए रितु कपूर से यह विशेष इंटरव्यू किया और यह जानने की कोशिश की कि इंडिया का वेब जर्नलिज्म अभी किस चरण में है, विश्व स्तर पर किस मुकाम पर है ? उसके सामने कौनसी चुनौतियां हैं और इसका भविष्य क्या है ? इस क्षेत्र में कदम रखने वालों के लिए क्या मार्गदर्शन है ।

प्रश्न: पहले हिस्ट्री चैनल में प्रोग्रामिंग हेड, फिर सीएनएन आईबीएन में फीचर एडिटर ,citizen journalist का आइडिया देने के साथ साथ आपने पत्रकारिता के मैदान में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं और अब न्यूज़ वेबसाइट www.thequint.com लॉन्च किया है ये बताएँ कि आप पत्रकारिता कब और कैसे शुरू किया?

उत्तर: यह अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि जब में जामिया मिलिया इस्लामिया से एमए मास काम कर रही थी तो उस समय बच्चों के लिए कार्यक्रम बनाना चाहती थी यह उस समय की बात है जब कार्टून नेटवर्क नहीं थे। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि आप किसी इरादे से निकलते हैं और हालात कुछ ऐसे बनते चले जाते हैं कि फिर वही आगे चलकर आप के भविष्य की दिशा तय कर देते हैं, मैं कई साल तक फीचर के क्षेत्र में ही रही लाइफ स्टाइल, स्वास्थ्य, पर काम करती रही लेकिन इसके साथ साथ मैं सामाजिक मुद्दों से हमेशा जुडी रही । जब हम कुछ देखें, कुछ पढ़ें और उसके बारे में कुछ न करें तो एक अजीब सी बेचैनी पैदा होती है।इसी फ़िक्र ने मुझे फीचर जर्नलिज्म से सिटीजन जर्नलिस्ट की ओर प्रेरित किया, तो फिर मैंने सिटीजन जर्नलिस्ट का कार्यक्रम शुरू किया, लेकिन अब सिटीज़न जर्नलिस्ट कार्यक्रम बनाने की जरूरत नहीं रही। क्योंकि आज के हर नागरिक को अपनी आवाज उठाने के इतने प्लेट फार्म मिल गए हैं कि अब उन्हें इस बात का इंतजार नहीं रह गया है कि कोई उनकी बात को पहुंचा जाए।कम से कम शहरी हिंदुस्तान में अब यह बात नहीं रह गई है की आम आदमी की आवाज दबाइ जा सके और अब तो ग्रामीण क्षेत्रों से भी आवाज उठनी शुरू हो चुकी है। भारत की जनता अब अपने ‘मन की बात कहने’ के लिए संकोच नहीं करती । देखें नोट बंदी पर लोग अपनी बात कैसे रख रहे हैं। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है मुझे हमेशा से लोगों की वास्तविक प्रतिकिर्या जानने में बड़ी दिलचसपी रही है। जिस तरह से आज आम आदमी जमीनी सच्चाइयों से वाकिफ है। हमें न्यूज़ रूम में बैठकर इसका सही अंदाज़ा हो ही नहीं सकता। कभी एक रिपोर्ट जाकर कर ली इससे हम सही मायने में जमीनी हालात को समझ ही नहीं सकते हैं।

नोएडा स्थित क्विंट के न्यूज़ रूम में रितु कपूर सिटीज़न जर्नलिस्ट ने हमारी बुलेटिन का rundown ही बदल दिया था । जाहिर सी बात है इस समय सोनभद्र में क्या हो रहा है अंग्रेजी न्यूज़ चैनल कभी वहां जाकर स्टोरी नहीं करते सिटीज़न जर्नलिस्ट ही इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।प्रश्न: बतौर महिला पत्रकार, पत्रकारिता के क्षेत्र में आप को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा ?उत्तर: पिछले 20 वर्षों में स्थिति काफी बदल गई है। 1991 में जब मैंने मीडिया में कदम रखा था तब सिर्फ दूरदर्शन था। एक लड़की होने के नाते मुझे काम करना बहुत मुश्किल लगता था, कई बार आउटडोर शूटिंग के लिए जाना पड़ता, जो काफी मुश्किलों भरा होता, कॉफी पीड़ादायक अनुभव रहे हैं। यह केवल मेरे ही नहीं बल्कि उस समय जो भी महिला इस क्षेत्र में आती थी उसे ऐसे हालात का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब हालात काफी बदल गए हैं लड़कियां मीडिया के क्षेत्र में आ रही हैं। लेकिन हां अब भी हिंदी मीडिया में वैसी तबदीली नहीं सुनाई पड़ती।इसका असर यह हुआ है कि महिला जर्नलिस्ट अब अपने ‘मन की बात’ करती हैं उन्हें कोई रोक टोक नहीं है। मंज़रनामा अब काफी बदल गया है लेकिन एक बात अभी भी चुनौती बनी हुई है। महिलाओं की सेक्यूरिटी को खतरा आज भी रहता हैं, लेडी जर्नलिस्ट के लिए लेट नाइट जर्नलिज्म थोड़ा मुश्किल हो जाता है।

