उर्दू को मुसलमान समझ कर नज़र अंदाज़ किया जा रहा है/कलीमुल हफ़ीज़ 

Asia Times Desk

देश में उर्दू ज़ुबान की बुरी हालत को सभी जानते हैं। उर्दू जु़बान के साथ सारी सरकारों का रवैया, चाहे वह केन्द्रीय सरकारें हों या राज्य की सरकारें, सोतेला रहा है।

उर्दू के नाम पर सरकारों ने एकेडमियां क़ायम कीं, उन्हें बजट भी अलाट किया, लेकिन इन ओहदों पर ऐसे लोग बिठाए गए, जो ख़ुद ही कुछ नहीं करना चाहते थे या करना नहीं जानते थे या उन को इख़्तियार ही हासिल नहीं थे। केन्द्रीय सरकार की निगरानी में राष्ट्रीय क़ौमी काउंसिल बराए फ़रोग़ उर्दू ज़ुबान दिल्ली में क़ायम है।

कलीमुल हफ़ीज़ 

जिस के तहत उर्दू जु़बान व अदब की किताबें प्रकाशित होती हैं, साहित्यकारों और कवियों की किताबें तआवुन के तौर पर ख़रीदी जाती हैं, सेमिनार, कान्फ्रेंसें और मुशाइरों के लिए राशियां दी जाती हैं इसके बावजूद बजट का अधिक्तर भाग वापस हो जाता है।

हर उस राज्य में जहां उर्दू बोलने वालों की एक बड़ी संख्या रहती है उर्दू एकेडमियां क़ायम हैं, मगर अधिक्तर उर्दू एकेडमियां बग़ैर चेयरमैन के जीवन बिता रही हैं।

जहां चेयरमैन हैं, वहां मेम्बर एक दूसरे की टांग खींचने में लगे हैं। इन संस्थाओं की मामूल की मीटिंगें भी समय पर नहीं होतीं।

यही परस्थिति सरकारी स्कूलों में उर्दू शिक्षा की है। उर्दू मीडियम स्कूलों का तो ज़िक्र छोड़िए वह तो कहानी बन चुकी है। उर्दू विषय का हाल ही बुरा है।

अधिक्तर स्कूलों में उर्दू शिक्षक नहीं हैं। कहीं उर्दू शिक्षकों से ज़बरदस्ती दूसरे विषय पढ़वाए जा रहे हैं। कहीं उर्दू पढ़ने वाले बच्चे साल भर उर्दू की किताबों से वंचित हैं। कभी-कभी तो परीक्षा में उर्दू के प्रश्न तक ग़ायब हो जाते हैं। बच्चों को मजबूरी में उर्दू की जगह दूसरा विषय लेना पड़ता है या बच्चों को उर्दू छोड़ने पर मजबूर किया जाता है।

उर्दू का यह हाल कम और ज़्यादा पूरे देश में है। उदाहरण के तौर पर हम दिल्ली का वर्णन करते हैं। दिल्ली जो देश की राजधानी है। जहां राज्य के स्तर पर पहले कांग्रेस और अब साढ़े चार वर्ष से आम आदमी की मज़बूत सरकार है।

दिल्ली जहां तमाम मुस्लिम जमाअतों और अन्जुमनों के आफ़िस हैं, जहां उर्दू के नाम पर हज़ारों अन्जुमनें क़ायम हैं, जहां हर गली और हर मुहल्ले में कवि और साहित्यकार भटक रहे हैं, वही दिल्ली जहां उर्दू भवन भी है, ऐवाने ग़ालिब भी है, ग़ालिब एकेडमी भी है, जहां देश के पहले शिक्षामंत्री आराम फ़रमा रहे हैं। वही दिल्ली जो उर्दू का गहवारा है, उसी दिल्ली में उर्दू का हाल यह है कि यहां कभी उर्दू मीडियम स्कूल हुआ करते थे। अब उन का कोई ज़िक्र नहीं है।

