अज़्म को तेरे मैं करता हूँ सलाम ऐ हादिया

मसीहुज़्ज़मा अंसारी

एशिया टाइम्स

‘हादिया’ के नाम
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मंद पड़ जाता है जब ईमान दिल में दोस्तों,
भेज देता है ख़ुदा हम में ही कोई हादिया।

पूछते हैं सब मदद आयेगी कब? कैसे? कहाँ?
बन के ‘ला तहज़न’ का बाब आती है कोई हादिया।

कह रहे हैं सब अँधेरा है नहीं कोई दिया,
रौशनी लायेगी जब आएगी कोई हादिया।

सब्र के साँचे में ढल जाना पड़ेगा दोस्तों,
यूँ ही दुनिया में नहीं बनता है कोई हादिया।

रौंद डाला ख़ौफ़ को हर डर को बस ईमान से,
अज़्म को तेरे मैं करता हूँ सलाम ऐ हादिया।

-मसीहुज़्ज़मा अंसारी

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