छत्तीसगढ़ में शराबबंदी के निहितार्थ

Muzaffar Husain Ghazali

Ashraf Ali Bastavi

भारतीय समाज ने शराब को अनैतिक तत्व के तौर पर रेखांकित किया है। आजादी के बाद देश में मधनिषेध पर जोर दिया गया। हर वर्ष मधनिषेध सप्ताह मनाया जाता था। गांधी जी ने नशा मुक्त भारत की परिकल्पना की थी I जन मानस की प्रेरणा के लिए उन के विचार सार्वजनिक स्थानों पर लिखे रहते थे I बापू के विचारों के प्रभाव में मधनिषेध देश का सार्वजनिक नारा था I किन्तु अब गाँधी की ऐनक के एक कांच पर ” स्वच्छ” और दूसरे पर “भारत” लिख  कर उन्हें ” स्वच्छता ” में समेट कर स्वच्छता अभियान का पोस्टर बना कर टांग दिया गया है I

मदिरा पान के कारण कई परिवार बर्बाद तो कई आर्थिक रूप से हाशिये पर पहुँच गए हैं I शराब का सब से अधिक प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है I सस्ती, नकली शराब पीने से स्वास्थ्य ख़राब होने और मरने के समाचार देश भर से आते रहते हैं I मरने वालों में आदिवासी, जनजातिये गरीबों,पिछड़ों और मजदूरों की बहुतायत होती है I सड़क दुर्घटनाओं में बढोत्तरी के लिए भी शराब को ज़िम्मेदार माना जाता है I सुप्रीम कोर्ट ने इसी के मद्दे नज़र हाईवे से शराब की दुकानें हटाने का फैसला लिया I गौरतलब है की महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए कई राज्यों ने शराब पर प्रतिबन्ध लगाया छत्तीसगढ़ उन में से एक है I

छत्तीसगढ़ आदिवासी बाहुल क्षेत्र है जहाँ कुछ महीने  पहले तक शराबबंदी का एजेंडा गरम रहा, सरकार ने युद्ध स्तर पर काम किया I उसने शराब बेचने का एलान कर दिया इसी योजना के तहत कहीं-कहीं दुकानों का निर्माण कराया गया I जबकि उद्योग – व्यापार सरकार का कार्य नहीं है I सरकार का काम ऐसी आदर्श स्थिति तथा वातावरण निर्मित करना है जिस में उद्योग – व्यापार फले-फूले और रोज़गार सृजित हों I जनता ने इसका व्यापक विरोध किया, जिस के चलते सरकार के क़दम लड़खड़ाने लगे उसे एहसास हो गया कि चुनाव में शायद यह मुद्दा काम नही करेगा। राजस्व की चिंता के साथ सरकार को आदिवासी परम्परा की वजह से शराबबंदी पर आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा है। राज्य सरकार ने जो कमेटी गठित की थी उसने भी शराबबंदी को लेकर बहुत ज्यादा उत्साह नही दिखाया है। कमेटी ने अभी तक अपनी रिपोर्ट भी सरकार को नही दी है। भाजपा सरकार द्वारा समिति गठन करने के बाद कांग्रेस औऱ अजित जोगी की अगुवाई वाली जनता कांग्रेस ने शराबबंदी के मुद्दे को और जोर शोर से उठाया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के वक्त इस कवायद को तेज करने का प्रयास हुआ तो भी मतदाताओं पर कितना असर पड़ेगा कहना मुश्किल है। क्योंकि पहले इस तरह के प्रयोग ज्यादातर राज्यों में विफल ही साबित हुए हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सरकारे सूबे के राजस्व का मोह छोड़ पाएंगी । राज्य सरकारों द्वारा गठित समिति ने भी राजस्व और पर्यटन की आड़ में शराबबंदी की सफलता को लेकर सवाल उठाए हैं।

गौरतलब है कि कर्नाटक व मध्यप्रदेश में भी शराबबंदी का मुद्दा चर्चा में आया। लेकिन परवान नही चढ़ पाया। मध्यप्रदेश ने बिक्री नियमन के कुछ कदम उठाकर शराबबंदी के मुद्दे को लगभग समाप्त कर दिया। कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के इंकार के बावजूद कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इसे पार्टी के चुनाव अभियान में शामिल करने और घोषणा पत्र में शामिल करने का राग छेड़ा है। लेकिन शराबबंदी करने वाले राज्यों में इसके विपरीत असर की रिपोर्ट के आधार पर सरकार शराबबंदी की संभावना को खारिज कर रही है।

सरकार में शराबबंदी  का विरोध कर रहे धड़े का मानना है कि जिन राज्यों ने ये प्रयोग किया उन्हें अपने अभियान में सफलता नहीं मिली। गुजरात में हर साल हजारों करोड़ रुपये की अवैध सरकार की बिक्री हो रही है। बिहार में नीतीश सरकार ने पूर्ण शराबबंदी की घोषणा की लेकिन वहां भी हर रोज अवैध शराब का जखीरा पकड़ा जा रहा है। पड़ोसी राज्यो में शराब पर प्रतिबंध नहीं होने से बड़े पैमाने पर चोरी छिपे  शराब यहाँ लाई जा रही है।

