मानू में ‘मी-टू’, जानें प्रोफेसर पर लगे यौन शोषण के आरोपों की सच्चाई

Awais Ahmad

विश्वस्तर पर जनसमाज मे परिवर्तन हेतु विदेशी अभियान मी टू चर्चा बहुचर्चित है। भारत मे भी यह अभियान बहुत लोकप्रिय है। भारत मे सबसे पहले मी टू अभियान के तहत आरोप बॉलीवुड इंडस्ट्री पर लगे और फिर इस पर सियासत शुरू हुई और इसी सियासी समाजी शोरगुल में यह अभियान सियासी गलियारे में भी पहुँच गया। एक तरफ जहां इस अभियान से महिलाओं को बोलने की हिम्मत मिली और वे खुल कर अपनी बात संचार के तमाम माध्यमों के जरिए करने लगीं। वहीं, कुछ ने इसे अवसर के रूप में देखा और इसका गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।

मी टू अभियान हैदराबाद की मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी भी पहुँचा और उर्दू यूनिवर्सिटी के  जनसंचार विभाग के प्रोफेसर पर विभाग की दो पूर्व छात्राओं ने यौन शोषण का आरोप लगाया। हालांकि, प्रोफेसर पर लगे इन आरोपों को जनसंचार विभाग के ही मौजूदा व पूर्व छात्र-छात्राओं के साथ-साथ विभाग के अन्य कर्मचारियों ने सिरे से खारिज कर दिया।

क्या है मामला

बता दें कि ये पूरा मामला उस समय सामने आया जब यूनिवर्सिटी के नवनियुक्त चांसलर फिरोज बख्त अहमद का इंटरव्यू न्यूज साइट ‘काउंटरव्यू’ में  “#MeToo movement in Hyderabad Urdu varsity? Two girl students seek action against authorities” शीर्षक से छपा। जिसमें उन्होंने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर को संबोधित करते हुए छात्राओं की शिकायत संबंधी बातें कही। फिरोज बख्त अहमद के मुताबिक जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग की दो पूर्व छात्राओं द्वारा प्रोफेसर पर यौन शोषण किए जाने की शिकायत की थी। इन छात्राओं का कहना था कि उन्होंने इस संबंध में यूनिवर्सिटी प्रशासन को शिकायत की थी लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। जबकि हकीकत ये है कि दोनों छात्राओं को अनुशासनहीनता के चलते छात्रावास से यूनिवर्सिटी प्रशासन ने निकाल दिया था। बता दें कि वर्तमान में यूनिवर्सिटी के चांसलर और वाइस चांसलर में आपसी मतभेद चल रहा है।  सूत्रों से पता चला कि चासंलर पर यूनिवर्सिटी के ही प्रोफेसर आरोप लगा रहे है कि चांसलर ने खुद प्रेस नोट बना कर मीडिया में प्रेस विज्ञप्ति बाटी थी जिसको कई मीडिया संस्थानों ने चांसलर के नाम से छापा भी था।

जनसंचार विभाग के कई छात्र छात्राओं और पूर्व छात्राओं ने इस आरोप को ग़लत बताया और कहा कि पहली नज़र में यह बहुत ही बेतूकी और बकवास बात लगती है। हमको तो यकीन ही नही हो रहा है कि कोई इस तरह के आरोप भी कोई लगा सकता है। प्रोफेसर के समर्थन में मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के कई छात्र,  छात्रएं और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और स्टाफ़ आगे आया है। सभी का कहना है यह आरोप  यूनिवर्सिटी और प्रोफेसर को बदनाम करने के लिए लगाया गया है। वहीं दूसरी तरफ यूनिवर्सिटी के ही टीचर्स और छात्रों का कहना है कि यह चांसलर द्वारा यूनिवर्सिटी को बदनाम करने की साज़िश के तहत किया जा रहा है। वह जान बूझ कर इस मामले को तूल देना चाह रहे है। जबकि विशाखा गाइड लाइन के तहत आरोप लगाने वाली छात्रा और आरोपी का नाम गोपनीय रखा जाता है। उससे बाद भी यूनिवर्सिटी के चांसलर इस मामले में बार बार आरोप लगाने वाली छात्रा और प्रोफेसर का नाम सोशल मीडिया पर उछाल कर अपने फायदे के लिए यूनिवर्सिटी की छवि खराब करने पर लगे हुए है।

