क्या ‘असतो मा सद्गमय’ धर्मनिरपेक्ष नहीं?

संस्कृत श्लोक वाली प्रार्थना की अनिवार्यता और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर विचार करेगी संविधान पीठ

Asia Times Desk

सुफियान अहमद 

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ अब इस पर विचार करेगी कि केंद्रीय विद्यालयों में बच्चों को संस्कृत में प्रार्थना करना उचित है या नहीं? असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय और कुछ अन्य प्रार्थनाओं पर आपत्ति जताने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन ने कहा, चूंकि असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय जैसी प्रार्थना उपनिषद से ली गयी है इसलिए इस पर आपत्ति की जा सकती है और इस पर संविधान पीठ विचार कर सकती है।

दरअस्ल देश भर के 1,125 केंद्रीय विद्यालयों में सभी धर्म के छात्रों के लिए संस्कृत श्लोक ‘असतो मा सद्गमय’ वाली प्रार्थना की अनिवार्यता मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है या नहीं, इसे लेकर ख़ुद को नास्तिक कहने वाले जबलपुर के एक वकील विनायक शाह ने पिछले वर्ष से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है। याचिका में कहा गया है कि केंद्रीय विद्यालयों में प्रार्थना का हिस्सा यह श्लोक एक धर्म विशेष से जुड़ा धार्मिक संदेश है।

संविधान के अनुच्छेद 28(1) के अनुसार सरकार द्वारा संचालित किसी भी विद्यालय या संस्थान में किसी भी विशिष्ट धर्म की शिक्षा नहीं दी जा सकती, इसलिए इस पर रोक लगायी जानी चाहिए। याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रार्थना के बजाए बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित की जानी चाहिए जिससे छात्रों में बाधाओं और चुनौतियों के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण की प्रवृत्ति विकसित होती है।

बहस के दौरान यह बात भी उठी कि विवादित संस्कृत श्लोक हिंदू धर्म से जुड़े बृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया है और इसलिए यह धर्म विशेष से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने मामले को अब संविधान पीठ को सौंप दिया है।

यह सही है कि अनुच्छेद 28(1) के अनुसार सरकार द्वारा संचालित कोई भी संस्थान किसी भी विशिष्ट धर्म की शिक्षा नहीं दे सकता, लेकिन सवाल उठता है कि क्या इस प्रार्थना ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय’, जिसका अर्थ है, ‘मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो’ में किसी धर्म विशेष की शिक्षा है? क्या उसके ज़रिये किसी किसी धर्म विशेष की शिक्षा दी जा रही है?

सवाल यह भी उठता है कि क्या संस्कृत भाषा में होने के कारण इस इस प्रार्थना को किसी धर्म विशेष से जोड़कर देखा जा सकता है? क्या भाषा भी किसी धर्म-विशेष की होती है? क्या यह प्रार्थना केवल इसलिए धर्म विशेष की हो जाती है कि यह उपनिषद से ली गयी है? इस प्रार्थना में कौन से धर्म का या किस धर्म के देवी देवता या भगवान भगवान का नाम आ रहा है ? क्या सभी के कल्याण की प्रार्थना ऐसे शब्दों में जिसमें किसी धर्म या भगवान का नाम नहीं है, नहीं की जा सकती ?

इस याचिका की सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता (सॉलिसिटर जनरल) तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि ‘असतो मा सद्गमय’ धर्मनिरपेक्ष है। यह सार्वभौमिक सत्य के वचन हैं जो सभी धर्मावलंबियों पर लागू होते हैं। मेहता ने यह दलील भी दी कि सुप्रीम कोर्ट के प्रतीक चिन्ह पर भी संस्कृत में ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ लिखा है जो श्रीमदभगद्गीता से उद्धृत है। इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि सुप्रीम कोर्ट भी धार्मिक है।

अब इस नवगठित संविधान पीठ के समक्ष होने वाली सुनवाई  के बाद ही यह निर्णय हो पाएगा कि केंद्रीय विद्यालयों में पढ़ी जाने वाली यह प्रार्थना संविधान की धाराओं के अनुकूल है या नहीं, लेकिन यह जिज्ञासा होना स्वाभाविक है कि आख़िर इस प्रार्थना में ऐसा क्या है जिसपर आपत्ति की जा रही है।

आपत्ति दुहरी है। पहली तो यह कि अल्पसंख्यकों और नास्तिकों को उनके विश्वासों के प्रतिकूल आचरण के लिए बाध्य किया जा रहा है, और दूसरी आपत्ति यह है कि प्रार्थना में संस्कृत के वाक्य हैं

जो कि एक धर्म-विशेष से संबंधित भाषा है।

जहां तक पहली आपत्ति का सवाल है, न्यायालय इसके बारे में निर्णय करेगा कि इस प्रार्थना का पढ़ा जाना संविधान-विरोधी है अथवा नहीं, लेकिन धर्म-विशेष की भाषा वाली दूसरी आपत्ति पर देश के सामान्य नागरिक को भी ग़ौर करना चाहिए। क्या भाषा भी किसी धर्म-विशेष की होती है?