हालांकि उर्दू मीडियम स्कूलों के छात्र ने अच्छा रिज़ल्ट भी दिया था इसके बावजूद इन पर तवज्जोह नहीं दी गई। एक रिपोर्ट के मुताबिक़, आज दिल्ली में राज्य सरकार के 1030 स्कूल हैं। इस में 794 स्कूलों में पी जी टी उर्दू टीचर की सीटें मनज़ूरशुदा हैं। इस समय केवल 300 स्कूलों में उर्दू शिक्षक हैं, 494 स्कूलों में उर्दू शिक्षक ही नहीं हैं।

छटी कक्षा से दस्वीं कक्षा तक के स्कूलों में उर्दू शिक्षकों की कुल सीटें 1029 हैं। लेकिन सिर्फ़ 57 पर्मानेंट हैं। 303 गेस्ट टीचर्स हैं। 38 शिक्षक उर्दू एकेडमी की ओर से हैं।

यानी इस समय 631 सीटें ख़ाली हैं। इन कक्षाओं में उर्दू पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 95700 है, जबकि कुल शिक्षक की संख्या 398 है। पिछले वर्ष 805 स्कूलों में उर्दू थी। इस वर्ष इन स्कूलों की संख्या केवल 794 है। इस का मतलब है कि 11 स्कूलों में से इसी वर्ष उर्दू ख़त्म की गई है। ऐसा नहीं है कि सरकार को तवज्जोह न दिलाई गई हो।

उर्दू संस्थाओं और उर्दू दोस्तों ने दर्जनों पत्र लिख कर भी और भेंट करके भी प्रधानमंत्री और शिक्षामंत्री को इस ओर आकर्षित किया है। सरकार का एक बहाना यह है कि उर्दू पोस्टों के लिए लोग नहीं मिल रहे हैं। मेरे विचार में अगर यह बात किसी हद तक सही मान भी ली जाए तो इसकी भी ज़िम्मेदार सरकार है।

जिस तरह उसने अपने स्कूलों के शिक्षकों को बाहर देशों में भेज कर तर्बियती कोर्सेज़ कराए हैं, इसी तरह उर्दू के लिए भी किया जा सकता था। लेकिन मुसलमानों का भी अजीब मामला है।

देश की विराजमान सरकार का एक वर्ग तो इनके नाम और वुजूद से ही नफ़रत करता है, रहे दूसरे लोग जो मस्लेहत के तौर पर मुसलमानों का दम भरते हैं, स्वयं को सेक्यूलर का इमाम समझते हैं, वे भी सिर्फ़ इसलिए मुसलमानों के लिए कोई काम नहीं करते कि उन पर मुसलमानों को ख़ुश करने का आरोप आ जाएगा।

दिल्ली में उर्दू की बुरी हालत पिछले चार वर्षाें में ही नहीं हुई है, बल्कि एक समय से पतन का शिकार है। कांग्रेस की सरकार में भी यही परस्थिति थी। केजरीवाल सरकार में और गिरावट आई है। जबकि केजरीवाल ख़ुद भी और उनके शिक्षामंत्री मनीश सिसोदिया जी भी शिक्षा के विभाग में चार साल में दिल्ली सरकार की कामयाबियों को गिनाते हुए नहीं थकते। सरकार ने शिक्षा के विभाग में बड़े-बड़े काम किए है।

प्राईवेट स्कूलों की काया पलट दी है, लेकिन उर्दू स्कूल, उर्दू शिक्षक के लिए क्या किया गया है? यह एक प्रश्न है, जो वर्तमान राज्य सरकार से उत्तर का इंतिज़ार कर रही है।

उर्दू की यह हालत इसलिए हुई कि इसका ताल्लुक़ मुसलमानों से जोड़ दिया गया। आज़ादी के बाद मुसलमानों पर अत्याचार के पहाड़ तो तोड़े गए। देश के बंटवारे का ज़िम्मेदार मुसलमानों को ठहरा कर दंगे कराए गए। कुछ दंगे उर्दू ज़ुबान को ले कर भी हुए।