 

प्रश्न: एक महिला को प्रोफेशन और घर दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने में क्या समस्याएं पेश आती हैं, आप इन चुनौतियों का कैसे मुकाबला करती हैं ?

उत्तर: एक काम काजी महिला को हमेशा एक तरह के guilt के एहसास से जूझते रहना पड़ता है। जब आप ऑफिस में काम पर होते हैं घर के काम काज और बच्चों की देखभाल को लेकर ऐसा एहसास बना रहता है। घर से कार्यालय पहुंच कर सब कुछ भूल जाने का जो मामला है इससे कभी कभी मुश्किल पैदा होती है. कई बार इसका असर बच्चों की परवरिश पर सीधे तौर पर पड़ता है। दरअसल पत्रकारिता और डॉक्टरी का प्रोफेशन कुछ घंटों का नहीं होता बल्कि यह तो चौबीस घंटे जारी रहता है।किसी भी प्रोफेशन में रहते हुए घरेलू जिम्मेदारियों को देखना एक महिला के लिए बड़ी चुनौती होती है। हमारी पीढ़ी इसी भावना से जूझ रही है लेकिन मुझे लगता है की अब ऐसा महसूस करने की जरूरत नहीं है। कभी कभी हमारे समाज की सोच को भी इस guilt के पनपने में बड़ा रोल होता है। ऐसे में यह जरूरी है कि समाज का सहयोग प्राप्त हो ताकि ऐसी पेशेवर महिलाओं को किसी तरह के नेगेटिव बोध से न जूझना पड़े।एक पत्रकार होने के नाते मैं यह अच्छी तरह समझ सकती हूँ कि जो महिलाएं किसी प्रोफेशन में होती हैं वे वास्तव में विशेष योग्यता वाली होती हैं क्योंकि एक साथ दोनों मोर्चे को संभालना आसान नहीं होता बहुत मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। इस मामले में सबसे अच्छा मुझे भारत का संयुक्त परिवार लगा, उसकी अपनी अलग खासियत है। मैं बहुत संतुष्ट हूँ खुद मेरी माँ और मेरी सास इतना कुछ संभालती हैं कि मुझे यहाँ आकर कोई फ़िक्र नहीं होती, लेकिन यह सभी को हासिल नहीं होता है इसलिए जरूरी है कि एक दूसरे की दुश्वारियों को समझें देखने में यह आया है कि अब काफी हद तक घर की जिम्मेदारियों को निभाने में पतियों की भागीदारी बढ़ी है।जब दोनों काम काजी हूँ तो सभी मामलों में बराबर की जिम्मेदारी निभानी चाहिए क्योंकि महिला भी कार्यालय में उतना ही काम करके घर जा रही है जितना कि एक पुरुष ने काम किया है । केकिन यह तबदीली बहुत आसान नहीं है, यह दरअसल एक माइंड सेट को बदलना है, मुझे तो लगता है कि अगर सभी माताएं अपने बेटों को बचपन से ही ऐसी शिक्षा दें तो यह बदलाव आसान होगा हमारे समाज में बेटों को यह बताया जाता है कि तुम स्पेशल हो जबकि बराबर का मामला किया जाना चाहिए।

प्रश्न: आप और आपके पति, दोनों क्विंट के फाउंडर हैं, कार्यालय के विभिन्न मामलों स्टोरी , कंटेंट और पालिसी तय करने में पेश आने वाले मतभेदों को कैसे दूर करते हैं ?