केंद्रीय विद्यालयों में पढ़ी जाने वाली प्रार्थना में संस्कृत की कुछ उक्तियां हैं- असतो मा सद्गमय।  तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय। संस्कृत के इन शब्दों का सीधा-सा अर्थ है, मुझे अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाओ, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाओ। मृत्यु से जीवन की ओर ले जाओ।

यह सही है कि ये तीन पंक्तियां उपनिषदों से ली गयी हैं, लेकिन इन पंक्तियों का उपनिषदों से लिया जाना, उपनिषदों का संबंध हिंदू धर्म से होना और संस्कृत में लिखा जाना इन्हें धर्म-विशेष तक सीमित कैसे कर देता है? किसी भी धर्म का भाषा से क्या लेना-देना? भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है।

भाषा के द्वारा हम अपनी बात दूसरों तक पहुंचाते हैं और दूसरों की बात भाषा के माध्यम से ही हम तक पहुंचती है। यह भाषा बोली हुई भी हो सकती है और संकेतों वाली भी। यदि यह मान लिया जाए कि असतो मा सदगमय वाली बात बोलकर नहीं, संकेतों से कही जाए तो? तब भी क्या वह मौन-भाषा धर्म-विशेष से जुड़ी रहेगी?

यह सही है कि हिंदू धर्म के लगभग सभी प्राचीन ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे गये हैं, लेकिन हज़ारों वर्ष पहले लिखे गये वेद या उपनिषद धार्मिक ग्रंथ मात्र तो नहीं हैं। उस ज़माने में संस्कृत बोलने वाले हर विषय की बात इसी भाषा में ही तो करते होंगे, फिर यह केवल हिंदुओं की भाषा कैसी हो गई?

संस्कृत में लिखा गया विज्ञान या भूगोल या इतिहास या अर्थशास्त्र केवल  हिंदुओं की बपौती कैसे हो सकता है? किसी भी भाषा पर समूची मानव जाति का अधिकार है। क्या अंग्रेज़ी केवल ईसाइयों की भाषा है, या फिर अरबी भाषा सिर्फ़  मुसलमानों की या गुरुमुखी मात्र सिखों की भाषा।

यह पहली बार नहीं है जब हमारे देश में किसी भाषा को धर्म के साथ जोड़ा जा रहा है। पहले भी हम उर्दू को मुसलमानों की भाषा बना-बता कर धर्मांधता का परिचय दे चुके हैं। उर्दू का जन्म हमारे भारत में हुआ। आम बोल-चाल से लेकर साहित्य लेखन तक उर्दू का उपयोग होता रहा और उर्दू का प्रयोग करने वाले वे सब मुसलमान नहीं थे।

उर्दू के महान लेखकों व साहित्यकारों में फ़िराक़ गोरखपुरी(रघुपति सहाय)प्रेमचंद,चकबस्त व राजेन्द्र सिंह बेदी जैदे विभिन्न लोगों की भी गणना होती है। हिन्दी की तरह उर्दू भी एक हिन्दुस्तानी भाषा है, उर्दू के लगभग दो तिहाई शब्दों का मूल संस्कृत और प्राकृत में मिलता है। उर्दू की 90 नब्बे प्रतिशत से अधिक क्रियाएं मूलत: संस्कृत और प्राकृत से ही ली गयी हैं।

फिर उर्दू मुसलमानों की भाषा कैसे हो गयी? भाषाओं को धर्म के साथ जोड़ने का अर्थ उस विविधता को अपमानित करना है जो भारतीय समाज की एक ताक़त है। उर्दू को मुसलमानों की या संस्कृत अथवा हिन्दी को हिंदुओं की भाषा बनाकर हम अपने भारतीय समाज को बांटने का काम ही कर रहे हैं। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता आदि के नाम पर दीवारें उठाकर हम अपने आंगन को लगातार छोटा किये जा रहे हैं।

ग्रंथों की भाषा चाहे कोई भी हो, मूलत: ग्रंथ पूरी मानव जाति लिए होते हैं। धर्म का काम आदर्श जीवन की राह बताना है। भाषा तो माध्यम है इसे बताने का। असतो मा सद्गमय का संदेश चाहे किसी भी भाषा में दिया जाए, उसका उद्देश्य मानव-समाज को बेहतर बनाना है। अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने की लालसा एक वैश्विक सत्य है, ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ नीति का संदेश हर मनुष्य के लिए है।

 

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