लोकतंत्र की निरंकुश हुंकार

तारिक हुसैन रिज़वी

Asia Times Desk

बेगूसराय (बिहार) के बहुचर्चित लोकसभा संसदीय क्षेत्र से भाजपा के उम्मीदवार गिरिराज सिंह ने मुसलमानों की आस्था पर कुठाराघात करते हुए चुनाव आचार संहिता की धज्जियां उड़ा दीं। भारत के संविधान में अपने धर्म को अपने तऱीके से मानने के अधिकार के मुंह पर यह कह कर कालिख पोत दी, कि *यदि भारत में क़ब्र के लिए जगह चाहिए, तो वन्दे-मातरम कहना होगा।
उस पर दलील यह है कि अफगानिस्तान से आने वाले सभी आक्रमण-कारियों ने भारत के हिंदुओं से ज़बरदस्ती अल्लाह हो अकबर के नारे लगवाए थे, इस्लाम धर्म मानने के लिए मजबूर किया था, वे सभी विदेशी अत्याचारी थे, अब स्वतंत्र भारत में मुसलमानो को कमज़ोर और ग़ुलाम बनाने के लिए उन पर तरह तरह के अत्याचार करने आवश्यक हैं। श्री गिरीराज सिंह केंद्र सरकार के मंत्री के पद पर आसीन होने के साथ भारत की संविधान संरक्षक संस्था संसद के सदस्य भी हैं।
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उन्होंने पद और गोपनीयता की शपथ लेते वक्त भारत के संविधान की सुरक्षा की शपथ ली थी। लेकिन हमेशा विवादित बयानों के लिए चर्चा में रहने वाले मंत्री जी बहु संख्यक हिंदुओं के वोटों के मोहपाश में फंस कर पार्लियामेंट्री इलेक्शन के प्रचार में नॉन-पार्लियामेंट्री भाषा यानी ग़ैर-संसदीय भाषा का प्रयोग कर बैठे। अफ़सोस की बात यह है, कि जो नेता राष्ट्र-गीत और राष्ट्र गान के बीच अंतर नही जानते, जिन्हें वन्दे-मातरम के अर्थ तो छोड़िए चार पँक्तियाँ भी कंठस्थ नही हैं।
वे भी अंग्रेज़ो की डिवाइड एंड रूल की पालिसी अपना कर देश के लोकतंत्र को दुनिया की नज़र में शर्मिंदा होने पर मजबूर करते हैं। 26 अप्रैल 2019 के दैनिक जागरण में दी ख़बर के अनुसार श्री गिरिराज सिंह ने यह भी कहा, कि हमारे बाप-दादा गंगा किनारे सिमरिया घाट पर मरे, तो उन की अंत्येष्टि के लिए तो क़ब्र मिली नही, मुसलमानों को तो तीन हाथ जगह चाहिए, उन को क़ब्र के लिए जगह कौन देगा।
गिरिराज जी आपके धर्म की आस्था अनुसार अंत्येष्टि गंगा घाट पर सर्वोत्तम स्थान पर हुई, इसमें खुले और बंद का ना तो किसी ने विवाद किया और नाही अंतिम संस्कार में किसी ने व्यवधान डाला। अगर एक मिनट के लिए आपकी बात मान ली जाए, कि मुस्लिम शासक अत्याचारी थे। तो क्या आपको यह शोभा देता है, कि आप भी अत्याचारी बनें, और वह भी केवल मुसलमानों के विरुद्ध। इतिहासकार बताते हैं कि फ्रांसीसी, डच, अंग्रेज़ सभी अत्याचारी थे, स्वतंत्रता के बाद उन की बहुलता के क्षेत्र में उनकी जानमाल, इज़्ज़त, और शासित वर्ग का दर्जा बनाए रहने के लिए केंद्र शासित प्रदेश बनाए।
गोवा दादर नगर हवेली में उन को इनकमटैक्स से बरी कर दिया गया। गिरिराज जी अब की जब ऑनलाइन टैक्स जमा कीजिये गा तो आप उसमें यह सवाल पढ़ेंगे कि क्या आप गोवा और दादर नगर हवेली के नागरिक हैं। संसद में उनको शासित वर्ग का दर्जा बनाए रखने के लिए एंग्लो-इंडियन के लिए संसदीय सीट आरक्षित कर दी हैं। फ्रांसीसियों से पांडिचेरी तो खाली नही करवाया गया, बल्कि भारत के मानचित्र में *चार* जगह पांडिचेरी दिखाना मंजूर कर लिया।
फ्रांसीसियों को तमिलनाडु से बाहर नही निकाला गया, लेकिन यदि आप भारत का नक़्शा देखेंगे तो केरल के किनारे अरब सागर में *माहे* पांडिचेरी का ज़िला है। बंगाल की खाड़ी में यानम, आंध्र और तमिलनाडु में कराईकल और पांडिचेरी में भी पांडिचेरी है। ऐसा नही है कि उन को संविधान से बाहर जा कर छूट दी गई, ना ही हम यह कहते हैं कि वह निवर्तमान सरकार की तुष्टिकरण नीति थी। हम तो विरोध करते हैं, मुसलमानों के विरुद्ध दमनकारी नीति की, जो सत्तारूढ़ पार्टी पर तो बिल्कुल भी नही शोभा देती। सबका साथ सब का विकास का नारा चुनाव के समय किस नक्कारखाने में पहुंच जाता है, कि तूती की आवाज़ सुनाई ही नही देती।
लेखक :  वरिष्ट पत्रकार ‘तारिक टाइम्स’ हिंदी  वीकली के प्रधान संपादक है 

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