फूल वालों की सैर: सेकुलर भारत की धरती पर सांप्रदायिक एकता की पुष्पांजलि

Asia Times Desk

तेरहवीं सदी के सूफी संत कुत्बुद्दीन बख्तियार काकी के मेहरौली स्थित दरगाह के खादिम सैयद फरीद उद्दीन कुत्बी जब वहां से चंद कदमों पर स्थित योगमाया मंदिर में पुष्प-छत्री अर्पित कर निकले तो बोले कि इस छोटे से मंंदिर के गर्भगृह में फैली अगरबत्ती और चमेली की खुशबू से वही शांति और महान अदृश्य शक्ति की अनुभूति हुई जो मुझे दरगाह में मिलती है।
फूल वालों की सैर सन 1800 से चला आ रहा एक वार्षिक आयोजन है जिसका मकसद साम्प्रदायिक सद्भावना और सकारात्मक सांस्कृतिक आदान-प्रदान है। कुत्बी का वहां जाना उसी आयोजन का एक भाग है। कुत्बी की तरह बहुत सारे लोग धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर दूसरे समुदाय के लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करत हैं कि वे उन उपासना स्थलों में फूल और ‘पंखा’ भेंट करें जो उनके अपने नहीं मान्ो जाते।
इस उत्सव की जड़ें अंतिम मुगल बादशाहों और बहादुर शाह जफर के पिता अकबर शाह द्वितीय के शासनकाल तक जाती हैं। अकबर शाह द्वितीय उसी दरगाह के बगल में दफन किया गया है।
ऐसा कहा जाता है कि जब अकबर शाह द्वितीय के बेटे मिर्जा जहांगीर को अंग्रेजों के आदेश पर बंदी बना लिया गया तो शाह की बीवी ने यह मन्नत मानी कि जब उनका बेटा रिहा होगा तो वे उस सूफी संत की दरगाह पर चादर चढ़ाएंगी। किस्मत की बात कि शाह के बेटे को रिहा किया और मन्नत के मुताबिक चादर पेश की गयी। बादशाह के आदेश पर योगमाया मंदिर में देवी को पुष्प अर्पित किये गये जिससे जनता में काफी उत्साह का वातावरण बना और फिर यह वार्षिक आयोजन बन गया।
इस उत्सव की आोयोजक संस्था अंजुमन सैर-ए-गुल फरोशां के सचिव मिर्जा मोहतरम बख्त ने आईएएनएस को बताया कि यह उत्सव 1940 के दशक में तब रुक गया जब अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की विभाजनकारी नीति अपनायी जिससे भारत के दो सबसे बड़े धार्मिक समूहों में गहरी खाई पैदा हो गयी। उन्होंने बताया कि यह उत्सव 1961-62 में दोबारा भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल ने शुरू करवाया। तब से यह आयोजन हर साल लगातार होता आ रहा है जिसमें दिल्ली के सैकड़ों नागरिक शामिल होते हैं।
आज के गंभीर ध्रुवीकरण के वातावारण में जबकि कुछ समुदायों के खिलाफ घृणाजनित हिंसा इतने उभार पर है और जिनके विरुद्ध सोशल मीडिया पर जहर भी उतना ही उगला जा रहा है, मेलजोल के महत्व वाले इस सप्ताह भर के उत्सव अलग मोड़ पर है।
‘जब हमारे हिन्दू भाई दरगाह में फूलों की चादर चढ़ाते हैं तो मुस्लिम समुदाय के लोग उनके लिए जगह बनाते हैं और उन्हें आगे कर देते हैं। इसी तहर मुसलमानों को देवी योगमाया को पुष्प छत्री भेंट करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। यह दिलों का मिलन होता है और यह तभी संभव है जब लोगों की रूहों में पाकीजगी हो। ’ यह उद्गार कुत्बी के हैं जिन्होंने आईएएनएस से कहा कि वे सभी धर्मों के अतिवादियों से कहेंगे कि दूसरी संस्कृतियों का कम से कम एक बार अनुभव करें।
एक और मेहरौली वासी रजनीश जिन्दल पंद्रह सालों से इस उत्सव में शामिल हो रहे हैंं। उन्होंने कहा कि यह सभी धर्मों और जीवन के हर क्षेत्र के लोगों के साथ सहज रिश्ता बनाने की बात है। ‘आप गुरुद्वारे जाते हैं तो वहां शांति और सहजता पाते हैं, यही आपका मजहब है, यही बात मस्जिद या मन्दिर या चर्च के साथ है। यह व्यक्तिगत आस्था  की बात होनी चााहिए।’ रजनीश ने कहा। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि ‘फूल वालों की सैर’ का मार्ग अक्सर कांटों और खतरों से भरा होता है।
‘लोग कहते हैं कि तुम करके दिखाओ, हम देखते हैं कि तुम कैसे करते हो’। इसके साथ अनुमति अंतिम समय में दी जाती है, लापरवाही और बहाने हमारे लिए कठिनाई पैदा करते हैं, ऐसा तब होता है जब कोई सीधा विरोध नजर नहीं आता है।
पूर्व भूगर्भशास्त्री मिर्जा बख्त कहते हैं कि लेकिन हम इसके जवाब में और उत्साह का प्रदर्शन करते हैं। सत्य की सदा विजय होती है। वे हमारा कारवां नहीं रोक सकते हैं।
सात दिनों के इस उत्सव में पहले चार दिन पतंगबाजी, जुलूस, पहलवानी दंगल, कबड्डी और शहनाईवादन का आयोजन होता है। पांचवें और छठे दिन दरगाह और मंदिर में पुष्प अपिर्त किये जाते हैं। इस साल दिल्ली के  लेफ्टिनेंट गवर्नर अनिल बैजल  ने गुरुवार को दरगाह पर चादर चढ़ाई और दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री कैलाश गहलौत ने शुक्रवार को पुष्प-छत्री अर्पित की।
‘फूल वालों की सैर’ 11 राज्यों की झांकियों और रात भर की कव्वाली के साथ संपन्न हो गया।
(यह साप्ताहिक फीचर शृंखला आईएएनएस और फ्रैंक इस्लाम फाउंडेशन की सकारात्मक पत्रकारिता का अंग है। सिद्धि जैन से siddhi.j@ians.in आईएएनएस ) 

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