जनसंचार विभाग के वरिष्ठ शोधार्थी ने कहा, “मैं सर को पिछले करीब दस साल से जानता हूं। वह बहुत ही अच्छे व नेक इंसान हैं। उनके ऊपर लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद हैं। यूनिवर्सिटी की आंतरिक राजनीतिक कलह में जबरद्स्ती उनके नाम को घसीटने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए यूनिवर्सिटी की कुछ आंतरिक शक्तियां इन छात्राओं का सहारा ले रही हैं। छात्राओं के आरोप में रत्ती भर की सच्चाई नहीं है।”

जनसंचार विभाग में शोध की छात्रा ने बताया कि “जब उनको इस आरोप के बारे में पता चला तो उनको यकीन ही नही हुआ और उनको शॉक लगा की उनके प्रोफेसर पर किसी छात्रा ने इस तरह का आरोप लगाया है। उन्होंने ने बताया कि यह आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद है और सिर्फ प्रोफेसर और विभाग को बदनाम करने के लिए लगाया गया है।”

उन्होंने ने कहा कि “पिछले चार साल से में यहाँ पर शोध  कर रही ही हूँ जहां तक मैं प्रोफेसर को जानती हूं वह इस तरह के नही है। आज तक कभी उन्होंने मुझसे मेसज के ज़रिए बात नही ना ही मुझको अकेले अपने आफिस में बुलाया। मैं तो यकीन से कह सकती हूं प्रोफेसर पर जो आरोप लगाया जा रहा है वो पूरी तरह से झूठा है और झूठ का एक पुलिंदा है।”

जनसंचार विभाग की ही एक पूर्व छात्रा उम्मेहानी  सरफराज जो अभी 4 टीवी इंडिया में एंकर है उन्होंने बताया कि “जिस छात्रा ने प्रोफेसर पर यह आरोप लगाया है वह उनकी जूनियर है और वह उस छात्रा को सही से जानती है। प्रोफेसर के आरोप के बारेके उन्होंने कहा कि यह ग़लत आरोप है। प्रोफेसर का आचरण इस तरह के नही है। मुझको तो यकीन ही नही हो रहा कि उनके ऊपर इस तरह के आरोप क्यों लगाया गया है।”

उन्होंने ने कहा कि “छात्रा की मनोवैज्ञानिक स्थिति सही नही लगती थी। पीड़ित छात्रा को अटेंशन पाने की बहुत जिज्ञासा थी। उसको लगता था कि विभाग उसकी अनदेखी कर रहा है। इसको लेकर उसने प्रोफेसर से वक बार कहा भी था जिसके बाद विभाग के कार्यकर्मों में उस छात्रा की भागीदारी बढ़ा भी दी गई। ताकि उसको छात्रा को यह ना लगे कि विभाग उसकी अनदेखी कर रहा है।”

वहीं नाम छिपानी की शर्त की पर एक छात्रा ने कहा कि “जिस छात्रा ने प्रोफेसर पर आरोप लगया है। उसका प्रथम सेमेस्टर में अपनी ही क्लास के एक छात्र से झगड़ा हो गया था और उसने छात्र को चप्पल मार दी थी। जिसके बाद यह मामला प्रॉक्टर के पास गया था और उन दोनों छात्र छात्राओं को निलंबित कर दिया गया था । जिसको लेकर पीड़ित छात्रा प्रोफेसर के पास जाकर अपने निलंबन को रद्द करने के लिए कहा था जिसमे प्रोफेसर ने उसकी मदद करने से मना कर दिया था और कहा था कि यूनिवर्सिटी की कमेटी ने जांच करने के बाद ही दोनों छात्र छात्राओं का निलंबन किया है। इसमें वह कुछ नही कर सकते है। जिसके बाद छात्रा प्रोफेसर से कुछ चिढ़ गई थी। मुझको लगता है उसने यह आरोप उसकी खुन्नस में लगया है।”