उर्दू ज़ुबान से तास्सुब इसी लिए बरता गया और बरता जा रहा है कि इसके बोलने वाले अधिक्तर मुसलमान हैं। जबकि उर्दू ज़ुबान का अपना कोई न धर्म था, न ज़ात थी, इसके बोलने और लिखने वाले हिन्दु भी थे, सिख भी थे और मुसलमान भी थे।

मुंशी प्रेम चंद, जगन नाथ आज़ाद, रघू पति सहाए फ़राक़ गोरखपुरी से लेकर महात्मा गांधी तक उर्दू में पत्र लिखते थे। आज भी उर्दू के प्रसिद्ध अख़्बार इंक़िलाब और राष्ट्रीय सहारा के मालिक ग़ैर मुस्लिम हैं। इसी तरह उर्दू की सबसे ज़्यादा पसंद की जाने वाली वेबसाइट ‘‘रेख़्ता’’ को चलाने वाला भी एक उर्दू दोस्त ग़ैर मुस्लिम ही है।

लेकिन अंग्रेजों की साज़िश वाली ज़ेहनियत ने उर्दू को मुसलमानों से और हिन्दी को हिन्दुओं से जोड़ कर दोनों ज़बानों को बेहद नुक़्सान पहुंचाया। इसी ज़ेहनियत ने आज़ादी के बाद हिन्दुस्तान के सेक्यूलर से भी उर्दू पर अत्याचार कराया, जो आज तक जारी है। उर्दू पर अत्याचार की एक वजह यह भी है कि उर्दू पाकिस्तान की सरकारी ज़ुबान बनाई गई और पाकिस्तान से हमारे देश के रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे इसलिए उर्दू से भी रिश्तों में कड़वाहट पैदा हो गई।

ज़रूरत इस बात की है कि उर्दू के सेवक और उर्दू के नाम पर बनी अन्जुमनें सरकार पर दबाव डालें कि वे उर्दू को इसका क़ानूनी हक़ दें। इस काम में ग़ैर मुस्लिम भाईयों को भी साथ लें।

उर्दू के साथ ही अगर दूसरे इलाक़ाई की ज़ुबानों को कमज़ोर किया जा रहा हो तो उसके लिए भी कोशिश करें। उर्दू शिक्षक उर्दू की शिक्षा दें। उर्दू शिक्षकों की जो सीटें ख़ाली हैं, उन को भरने के लिए क़ानून का दरवाज़ा खटखटाया जाए। अपनी नई नस्ल को उर्दू की तालीम दी जाए। इसके लिए मस्जिदों में उर्दू स्कूल क़ायम किए जाएं।

उर्दू मुसलमानों की कोई धार्मिक ज़ुबान नहीं है। इसलिए इससे प्रेम और आस्था में बराबरी रखी जाए। उर्दू ज़ुबान हमारे दीन और ईमान से वाबस्ता नहीं है, इसके बावजूद उर्दू हमारी ज़रूरत है, क्योंकि हमारा सांस्कृतिक सरमाया उर्दू में है।

उर्दू हमारे अपने देश की ज़ुबान है। इसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सारे देश वालों की है। हुकूमत वालों को पक्षपात वाली ज़ेहनियत से निकल कर सिर्फ़ एक ज़ुबान को बढ़ाने के लिए सही नीयत से काम करना चाहिए।

उर्दू एकेडमियां और उर्दू के सरकारी संस्थाओं के ज़िम्मेदारान मुसलमान ही हैं उनको चाहिए कि वे अपना कर्तव्य अदा करें। मैं एक बार फिर यह बात दोहरा दूं कि देश की सारी ज़ुबानें हमारी हैं, किसी ज़ुबान से भी नफ़रत का जज़्बा हमारे अंदर नहीं होना चाहिए, मगर उर्दू के प्रचार के लिए जो प्रयास हम कर सकते हैं, करना चाहिए।

क्योंकि
जहां जहां कोई उर्दू ज़ुबान बोलता है,
वहीं वहीं मेरा हिन्दुस्तान बोलता है।

कन्वेनर- इंडियन मुस्लिम इंटेलक्चुअल्स फ़ोरम, नई दिल्ली
9891929786

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