गुजरात ने मोदी को रोका तो नहीं मगर उनके रथ की रफ्तार को धीमा कर दिया है

रवीश कुमार

एशिया टाइम्स

गुजरात में 5 लाख 51 हज़ार 605 मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल किया है. करीब साढ़े पांच लाख मतदाताओं ने बीजेपी या कांग्रेस में से किसी को वोट देने लायक नहीं समझा. अगर इतने मत किसी एक पार्टी की तरफ पड़ते तो उसके खाते में 25 सीटें और जुड़ जातीं. राजनीतिक दलों को नोटा के खाते में जाने वाले इन मतदाताओं के बारे में सोचना चाहिए, हो सकता है उन्हें उम्मीदवार पसंद नहीं आया हो, भाषण पसंद नहीं आया हो, राजनीति का तरीका ही पसंद न आया हो. गुजरात के नतीजों को देखें तो बीजेपी हारते हारते जीत गई है और कांग्रेस जीतते जीतते हार गई है. 22 साल बाद बीजेपी फिर से सरकार बना रही है. जीत भले सामान्य अंतरों से हो मगर यह जीत ऐतिहासिक भी है. लगातार छठी बार सरकार बना लेना आसान नहीं होता है. क्यों बनी, कैसे बनी यह सब विश्लेषण के विषय है. नतीजों के दिन एक बार नतीजों को भी समग्र रूप से देख लेना चाहिए. चर्चाएं बहुत हो चुकी हैं. होती भी रहेंगी.

– गुजरात ने बीजेपी को सरकार दिया है तो ख़ुद को एक विपक्ष भी दिया है.
– गुजरात ने मोदी को रोका तो नहीं मगर उनके रथ की रफ्तार को धीमा कर दिया है.
– गुजरात ने राहुल के रथ को मंज़िल नहीं दी मगर उसकी रफ़्तार को तेज़ कर दिया है.
– गुजरात ने जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर जैसे नए युवा नेताओं को भी चुना है.

गुजरात ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जो सुंदर संतुलन बनाया है वह बहुत कमाल का है. यह एक ऐसा नतीजा है जिससे किसी का दिल नहीं जला होगा. भले किसी के सारे सपने पूरे न हुए हों. बीजेपी को संदेश दिया कि आप ख़ुद को ठीक कीजिए और कांग्रेस को संदेश दिया कि आप थोड़ी और कोशिश कीजिए. राहुल गांधी इस चुनाव से नेता बनकर उभरे हैं तो नरेंद्र मोदी इस चुनाव से अपराजेय बनकर निकले हैं कि वो आख़िरी गेंद पर छक्का मार कर मैच जिता सकते हैं.

18 दिसंबर के नतीजे का यादगार पल रहा सुबह 9 से 10 बजे के बीच जब अचानक रुझानों में कांग्रेस और बीजेपी एक दूसरे आगे पीछे होने लगे. हमने अपने कार्यक्रम की शुरुआत एक ऐसे ग्राफिक्स से की थी जो बता रहा था कि बीजेपी के सरकार बनाने के 90 फीसदी चांस हैं और कांग्रेस के 10, रुझानों ने उस ग्राफिक्स को कुछ वक्त के लिए बदल दिया और एक वक्त पर दिखाने लगा कि कांग्रेस और बीजेपी के सरकार बनाने के चांस 50-50 परसेंट है. फिर ये ग्राफिक्स बदलने लगा कि बीजेपी के सरकार बनाने के चांस का प्रतिशत बढ़ने लगा. करीब एक घंटे का यह लम्हा बेहद तनाव और रोमांच भरा था. दोनों के लिए, बीजेपी के लिए भी और कांग्रेस के लिए भी. दोनों दलों के नेताओं और पत्रकारों की सांसे अटक गईं. लगने लगा कि नतीजा कुछ भी हो सकता है. मगर अंत में बीजेपी के लिए सब अच्छा हुआ. रुझान अब बीजेपी की तरफ मुड़ चुके थे.

इस चुनाव का एक बड़ा मुद्दा था जीएसटी और उसका गढ़ था सूरत जहां के टेक्सटाइल व्यापारियों ने महीनों आंदोलन चलाया. उनके आंदोलन में भीड़ भी हुआ करती थी, इससे कांग्रेस को उम्मीद हुई होगी कि जीएसटी और हार्दिक के प्रति बढ़ते पटेलों के आकर्षण के कारण बीजेपी यहां हार सकती है. सूरत बीजेपी का गढ़ रहा है. हाल के कई चुनावों में बीजेपी जमकर जीतती रही है.