वही जनसंपर्क विभाग के ही शोध के छात्र दानिश खान ने कहा कि “मैं जनसंपर्क विभाग में पिछले 6 साल से हूँ। प्रोफेसर को बहुत करीब से जानता हूँ उनपर लगे सभी आरोप बेबुनियाद और ग़लत है। ऐसा लगता है यह आरोप छात्रा ने किसी के बहकावे में आकर लगाया और यह चांसलर साहब के ज़रिए यूनिवर्सिटी को बदनाम करने के लिए किये जा रहे षड़यंत्र के तहत किया गया है। चांसलर अपने कुछ निजी फायदे के लिए इस तरह की ओछी हरकत पर उतर आए हैं।”

वही जनसंपर्क विभाग की पूर्व छात्रा रुखसार अंजुम ने अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखा कि “यह एक झूठी और ग़लत खबर जो किसी की इज्ज़त, शोहरत और ज़िंदगी को बर्बाद कर सकती है आप इस तरह की खबरों पर यकीन ना करे।” अपने ब्लॉग में रुखसार आगे लिखती है कि ” मैं उस विभाग की खुद छात्रा रह चुकी हूं और मुझे मालूम है कि प्रोफेसर का किरदार कैसा है। वह अपने छात्रों के भविष्य के लिए जी जान से लगे रहते है और वह सभी छात्रों के लिए पिता समान है। उनकी कोशिशों की वजह से है जनसंपर्क की अपनी अलग पहचान है और  एहतिशाम अहमद सर की वजह से ही विभाग के छात्र अलग अलग मीडिया चैनलों में जॉब कर रहे हैं।”

जनसंपर्क विभाग में एम ए की एक छात्रा ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा कि “एक व्यक्ति जो हमारे पिता समान ही नही हमारे मेंटर, मोटिवेटर भी हैं। वह सिर्फ अपने विभाग के छात्रों ही दूसरे यूनिवर्सिटी के सभी छात्रों के लिए पिता समान है। मैं यह कहना चाहती हूं कि मैं एक ऐसे विभाग में पढ़ रही हूं जहां लड़कों की संख्या ज़्यादा है और मैने कभी अपने आप को असुरक्षित नही मसूस किया। मुझको गर्व है कि जनसंपर्क विभाग की और मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी की छात्रा हूं।”

उन्होंने अपनी पोस्ट में आगे लिखती है कि “आरोप लगाने वाली लड़की ने ही सिर्फ विभाग नही छोड़ा उसके साथ उसके ही क्लास के छात्र ने भी विभाग छोड़ा, क्योंकि दोनों में लड़ाई हुई थी। छात्रा की अपने क्लास ही नही होस्टल के ज़्यादातर छात्र छात्राओं के साथ लड़ाई थी। क्योंकि की उसको ईगो की प्रॉब्लम है।”

वह अपने पोस्ट में आगे लिखती है कि “प्रोफेसर पर आरोप लगाने वाली छात्रा का होस्टल में अपने रूममेट से ही नही हर उस छात्रा से परेशानी थी जिससे भी वह मिलती थी। उसके रूममेट की शिकायत के बाद जब उसको दोषी पाया गया तो उसको डोरमेट्री में रहने को कहा गया। वहां पर भी उसका व्यवहार सही नही था। मैं यह सब इन लिए कह रही हूं क्योंकि में इसकी चश्मदीद हूँ।”

उन्होंने अपने पोस्ट में यूनिवर्सिटी के चांसलर को ज़िम्मेदार मानते हुए आगे लिखा कि “एक व्यक्ति  जो यूनिवर्सिटी के उत्थान के लिए काम कर रहा है उस पर और यूनिवर्सिटी पर इस तरह की झूठे आरोप लगाने के लिए चांसलर को शर्म आनी चाहिए।”

मैंने भी मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के जनसंपर्क विभाग से ही मास्टर की डिग्री हासिल की है। प्रोफेसर पर लगे आरोप के बारे में जब मुझको पता चला तो मुझको भी दूसरों की तरह यकीन नही हो रहा था कि कोई छात्रा इतने साफ छवि के प्रोफेसर पर इस तरह के आरोप कैसे लगा सकती है। जहां तक मैं खुद प्रोफेसर को जनता हूँ वह अपने आफिस लड़कों को भी ज़्यादा वक़्त नही बिताने देते। इतनी साफ छवि और यूनिवर्सिटी के उत्थान के लिए काम करने वाले  उस प्रोफेसर पर इस तरह के झूठे आरोप क्यों लगाए जा रहे है।

