तो क्या लोक तंत्र खतरे में पड़ गया है?

लेखक: शाहनवाज़ भारतीय, Ph.D., जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली

Ashraf Ali Bastavi

जो दल, संगठन या नेता ख़ुद अपने संविधान की धज्जियाँ उड़ाएँ वो देश के संविधान को नहीं बचा सकते! जो दल/संगठन समय पर अपना आन्तरिक चुनाव अपने संविधानुसार नहीं करा पाती, वो देश मे संविधानुसार चुनाव की लड़ाई कैसे लड़ पाएगी? जिस संगठन या दल में आंतरिक लोकतंत्र नहीं उससे देश का लोकतन्त्र नहीं बच सकता!

उदारवादी लोकतंत्र का सबसे प्रचलित व्याख्या अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने किया है! उनके अनुसार लोकतंत्र “जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए” एक शासन प्रणाली है! लोकतंत्र शब्द का अंग्रेजी पर्याय ‘डेमोक्रेसी’ है, जिसका संधिविच्छेद ‘डेमोस’ और ‘क्रेसी’ के रूप में किया जाता है! डेमोस का अर्थ ‘जनसाधारण’ और क्रेसी का अर्थ ‘शासन’ या सरकार से है! अर्थात: लोकतंत्र को ‘जनसाधारण का शासन’ या जनता का शासनके रूप में जाना जाता है! वैसे तो लोकतंत्र की संकल्पना कई प्रकार से की जाती है, परन्तु मूल रूप से लोकतांत्रिक प्रणाली में शासन या सत्ता का अंतिम सूत्र जनसाधारण के हाथों में रहता है ताकि सार्वजनिक नीति जनता के इच्छानुसार तथा जनसाधारण के हित में बने और उसका उसी प्रकार क्रियान्वयन हो!

जनसंख्या वृद्धि के कारण जनसाधारण को प्रत्यक्ष रूप से हर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेना संभव नहीं है, इसीलिए ‘व्यस्क मताधिकार’ के माध्यम से जनता का ही प्रतिनिधि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेता है! इसके बदले जनता अपने प्रतिनिधि को तनख्वाह देती है! जब प्रतिनिधि का चुनाव ही कुछ वर्गों तक सीमित कर दिया जाता है या षड्यंत्र रूपेण कुछ लोग ही सत्ता में आते रहते है, तो जनसाधारण के दुःख-दर्द को समुचित महत्व ना देकर अभिजात वर्ग अपनी सत्ता बचाने में सारी योग्यताएं लगा देते हैं! तभी जनसाधारण को लगने लगता है कि लोकतंत्र ख़तरे में है!

सर्वाधिकारवाद और फासीवाद, राष्ट्रवाद के ही रास्ते आते हैं! जिसमें सरकार अपने नागरिकों के जीवन के हर पहलू को निर्देशित और नियंत्रित करने लगती है तथा राष्ट्र के संसाधनों को सत्ता प्राप्ति के षड्यंत्र में लगाने लगती है और विरोधियों को राष्ट्रद्रोही कहकर जेल में डालने लगती है या ग़ायब ही करा देती है! जब एक व्यक्ति, एक विचार, एक नेता, एक नीति, एक सभ्यता, एक संस्कृति ही राष्ट्रवादी हो जाए और वाकी सभी राष्ट्रद्रोही तो समझिए सर्वाधिकार्रवाद अब फासीवाद बन चुका है! दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का मानना है कि, “अगर आप फासीवाद के सारे तत्त्वों को एक साथ जमा होने की प्रतीक्षा करेंगे तो शायद बहुत देर हो चुकी होगी और इसका मुकाबला करने के साधन नष्ट किए जा चुके होंगे”!

ख़ैर, जब हम लोकतंत्र ख़तरे में है, ऐसा सोचने लगते हैं तो हमें सोचना चाहिए कि लोकतंत्र क्यों ना ख़तरे में हों जब,

1. जनसंपर्क के साधन और अभिकरण पर सत्ताधारी का बर्चस्व हो जाए!

2. सहभागितामूलक लोकतंत्र बहुलवादी हो जाय!

3. उदार लोकतंत्र पूँजीवाद का कठपुतली बन जाय!

4.वैचारिक भ्रांति फैलाना मीडिया का दायित्व बन जाय!

5. धर्म, जाति, सम्प्रदाय और समुदाय के विभाजन को स्थापित किया जाय!

6. राजनीतिक हित के लिए सामाजिक विन्यास होने लगे!

7. व्यक्तिगत मानसिकता, पारिवारिक क्रियाकलाप तथा सामाजिक संरचना अलोकतांत्रिक हो जाय!

8.सामाजिक तथा राजनीतिक संगठन असंवैधानिक तथा अलोकतांत्रिक हो जाय! जहाँ समय पर चुनाव ना हो और ख़ुद अपने संविधान पे चलने में अक्षम हो जाय!

9. सत्तासीन तथा सत्ता विरोधी समूहों में आपसी सांठगांठ हो जाय!

10. जब क़ानून बनाने वाले और उसको लागू करने वाले असंवैधानिक काम को संवैधानिक बनाने को आतुर हों!

हम यह जानते हैं कि फ़ासीवादी शक्तियां सर्वप्रथम संविधान पे वार करती हैं और उसे अपने विचारानुसार लिखने की कोशिश करती है क्योंकि संविधान लागू करना, संविधान लिखने से ज़्यादा कठिन है! एक बात तो तय है चाहे सर्वाधिकारवाद हो या फासीवाद दोनों ही मानव समाज के लिए ख़तरनाक है!

मनुष्य में न्याय की क्षमता पाई जाती है- इसलिए लोकतंत्र संभव है! परन्तु मनुष्य में अन्याय की प्रवृत्ति पाई जाती है-इसलिए लोकतन्त्र आवश्यक है!

~ राइनॉल्ड नैबूर

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