राहुल गांधी ने जीएसटी को लेकर व्यापारियों तक पहुंचने के लिए गब्बर सिंह टैक्स का नारा गढ़ा. राहुल गांधी टैक्सटाइल फैक्ट्री में गए, व्यापारियों से संवाद कायम किया तब भी किसी को नहीं लग रहा था कि सूरत के व्यापारी बीजेपी का साथ छोड़ देंगे. जीएसटी को लेकर नाराज़गी इस उम्मीद को हवा देती रही. अंत में जब नतीजा आया तो यही निकला कि व्यापारियों ने अपने धंधे में लाखों करोड़ों का नुकसान तो सहा मगर बीजेपी को राजनीतिक नुकसान नहीं होने दिया. यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बीजेपी ने चुनाव के बीच जीएसटी को लेकर कई सुधार कर दिए थे. हमारे सहयोगी महावीर रावत ने बताया कि सूरत में नारा चलाया गया कि व्यापारी नाराज़ हो सकता है मगर गद्दार नहीं हो सकता है. सूरत के व्यापारियों ने अपने ही आंदोलनों और नाराज़गी को हरा दिया और बीजेपी को जिता दिया. ऐसा बहुत कम होता है, तभी होता है जब नेता और पार्टी के प्रति राजनीतिक निष्ठा आर्थिक नुकसान से बहुत ऊपर हो. ऐसी किस्मत शायद ही किसी पार्टी को हासिल होती है.

सूरत ज़िले में 16 सीटें हैं. सूरत शहर में तीन सीटें हैं. सूरत में बीजेपी जीतती रही है. कांग्रेस को यहां से दो सीटें मिली हैं. सूरत में कांग्रेस पिछली बार से सिर्फ एक सीट ज़्यादा हासिल कर पाई है. 2012 में बीजेपी ने मंगरोल सीट 15,714 वोटों के अंतर से जीती थी. 2017 में बीजेपी यह सीट 13,914 वोटों के अंतर से हार गई. 2012 में मांडवी में कांग्रेस जीती थी 24,394 मतों से. 2017 में मांडवी में कांग्रेस ने 50,776 वोटों से जीत हासिल की है.

मांडवी में कांग्रेस ने अपना मत डबल तो कर लिया मगर सूरत में वह बड़ी जीत हासिल नहीं कर पाई. सूरत ने कांग्रेस के रथ को रोक दिया. बीजेपी को यहां 14 सीटों पर जीत हासिल हुई है. सूरत की कुछ सीटों पर बीजेपी के वोट में बहुत कमी भी नहीं आई, कुछ सीटों पर उसकी जीत का अंतर 2012 की तुलना में बढ़ गया.

चौरयासी सीट पर बीजेपी ने 67,638 वोट से जीता था, इस बार 1,10,819 वोट से जीत हासिल की है. 2012 में माजुरा सीट पर 71,556 से जीत मिली थी, इस बार 85,827 वोटों से जीत हुई है. 2012 में उधना सीट पर बीजेपी 32,754 वोटों से जीती थी, इस बार 42,528 वोटों से जीती है. सूरत पश्चिम में 69,721 से जीती थी, इस बार 77,882 वोटों से जीती है. सूरत पूर्व और सूरत उत्तर में बीजेपी के वोट कम हुए मगर जीत उसे ही मिली. सूरत में जीएसटी का मुद्दा नहीं चला. सूरत ज़िला बीजेपी के साथ चट्टान की तरह खड़ा रहा.

गुजरात में शहरी सीटों की संख्या 59 मानी जाती है. यहां बीजेपी के पक्ष में 1 प्रतिशत का स्विंग हो गया यानी उसका वोट बढ़ गया. बीजेपी ने शहरों में अपना नुकसान रोक लिया. सिर्फ दो सीटों का नुकसान हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस जीत पर राहत की सांस ली और हिमाचल प्रदेश और गुजरात की जीत का जश्न मनाने पार्टी मुख्यालय आए. इस बात से बेफिक्र कि सीटों का अंतर कम हुआ है, दरअसल ये विषय विश्लेषकों के होते हैं, राजनेता के लिए सिर्फ जीत होती है और जीत हो चुकी थी.