सूत्रों ने हमको बतया की 2015 की बेंच की एक पूर्व छात्र ने भी प्रोफेसर पर इस तरह के आरोप लगाए जब कि उस छात्रा को उसके संदिग्ध बर्ताव में लिप्त पाने के बाद यूनिवर्सिटी की ही जांच कमेटी ने होस्टल से सस्पेंड कर दिया था और फिर वह छात्रा प्रोफेसर के पास उसके निःशक्सन को रद्द करने के लिए गुहार लगाने के लिए गई थी। जिस पर प्रोफेसर ने उसकी सहायता में मदद करने से इनकार करते हुए कहा था यह कमेटी का फैसला है उसमें उसकी कोई मदद नही कर सकते। सूत्रों ने बताया कि जिसके बाद उस छात्रा ने कुछ समय बाद यूनिवर्सटी की सेक्सुअल हैरेसमेंट की कमेटी में प्रोफेसर पर मानसिक तौर पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था। बता दें कि यूनिवर्सटी की सेक्सुअल हैरेसमेंट की कमेटी में यूनिवर्सिटी के सीनियर प्रोफेसर जिनमे अधिकतर महिलाएं है और एनजीओ के लोग सदस्य होते है। जांच के बाद यूनिवर्सिटी की कमेटी ने प्रोफेसर पर लगे उस आरोप को ग़लत माना था। यह मामला भी मीडिया में बहुत उछाल गया था और कई लोगो को उस छात्रा को प्रभावित कर आरोप में प्रोफेसर का नाम भी शामिल करने के लिए कहा। सूत्रों से पता चला कि जब शुरू में छात्रा ने ICC में अपनी शिकायत दर्ज कराई थी तब उसमें प्रोफेसर का नाम नही था लेकिन बाद में उसमे प्रोफेसर का नाम भी शामिल किया गया।

साफ तौर पर दोनों छात्राओं द्वारा प्रोफेसर पर लगे सभी आरोप बेबुनियाद और झूठे है और यह यूनिवर्सिटी को बदनाम करने के लिए चांसलर के ज़रिए रचे जा रहे षड्यंत्र का एक हिसा है। चांसलर ने इस मामले को अपने फेसबुक पर पोस्ट किया और आरोप लगाने वाली छात्रा का नाम 22 से 24 अकटुबर पर अपनी पोस्ट में लिखा। जो साफ तौर पर विशाखा की गाइड लाइन और सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन की दज्जियाँ उड़ता है जिसमे यह कहा गया है कि इस तरह के मामले किसी भी पीड़ित का नाम और तस्वीर ब्लर करके भी मीडिया, सोशल मीडिया में नही पब्लिश होना चाहिए।

बहरहाल जिस तरह की बात यूनिवर्सिटी से निकल के आ रही है उससे यही साफ होते है इस पूरे मामले में चांसलर का हाथ है। और चांसलर बार बार इस मामले को मीडिया में उठा रहे है वहीं इसके उलट यूनिवर्सिटी के सभी प्रोफेसर, स्टाफ़ और छात्र प्रोफेसर के साथ खड़े हुए है। अगर प्रोफेसर के साथ इतने लोग खड़े है तो वह सब झूठ तो नही बोल रहे होंगे। अगर प्रोफेसर पर लगे आरोप सही है तो क्या प्रोफेसर के समर्थन में खड़े छात्र और कार्यरत प्रोफेसर और स्टाफ़ भी दोषी है क्या??? अगर यह सब लोग सही है तो चासंलर क्यों इस मामले को तूल दे रहे है।

ऐसा भी कहा जा रहा है 2015 के मामले की दुबारा जांच कराने की बात भी हो रही है। जब यूनिवर्सिटी की ही जांच कमेटी ने उसके आरोप को बेबुनियाद और झूठा माना था तो चांसलर क्यों दुबारा जांच की बाद कर रहे है और जब 2015 में छात्रा के आरोप गलत साबित हुए थे तो 2018 में उस मामले को मी टू के तहत क्यों लिखा जा रहा है। क्या यह प्रोफेसर और यूनिवर्सिटी को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। क्या यूनिवर्सिटी के चांसलर ने अपने व्यक्तिगत  लाभ के लिए इस तरह की हरकत कर रहे है।

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