उत्तर: मुझे सभी मामलों में हस्तक्षेप का पूरा अधिकार है और मैं अपने अधिकार का भरपूर इस्तेमाल करती हूँ। हमारे बीच हमेशा संतुलन बरकरार रहता है लेकिन कुछ क्षेत्रों में राघव का अनुभव मुझसे कहीं अधिक है। क्विंट में हमारा दृष्टिकोण यह है कि समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों की पेशकश के तयशुदा पारंपरिक ढर्रे से हटकर हम अपने वेब रीडर्स के लिए अलग तरीके से खबरें पेश करें हमने पहले दिन से पत्रकारिता की पारंपरिक शैली को तोड़ने की कोशिश की है , क्विंट का रीडर 18 से 35 वर्ष की उम्र का है। हमारी पहली कोशिश यह समझने की होती है कि हमारा रीडर चीजों को कैसे देखता है, उसकी पसंद क्या है वह अपनी प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त करता है हम अपने रीडर की दिलचस्पी और जरूरत को प्राथमिकता देते हैं।किस बड़े नेता ने क्या कहा यह हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं है, हमारे लिए उस खबर का महत्व है जो हमारे रीडर्स से सीधे संबंध रखती हो। मेरा फोकस कभी राजनीतिक नहीं रहा है जेंडर, स्वास्थ्य और सामाजिक मुद्दों पर काम करती रही हूं। मुझे लगता है कि कटाक्ष की शैली में अपनी बात पहुँचाई जाए तो वह खबर इंटरनेट पर ज़्यादा तक जाती है। सोशल मीडिया पर अधिक से अधिक शेयर होती है अगर वही विषय सादे तरीके से पेश की जाए तो लोगों की दिलचसपी ज़रा कम होती है।

प्रश्न: हम देख रहे हैं कि quint ‘बहुत कम समय में अपनी खास पेशकश और खबरों के चयन के कारण काफी लोकप्रिय हुआ है ,आपके वीडियो काफी लोकप्रिय हो रहे हैं,quint ने डिजिटल मीडिया में नया ट्रेंड सेट करने में अहम रोल अदा क्या है, कई अवार्ड्स भी हासिल किए हैं, इस सफलता का श्रेय किसे जाता है?

उत्तर: हमारे यहाँ दो तीन सीनियर एडिटर ही स्टोरी तय नहीं करते बल्कि हमारे सभी वरिष्ठ और जूनियर पत्रकार, कैमरामैन, वीडियो एडिटर , ट्रेनी सभी को रोज़ सुबह हमें अपना अपना आइडिया भेजना होता है, चाहे वह 20 साल का कोई जूनियर हो या सीनियर हर सुबह मीटिंग में सभी मुद्दों पर हम चर्चा करते हैं, मुझे यह कहने में खुशी होती है कि क्विंट की पेशकश को नई शैली देने में हमारी युवा टीम की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नए जमाने की जरूरतों को वे हम से अच्छी तरह समझते हैं इसलिए बतौर वरिष्ठ हमारा काम जूनियर्स की बातें कान खोलकर सुनना और उस पर विचार करना होता है ताकि हम उनकी बताई गई चीजों को समझ पाएं।हमारे रिपोर्टरस यहाँ खुलकर अपनी राय रखते हैं, हम में से प्रत्येक किसी अपनी बात बेझिझक कह गुज़रता है, इसे बुरा नहीं माना जाता है, अपने विचारों को पेश करने की यही आज़ादी हमें कुछ अच्छा करने में मददगार साबित होती है। यहां कई दिमाग़ मिलकर काम करते हैं यही इसकी खूबसूरती है।हाँ क्विंट को इसकी अलग शैली की वजह से कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। क्विंट की सफलता का पूरा श्रेय क्विंट की पूरी टीम को जाता है हम एक अच्छी टीम सेलेक्ट करने में कामयाब रहे हैं, मीडिया में हम जब किसी का चयन करें तो हमें यह ध्यान देना चाहिए कि हम जिसका चयन कर रहे हैं उसके पास अपना नजरिया है कि नहीं दूसरे उसमे लिखने की क्षमता क्या है यानी आप अपने प्वाइंट ऑफ व्यू को अगर लिख नहीं सकते तो पत्रकारिता कैसे करेंगे। तीसरा, हर समय आप सब कुछ करने को तैयार हों,आप को मीडिया में सब कुछ करना पड़ सकता है आपने कभी कैमरा नहीं पकड़ा है लेकिन कल से शूटिंग पर जाना पड़ सकता है, आपसे ग्राफिक्स का काम लिया जा सकता है, आप को सोशल मीडिया की बारीकियों को भी समझना है।

प्रश्न: क्या वेब मीडिया भारत में अपना स्थान बना सका है, उसके सामने चुनौतियां क्या हैं इसका भविष्य क्या हैं, इस क्षेत्र में नए लोगों के लिए क्या मार्गदर्शन करेंगी भारत का वेब जर्नलिज्म अपने उम्र के किस पड़ाव पर है ?