क्या कांग्रेस ने जीएसटी के मसले को गलत समझा. राहुल गांधी बार-बार कहते रहे कि उन्होंने गुजरात के लोगों से बात कर मुद्दे तय किए हैं. जीएसटी के मसले पर तकलीफ के बाद भी सूरत ने जिस तरह से बीजेपी का साथ दिया है वह अभूतपूर्व है. कांग्रेस ने सिर्फ सौराष्ट्र में अच्छा प्रदर्शन किया. सौराष्ट्र इलाके में 56 सीटें हैं, यहां कांग्रेस को 32 सीटें मिली हैं और बीजेपी को 23 मिली हैं. सौराष्ट्र में बीजेपी को 15 सीट का फायदा हुआ है और बीजेपी को 13 सीट का नुकसान हुआ है.

कांग्रेस सौराष्ट्र की बढ़त बाकी क्षेत्रों में नहीं बना सकी. उसके तीनों प्रमुख चेहरे शक्ति सिंह गोहिल, अर्जुन मोडवाडिया और सिद्धार्थ पटेल चुनाव हार गए. बीजेपी सरकार बनाने की ट्रॉफी लेकर जा चुकी है. कांग्रेस चाहे तो इस बात से संतोष कर सकती है कि प्रधानमंत्री के जन्मस्थान वडनगर जिस विधानसभा क्षेत्र में है, ऊंझा विधानसभा से बीजेपी हार गई है. 1995 के बाद पहली बार यहां से हारी है.

1995 – 121
1998 – 117
2002 – 127
2007 – 117
2012 – 115
2017 में 99

1995 से लेकर पांच चुनावों तक बीजेपी ने गुजरात जीता है और हर बार 100 से अधिक सीटों पर जीत हासिल की है. 2017 में पहली बार 100 से कम सीटें आई हैं. प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में 1995 के 121 का तो ज़िक्र तो किया मगर बाकी का सिर्फ ज़िक्र किया, सीटों की संख्या का ज़िक्र नहीं किया. इसके बाद भी प्रधानमंत्री ने गुजरात बीजेपी के कार्यकर्ता, नेता सबको बधाई भी दी. गुजरात की जनता को भी बधाई.

2017 में बीजेपी को 49.1 प्रतिशत मत मिला है. सीटें कम हुई हैं मगर बीजेपी ने मत प्रतिशत में वृद्धि की है. वोट प्रतिशत कांग्रेस का भी बढ़ा है और सीटें बढ़ी हैं. कांग्रेस ने 1990 के बाद पहली बार इतना अच्छा प्रदर्शन किया था. कांग्रेस को 1990 में 33 सीटें मिली थीं, उसके बाद के चार चुनावों में 45 से 61 के बीच ही सीटें मिलती रहीं. 2017 में पहली बार कांग्रेस को 80 सीटें मिली हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी मौका था कि वे जवाबी भाषण देते मगर उन्होंने सिर्फ ट्वीट किया.

प्रधानमंत्री मोदी जीत के बाद अपने कार्यकर्ताओं के बीच आकर संबोधित कर रहे थे, प्रदर्शन राहुल की पार्टी का भी खराब नहीं था, वह भी इस मौके पर अपने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा सकते थे. प्रधानमंत्री ने फिर से कहा कि एक भी गुजराती उनसे अलग नहीं हो सकता है. उन्होंने आहवान किया कि फिर से मिलजुल कर काम करते हैं. प्रधानमंत्री ने अमित शाह की भी जमकर तारीफ की.

बीजेपी नतीजा आने के बाद कांग्रेस पर जातिवाद फैलाने का आरोप लगाती रही मगर आप टिकटों का बंटवारा देखें तो दोनों दलों ने जाति के हिसाब से टिकट दिए. पटेल आंदोलन के कारण एक बार लगा कि बीजेपी का आधार खिसक रहा है. पटेल बहुल क्षेत्र में कांग्रेस को लाभ तो हुआ मगर बीजेपी ने भी अच्छा किया है. हार्दिक पटेल भले ईवीएम मशीन से छेड़छाड़ होने की बात कर रहे हैं मगर नतीजे बता रहे हैं कि पटेलों ने हार्दिक का साथ नहीं दिया. विसनगर जहां से पटेल आंदोलन शुरू हुआ था वहां से बीजेपी जीती है. घाटोल्डिआ सीट आनंदीबेन पटेल की थी, उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा मगर उनकी सीट पर भी बीजेपी भारी मतों से जीती है.