कांग्रेस में भी शराबबंदी को लेकर एक राय नहीं है। पार्टी में शराबबंदी के सुझाव की मुखालफत कर रहे  वर्ग का मानना है कि राजस्व को नुकसान के साथ ही इसका सियासी फायदा भी नही होगा। पार्टी नेता केरल सहित अन्य राज्यो का  उदाहरण दे रहे हैं।
तर्क दिया जा रहा है कि केरल मे शराबबंदी करने वाली सरकार दोबारा सत्ता में नही आई। अगली सरकार ने सत्ता में आते ही पूर्ण शराबबन्दी का फैसला वापस ले लिया।

शराबबंदी का विरोध करने वालों का मानना है कि बिहार में भी ये सामाजिक मुद्दा भले ही बना हो लेकिन यह बड़ा सियासी मुद्दा नहीं बन पाया। इसे व्यापार और रोज़गार से जोड़ कर भी देखा जाता है I नेशनल हाईवे पर शराब बैन के बाद राज्य सरकारों और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री को 65 हज़ार करोड़ के राजस्व की चपत लगने और दस लाख लोगों के रोज़गार पर संकट की बात कही गयी I

दरअसल सरकार की कोई शराब निति नहीं है इसलिए शराब की बिक्री पर प्रतिबंध का मुद्दा आज़ादी के बाद से ही प्रासंगिक रहा है। 1958 में तत्कालीन केंद्र सरकार पूरे देश में एक साथ प्रतिबंध लागू करना चाहती थी। लेकिन विशेषज्ञों की राय पर भारी राजस्व हानि की आशंका को देखते हुए सरकार फैसला लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। 1994 में जब देश उदारीकरण की राह पर था  आंध्रप्रदेश ने पूर्ण शराबबंदी लागू करने का फैसला किया। हरियाणा ने भी 1996 में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी। वंशीलाल ने अपने चुनाव में शराबबंदी को बड़ा मुद्दा बनाया था। लेकिन दोनों राज्यों ने लगातार 1997 और 1998 में पूर्ण शराबबंदी  का फैसला वापस ले लिया। वर्ष 2014 में आंध्रप्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस के जगन रेड्डी ने शराबबंदी को मुद्दा बनाने का प्रयास किया लेकिन उनकी पार्टी चुनाव नहीं जीत पाई। राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलशिकर का कहना है कि शराबबंदी से राजनीतिक दलों को वोट मिलते हों इस तरह के प्रमाण नहीं मिलते। इसे आमतौर पर महिलाओं और खासकर ग्रामीण महिलाओं को लुभाने की कवायद के रूप में देखा जाता है लेकिन इसके नतीजे मिले जुले हैं।

कर्नाटक के साथ कई अन्य राज्यो छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश में अब एक बार फिर शराबबंदी राजनीतिक दलों के एजेंडे पर नजर आ रहा है। लेकिन इसपर राय बंटी होने की वजह से अभी ये तय नहीं है कि वाकई में शराबबंदी की दिशा में सरकारें अपना कदम कितना आगे ले जा पाएंगी। स्वतंत्र रूप से जितने भी अध्ययन किये गए हैं उनमें पाया गया है कि शराब की बिक्री पर प्रतिबंध कभी भी आर्थिक रूप से व्यवहारिक फैसला नहीं रहा है। बल्कि शराबबंदी होने के बाद अवैध तरीके से शराब बनाने और इसकी अवैध बिक्री बढ़ जाती है। गैरक़ानूनी काम में इज़ाफ़ा हो जाता है I शराब कमोवेश सभी राज्यों के लिये केवल राजस्व का स्रोत है। तमिलनाडु में वर्ष 2015 में करीब 29 हजार करोड़ रुपये राजस्व अकेले शराब से आया। बिहार में ये अपेक्षाकृत कम था। यहाँ वर्ष 2014-15 में करीब 3400 करोड़ रुपये राजस्व शराब से आया। केरल में करीब 96000 करोड़ राजस्व शराब से मिलने की बात आंकड़ों में दर्ज है। राज्यों में कुल राजस्व का 20 से 22 फीसदी तक शराब से आता रहा है। राज्य सरकारों को  राजस्व और पर्यटन उद्योग के फलने फूलने की फ़िक्र है न की जनता की भलाई की चिंता I

जिन देशों में मधनिषेध नहीं है वहां मानकों की कसौटी पर बानी कई प्रकार की शराब मुहैया है I इसके कारण सस्ती शराब के चक्कर में जान जोखिम में नहीं पड़ती I सरकारों की नियत में खोट के चलते शराबबंदी के वे फायदे नहीं मिल पाते जिन को ध्यान में रख कर शराबबंदी का निर्णय लिया जाता है I शराब बंदी जनता की समस्त त्रासदी का उस समय तक हल नहीं हो सकती जब तक कि समाज खुद इससे दूरी बनाने को तैयार न हो I शराब पीने की तमीज सिखाने के साथ सरकार को ऐसा कुछ करना होगा जिससे धीरे- धीरे लोग खुद शराब को अलविदा कह दें I


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