उत्तर: कई बार यह सवाल मैं खुद से भी करती रहती हूँ मैंने जो कुछ देखा समझा है उसके आधार पर कह सकती हूं कि भारत का वेब जर्नलिज्म दुनिया के वेब जर्नलिज्म के कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है, टीवी चैनलों के एक दौर था जब हम सोचते थे कि विश्व के चैनल जिस ऊंचाई पर हैं हमें वहां तक पहुंचने में काफी समय लगेगा, टीवी पत्रकारिता में हमारे और दर्शकों के बीच एक तरह का गैप था जो वेब जर्नलिज्म में बिल्कुल भी नहीं है।भारत के संदर्भ में गौर करने की बात यह है कि अभी भी यहां मोबाइल फोन पर खबर पढ़ने वाले पाठक बहुत थोड़े हैं लेकिन बहुत तेजी से वेब पाठकों की संख्या बढ़ने वाली है हम कह सकते हैं कि वेब जर्नलिज्म के अच्छे दिन आने वाले हैं बड़ी चुनौती यह है कि आने वाले दिनों में वेब मीडिया रीडर तक पहुँच पाने के लिए तैयार है कि नहीं, यह बड़ी चुनौती है। बदलते जमाने के पाठक को क्या चाहिए और कैसे चाहिए यह भी देखना होगा।हम जब सीएनएन आईबीएन में थे तो हमारे दर्शकों 45 साल की उम्र से ऊपर की उम्र के लोग हुआ करते थे, लेकिन अब हमारा पाठक 18 से 35 साल की उम्र का है दुनिया के अन्य भागों की तुलना हमारे पाठक कई मायनों में अलग हैं यहां का समाज भाषा, संस्कृति और भौगोलिक एतबार से अलग है सभी को अलग अलग एड्रेस करना एक चुनौती है । भारत का वेब जर्नलिज्म अभी किशोरावस्था की दहलीज पर है, प्रिंट, टीवी और वेब के अपने अपने पाठक और दर्शक हर दौर में रहेंगे कोई ख़त्म नहीं होगा।नई पीढ़ी के लिए मेरे पास कुछ टिप्स हैं सोशल मीडिया के एक आम यूजर और जर्नलिस्ट में अंतर होना चाहिए। सोशल मीडिया फेसबुक ट्वीटर, WhatsApp पर आने वाली हर खबर तब तक खबर नहीं है जब तक आप खुद उसके तथ्य जांच न लें, मैं नई पीढ़ी में इस बात की थोड़ी कमी महसूस पाती हूँ जब तक तथ्य जाँच न लें और दोनों पक्षों का प्वाइंट ऑफ व्यू न ले लिया जाए खबर पूरी नहीं होती किसी भी पत्रकार के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हर हाल में इस पर कायम रहे मेरा यह भी मानना है कि आज के पाठक को सिर्फ तथ्य नहीं चाहिए बल्कि इसके साथ ही वह उस पर opinion भी चाहता है इसलिए खबर लिखते समय आप का अपना संपादकीय कमेंट भी हो, हाँ अगरआप किसी समाचार एजेंसी में काम कर रहे हैं तो केवल तथ्य ही काफी है।

प्रश्न: दी क्विंट की हिंदी और अंग्रेजी सेवा के अलावा क्या भविष्य में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी लाने का इरादा है ?

उत्तर: योजना तो है कि हम अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी काम करें लेकिन अभी हम हिंदी और इंग्लिश पर ही ध्यान दे रहे हैं विशेष रूप से हिन्दी का मैदान इतना व्यापक है कि हमें इसे ही काफी फोकस करना है। काम बढ़ा लेना और उस पर काबू न रख पाना मुनासिब नहीं है।

प्रश्न: मुस्लिम समाज की मेन स्ट्रीम मीडिया से शिकायत है कि उनसे संबंधित मामलों की अनदेखी की जाती हैं, या तो बहुत कम दिया जाता है या फिर नकारात्मक पहलू ज्यादा हावी रहता है, आपके यहाँ क्या स्थिति है?

