कोच सिलेक्शन प्रोसेस में हुआ ड्रामा, गिरी सचिन-सौरव-लक्ष्मण की साख

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भारतीय क्रिकेट टीम का कोच चुनना कंफ्यूजन में रहने का बेहतरीन उदाहरण है। पसंद है, पसंद नहीं है। यह चाहिए, नहीं चाहिए। विराट-कुंबले विवाद बीते छह सप्ताह हो गए। उसके बाद कुंबले ने खुद को कोच पद की रेस से अलग कर लिया था। तब से हर दिन कोई न कोई विवाद और ड्रामा चलता रहा। बतौर कोच रवि शास्त्री की नियुक्ति रोलर-कॉस्टर राइड जैसी रही है। सचिन तेंडुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण की क्रिकेट सलाहकार समिति हां-शायद-ना में झूलती रही। इससे हर कोई उधेड़बुन में रहा।

सोमवार को इंटरव्यू की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सीएसी के सदस्य सौरव गांगुली ने कहा कि कोच की नियुक्ति में कुछ दिन की और देरी हो सकती है। मुमकिन है श्रीलंका दौरे के बाद घोषणा होती। उन्होंने कहा था कि घोषणा से पहले कप्तान विराट कोहली से बात कर उनकी राय ली जाएगी। यह अपने आप में आश्चर्यजनक था। अगर कप्तान को ही कोच चुनना था तो सलाहकार समिति की जरूरत ही क्या थी। सब जानते थे कि कोहली की पसंद शास्त्री हैं, फिर घोषणा में देरी का मतलब क्या था। इसके बाद सीन में प्रशासकों की समिति (COA) भी कूद पड़ी और कहा कि कोच की घोषणा तुरंत हो। इसके बाद CAC के इच्छानुसार बीसीसीआई ने पहले कहा कि अभी कोई फैसला नहीं हुआ है और फिर देर रात अपनी ही बात से पलट कर कोच के तौर पर रवि शास्त्री के नाम की घोषणा कर दी।

CAC निश्चित तौर पर शर्मिंदगी वाली स्थिति में थी। हालांकि, कम से कम ऐसा लगा कि बड़ी बाधा पार हो गई है। लेकिन, इसके बाद मामला उलझ गया। CAC ने बैट्समैन कंसल्टेंट के तौर पर राहुल द्रविड़ और बॉलिंग कंसल्टेंट के तौर पर जहीर खान के नाम की घोषणा भी कर दी थी। यह बात शास्त्री को ठीक से हजम नहीं हुई। सीएसी ने दावा किया कि इस बारे में कोहली और शास्त्री दोनों से बात की गई थी। लेकिन CAC, COA, BCCI और शास्त्री की ओर से जैसे विरोधाभासी बयान आए उससे स्थिति और भी बिगड़ती चली गई।

दो बातें बहुत अजीब रहीं। पहली यह कि अगर CAC को रवि शास्त्री बहुत पसंद नहीं थे (याद रखे 12 महीने पहले CAC ने शास्त्री को रिजेक्ट कर दिया था) तो उनको नहीं चुना जाना चाहिए था। शास्त्री के अलावा चार और दावेदारों को इंटरव्यू हुए थे। गांगुली के मुताबिक सभी ने प्रभावशाली प्रजेंटेशन भी दिया था। दूसरी अजीब बात शास्त्री को कोच चुन लिए जाने के बावजूद सलाहकारों का चयन था। आम तौर पर कोच खुद अपना सपोर्ट स्टाफ चुनता है। पूरी दुनिया में ऐसा ही होता है फिर शास्त्री के ऊपर लोगों को क्यों थोपा जाना? बड़ा सवाल यह है कि क्या CAC को ऐसा करने का अधिकार है। मुझे शक है कि भविष्य में होने वाले मुश्किल विदेशी दौरों के मद्देनजर शास्त्री को द्रविड़ और जहीर को सलाहकार बनाए जाने पर कोई आपत्ति होती। लेकिन, ऐसा तब करना ठीक होता जब पहले शास्त्री के अन्य सपोर्ट स्टाफ चुन लिए जाते।

बेहतर होता कि पहले शास्त्री के साथ अनौपचारिक रूप से इस पर सहमति बना ली जाती। इसके बाद उन्हें समय दिया जाता कि वे इन दिग्गजों को सलाहकार बनाने की मांग रखते। अभी की स्थिति के मुताबकि लगता है कि अब मामला सोमवार को ही साफ होगा। तब कप्तान कोहली और कोच शास्त्री एक जगह मिलकर सपोर्ट स्टाफ के नाम फाइनल करेंगे। लेकिन, अब तक जो हुआ उससे यह मैसेज गया कि भारतीय क्रिकेट मौजूदा समय में किस खराब तरीके से संचालित हो रहा है।

इस मामले में सीओए, बीसीसीआई और सीएसी के बीच शक्ति संघर्ष निश्चत रूप से दिखा है और स्थिति किसी के लिए भी सुखद नहीं रही। सबसे बुरी स्थिति सीएसी की रही। यह कसौटियों पर उस तरह खरी नहीं हुई जितनी लोगों ने उम्मीद की थी। वास्तव में अब यह पूरी तरह बेमतलब नजर आ रही है।


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