घटोल्डिया से बीजेपी के भूपेदरभाई पटेल ने कांग्रेस के शशिकांत पटेल को 1,17,750 वोटों से हराया. चोरयासी से हितेश पटेल ने कांग्रेस के योगेश पटेल को 1,10819 वोटों से हराया. मणिनगर से बीजेपी के सुरेश पटेल ने कांग्रेस के ब्रह्मभट्ट श्वेताबेन नरेन्द्र भाई को 75,199 वोट से हराया.

चुनाव आयोग ने कहा है कि तीन करोड़ मतदाताओं ने वीवीपैट से वोट दिया है. सबने देखा था कि उनका वोट किसे पड़ा है तो ईवीएम से छेड़छाड़ कैसे हो सकती है. गुजरात चुनाव ने किसी को निराश नहीं किया है. बीजेपी को सत्ता दी है तो कांग्रेस के रूप में विपक्ष. यही नहीं जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर को भी विधानसभा भेज दिया है. जिग्नेश निर्दलीय उम्मदीवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं. जिग्नेश ने लोगों से चंदा लेकर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की है. बनासकांठा के वड़गाम सीट से जिग्नेश ने बीजेपी के विजयकुमार को करीब 20,000 वोटों से हरा दिया. राधनपुर से अल्पेश ठाकोर ने बीजेपी के लविंग जी ठाकोर को 15000 वोटों से हराया है.

कांग्रेस के कई बड़े नेता हारे हैं तो बीजेपी के नेताओं में शंकर चौधरी, दिलीप सांघनी, आत्माराम परमार, चिमन भाई सापरिया और जयनारायण व्यास हार गए हैं. इस चुनाव में कई ऐसी सीटें थीं, जहां हार जीत का फासला बहुत कम वोटों से हुआ. 22 सीटों पर 3000 से कम पर फैसला हुआ है. वैसे हर चुनाव में होता है फिर भी आज जीतने वालों का दिन है, जितने का ज़िक्र हो जाए, उतना ही अच्छा रहेगा.

गोधरा से बीजेपी के सी के राउलजी ने कांग्रेस के राजेन्द्र सिंह परमार को 258 वोटों से हराया. मोदसा से कांग्रेस के राजेन्द्र सिंह ठाकोर ने बीजेपी के भिखूसिंह जी परमार को 147 वोटो से हराया. कापर्डा से कांग्रेस के जीतुभाई चौधरी ने बीजेपी के उम्मीदवार को 170 वोट से हराया. ढोलका से बीजेपी के भूपेन्द्र सिंह चुदास्मा ने कांग्रेस के अश्विन भाई राठौड़ को 327 वोटों से हराया. मनसा में कांग्रेस के सुरेश पटेल ने बीजेपी के अमित भाई चौधरी को 524 वोटो से हराया.

गुजरात में इस बार महिला विधायकों की संख्या 11 होगी. बीजेपी के हर्ष श्याम जी सबसे कम उम्र के विधायक होंगे. कई बार लगता है कि प्रधानमंत्री के आक्रामक कैंपेन से नतीजों पर फर्क पड़ा.

एग्ज़िट पोल की भी पोल खुली है इसी बार. किसी भी एग्ज़िट पोल में बीजेपी के लिए सबसे अधिक टुडे चाणक्या ने 135 का अनुमान बताया था, सबसे कम सी-वोटर ने 108, इंडिया टीवी ने 104-114 दिया था, यानी किसी भी एग्ज़िट पोल ने बीजेपी के लिए 100 से कम सीट का अनुमान नहीं बताया था. सरकार बनने का ट्रेंड ज़रूर सही साबित हुआ मगर नंबर के मामले में एग्ज़िट पोल फेल रहे. इस वक्त जब मैं प्राइम टाइम पढ़ रहा हूं बीजेपी को सौ से कम सीटें आईं हैं. एग्जिट पोल में कांग्रेस को 42, 47, 64, 65, 66, 68 सीटें दी थीं. सब ग़लत साबित हुए. गुजरात चुनाव की शुरुआत कांग्रेस के विकास पागल हो गया है से शुरू हुआ. प्रधानमंत्री मोदी ने इस चुनाव का समापन विकास के नारे से किया. अपने कार्यकर्ताओं से नारा लगवाकर.

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