उत्तर: यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी टीम कैसी है यह भौगोलिक, सामाजिक और क्षेत्रीय दृष्टि से टीम में सभी का प्रतिनधित्व होना बहुत जरूरी है जो व्यू पॉइंट छोटे स्थानों से आने वाले एक पत्रकार का होगा वह दिल्ली या मेट्रो सिटी में पले , बढे,पढ़े पत्रकार का नहीं होगा, ऐसे बहुत सारे ब्लॉगर और सिटीज़न जर्नलिस्ट हैं जो हमारे यहाँ स्थायी रूप से लिखते हैं जवाब हमारे नियमित कंट्रीब्यूटर हैं जो ग्राउंड से वास्तविक स्थिति रिपोर्ट करते हैं। हम उनको प्रोत्साहित करते हैं। मुझे लगता है प्रोमिनेन्ट मुस्लिम जरनलस्टों को आगे आना चाहिए ऐसा नहीं है कि पत्रकारिता के सारे रास्ते बंद हो गए हैं अब भी काफी स्पेस है हमारा अपना क्विंट , दी वायर , स्क्रॉल डॉट इन , आपका एशिया टाइम्स समेत और भी हैं जहां बात कहने के लिए पर्याप्त स्पेस है यह सब ऐसे संस्थान हैं जो बड़े कॉर्पोरेट या पॉलिटिकल लोगों की संपत्ति नहीं हैं,यहाँ पीछे से कोई आदेश नहीं आ रहा है अपने दम पर खुलकर पत्रकारिता कर रहे हैं। हिंदुत्व के जिस दौर में ध्रुवीकरण को प्रोत्साहित किया जा रहा हो, वहां यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि सही रिपोर्टिंग की जाए, अख़लाक़ के ही मामले को देख लें किसी और समय उसकी रिपोर्टिंग एकदम अलग हुई होती अब समय बदल रहा है। जिस तरह से गो रक्षक और गो रक्षा पर सवालिया निशान लगाया जा रहा है, जिस तरह से गोमांस के मुद्दे पर एक बड़ा प्रोटेस्ट दर्ज कराया जा राहा है, यह बड़ी बात है।

प्रश्न: वेब पत्रकारिता के लिए एक जर्नलिस्ट में किन क्षमताओं होना चाहिए, क्या पत्रकारिता के लिए अलग से कोर्स करना आवश्यक है?

उत्तर:मौजूदा दौर मल्टीमीडिया का है जरूरी नहीं कि आप के पास प्रोफेशनल कैमरा हो आप अपने मोबाइल फोन को कैसे कैमरे में बदल ले रहे हैं, अपनी स्टोरी में कैसे ग्राफिक्स का उपयोग कर सकते हैं। अपनी भाषा को आसान सबके समझ में आने वाली बनायें रीडर खुद करीब हो जायेगा जब हम टेलीविजन और प्रिंट मीडिया में थे तब हमारे रीडर से हमारा कोई नाता नहीं था हम यह सोचते थे कि हम सबसे अच्छा कर रहे हैं, लेकिन वेब जर्नलिज्म ने हमें इतना अच्छा सिखाया है कि हम जो लिखते हैं तुरंत कमेंट आने शुरू हो जाते हैं।बहुत कीमती कमेंट्स आते हैं। आप आज छत्तीसगढ़ के Bastar पर कुछ लिखें तो हो सकता है कि जो व्यक्ति इस क्षेत्र में रह चुका है आपकी कोई गलती निकाल दे, यह बहुत अच्छी बात है। हमारे पास खुद कई ऐसे कई अच्छे जर्नलिस्ट हैं जो स्नातक के बाद सीधे जर्नलिज्म में आए हैं। जर्नलिज्म का कोर्स भले ही न हो, आप में तथ्य का पता लगासकने की क्षमता होनी चाहिए , रोहतक में जाकर गो रक्षक से बात कर सकते हों सवाल पूछ सकते हों यही एक पत्रकार की असल योग्यता है पत्रकारिता के लिए कोई कोर्स आवश्यक नहीं है।

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