अब सिर्फ शेष रह गयी हैं जीर्ण- शीर्ण यादें

शकील

Asia Times Desk

बीरपुर सपनों का नगर नहीं मेरी संस्कृति का धरोहर है। हर शहर, नगर, क़स्बा और गांव की अपनी सभ्यता और संस्कृति होती है। बालकाल की अबोधता और यौवन होते देह के भीतर उफनती इच्छाओं की मद्मस्त लहरें, अनेकों यादें ठहर-ठहर कर विगत की उन वादियों में ले जाती हैं, जहां सपनों के महल खण्ड्हरों में रुपांतरित हो चुके हैं। जब कोई आपके बहुत समीप हो जाए तो वह अपना बन कर आपके स्वरूप का अभिन्न भाग हो जाता है।

बीरपुर मेरा स्वभाव, मेरी आत्मा है जो रक्त बन कर मेरी धमनियों में दौड़ रहा है। शैशवकाल के उन सहचरों की तरह जो अपने प्रेम की अनुभूति ऐसे ही कराता है जैसे उषाबेला के समीर में जलतरंग की ध्वनी। 

शकील


ऐसी ही थी वह, नितांत। जिससे मिलने की पहली शर्त थी खूब पढ़ना और गलियों-चैराहों में न के बराबर निकलना। कमाल की शर्तें थीं उसकी। कभी बात नहीं हुई, बस नज़रें ही मिलीं, वह भी क्षणभर के लिए। लेकिन सहपाठियों ने कुछ और ही तात्पर्य लिया। जब अगली बार मिले तो उसकी निगाहें शिकायत करतीं, मानों पूछ रहीं हों ‘‘कहां रहे इतने दिनों?’’ 


आज बीरपुर जाता हूं तो, शहर बदला सा लगता है। सारे दृश्य बदले से हैं। ऐस लगता है पूरा शहर बदहवासी की दशा में है। आबादी में बढ़ौतरी हो गयी है। शरीर से शरीर छू रहा है। उहापोह की स्थिति। शहर के विस्तार और शहर परियोजना में कोई समानता नज़र नहीं आती। लेकिन किसी को कोई आपत्ति नहीं। कल और आज में कितनी भिन्नता है। हम सड़कों पर चलते थे तो दूरियां दिखाई देती थीं। हम किसी के पीछे-पीछे भी रहते थे तो इतनी दूरी होती थी कि हवाओं में उसका दोपट्टा लहराए तो भी उसे देख न सकें। अब तो न दूरी बना कर चलने की गुंजाइश रही और न कोई सिद्धांत बचा। उस समय लज्जा थी, उसके साथ श्रद्धा था और श्रद्धा के साथ भीतर का सम्मान। 


अब तो भीतर की बेचैनी बाहर छलक रही है। दुकानें बढ़ गयीं, बाज़ार बड़े हो गये हैं। पहले तो इक्का-दुक्का बिहार सरकार की गाड़ियां चला करती थीं, लेकिन अब तो रंग-बिरंगी गाड़ियां सड़कों पर बेतहाशा दौड़ रही हैं। 


अब तो देखना कम, दिखाने की तो अंदर से सुलग रही है। पश्चिम की ओर जाने वाली सड़क के जल-थल किनारों को पाट कर हर जगह दुकानें और मकानें बन गयी हैं। एक समय ये किनारे बीरपुर के प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाते थे, बढ़ती आबादी ने निगल लिया। कॉलोनी के चारों ओर बसते शहर की तस्वीर अब अंदर से डराने लगी है। एक दर्द और टीस मारता है कि जिस राह पर वे और मैं चले थे, वे रास्ते कहीं गुम हो गए हैं और शेष रह गयी हैं जीर्ण- शीर्ण यादें!
(मेरी ओर से ‘84 बंधन’ को समर्पित)

बीरपुर सपनों का नगर

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