फिलिस्तीनी कैसे कहें दुनिया से अपना दुख

लेखकः उर्मिलेश

Asia Times Desk

बीते 17-18 नवंबर को तुर्की के ऐतिहासिक शहर इस्तांबुल में ‘फिलिस्तीन का दुनिया से संवाद’ (पैलेस्टीन एड्रेसिंग द वर्ल्ड) नाम से एक बड़ा सम्मेलन हुआ, जिसमें दुनिया के 66 देशों के तकरीबन 400 पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, लेखकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया‌। इसका आयोजन फिलिस्तीनी मीडिया फोरम ने किया। अल-जजीरा जैसा मध्य पूर्व का प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान, मिडिल ईस्ट मॉनिटर और यूरोपीय फिलिस्तीन मीडिया सेंटर ने आयोजन में सहयोग किया। इस्तांबुल को इस सम्मेलन का आयोजन स्थल चुनने के भी बहुत साफ और ठोस मायने दिखते हैं। राष्ट्रपति रजब तैयब एर्डोगन की अगुआई में तुर्की अंतरराष्ट्रीय मामलों में नए परिप्रेक्ष्य और तेवर के साथ अपनी भूमिका दर्ज करता नजर आ रहा है।‌ हालांकि घरेलू स्तर पर एर्डोगन सत्ता की नीतियों और कार्यक्रमों में निरंकुशता और मजहबी संकीर्णता के शुरुआती लक्षण कुछ कम नहीं हैं, पर निस्संदेह इस्तांबुल एशिया और यूरोप का एक ऐसा साझा केंद्र है, जहां विमर्श के लिए आज भी अपेक्षाकृत अनुकूल माहौल है।‌

सऊदी शह पर मारे गए पत्रकार जमाल खशोगी की खाली कुर्सी (बाएं से दूसरी) वह खाली कुर्सी

सम्मेलन के उद‌्घाटन सत्र में ही आयोजकों ने साफ कर दिया वे दुनिया से इजरायल-फिलिस्तीन‌ विवाद के मौजूदा सच को ‌लेकर संवाद करना चाहते हैं।‌ वे इस बात से दुखी थे कि मीडिया के मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में फिलिस्तीन का पक्ष बिल्कुल गायब कर दिया गया है।‌ हालांकि कुछेक यूरोपीय मीडिया मंच आज भी मध्य पूर्व की इस सबसे बड़ी और सबसे पुरानी समस्या को अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से कवर करते आ रहे हैं।‌ इसमें ‘गार्डियन’ और‌ ‘इकनॉमिस्ट’ के नाम खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। लंदन स्थित ‘मिडिल ईस्ट आई’ जैसी वेबसाइटें भी अपेक्षाकृत वस्तुगत रिपोर्टिंग करती आ रही हैं। इस वर्ष मई के दूसरे सप्ताह में जब गाजा पट्टी का पूरा इलाका एक बार फिर भीषण हिंसा और टकराव की चपेट में आया तो अल-जजीरा जैसे कुछेक चैनलों और अरब दुनिया के बाहर बेहद सीमित पहुंच वाली तुर्की की न्यूज एजेंसी के अलावा यूरोप के यही कुछ मीडिया प्लैटफॉर्म थे, जिन्होंने अपेक्षाकृत संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ घटनाक्रम की रिपोर्टिंग और तथ्यों की व्याख्या की।

इस साल मई महीने में ‘नकबा’ से ऐन पहले इजरायल ने गाजा में 60 फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों को मार डाला था। नकबा फिलिस्तीनी समाज में एक मनहूस और‌ विध्वंसक दिन के रूप में मनाया जाता है। 70 साल पहले 15 मई को ही इजरायल ने अपने अलग संप्रभु अस्तित्व की घोषणा की थी।‌ तब से लगभग सात लाख फिलिस्तीनी पलायन या विस्थापन के शिकार बताते जाते हैं।

दोनों तरफ के हजारों लोग मारे जा चुके हैं। फिलिस्तीन-इजरायल विवाद में इस साल 15 मई को ही एक और घटनाक्रम दर्ज हुआ। उस दिन अमेरिका ने इजरायल स्थित अपने दूतावास को तेल अवीव से यरूशलम स्थानांतरित करना शुरू किया। फिलिस्तीनियों के लिए यह और भी चुभने वाली बात थी कि एक तरफ उनके 60 लोग मारे जाते हैं और दूसरी तरफ अमेरिका ‘तेल अवीव’ की पीठ ठोंकते हुए अपने दूतावास को यरूशलम ले जा रहा है!

उस दिन हजारों फिलिस्तीनियों ने अपने साथियों को गाजा तट पर दफनाया और इजरायल-अमेरिकी गठजोड़ के खिलाफ जबर्दस्त नारेबाजी की। रूस, चीन, आयरलैंड और तुर्की सहित दुनिया के अनेक देशों ने इजरायल की आक्रामकता और हिंसक कार्रवाई की निंदा की। संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा में मामला उठा पर इजरायल के खिलाफ कुछ भी सुनने को अमेरिका तैयार नहीं हुआ। मई, 2018 से अब तक फिलिस्तीन-इजरायल तनातनी जस की तस बरकरार है।

अमेरिकी रुख में भी कोई बदलाव नहीं आया है। इसकी सबसे बड़ी वजह हैं राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप! बराक ओबामा ने दुनिया की इस जटिल समस्या को सुलझाने की निर्णायक कोशिश भले न की हो पर वह कम से कम इजरायल और अरब वर्ल्ड के बीच एक तरह का तनाव शैथिल्य बनाए रखने की कोशिश करते रहते थे।‌ पर ढेर सारे फैसले ट्रंप मध्य पूर्व के अपने सलाहकार की राय लिए बिना ही करते रहते हैं।‌ गार्डियन से जुड़े रहे मध्य पूर्व मामलों के जानकार जोनाथन स्टिल भी ट्रंप की अविवेकी नीतियों को गाजा पट्टी की मौजूदा तनावपूर्ण स्थिति के लिए जिम्मेदार तीन प्रमुख कारणों में मानते हैं।‌

इस्तांबुल सम्मेलन के दूसरे सत्र का विषय था- ‘डिवेलपिंग द ग्लोबल मीडिया डिस्कोर्स इन पैलेस्टीन।’ सत्र की शुरुआत में मंच का दृश्य देखकर सभागार का माहौल‌ गमगीन हो गया। वहां बैठे पांच वक्ताओं और एक मॉडरेटर के बीच एक कुर्सी खाली थी। उस पर वह व्यक्ति नहीं बैठा था, जिसे बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था और जिसने कुछ सप्ताह पहले सम्मेलन के आयोजकों को भरोसा दिलाया था कि वह उक्त सत्र में बोलने के लिए मौजूद रहेंगे।‌ वह वक्ता थे- सऊदी मूल के पत्रकार जमाल खशोगी, जो अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट के लिए लिखते थे। पिछले दिनों इस्तांबुल स्थित सऊदी दूतावास में बेरहमी के साथ उनकी हत्या कर दी गई। शुरू में सऊदी शासकों ने उनकी हत्या में अपना हाथ होने से इनकार किया।

पर अब तुर्की और स्वयं अमेरिकी एजेंसियों की पड़ताल से यह सच सामने आ चुका है कि उनकी हत्या दूतावास में की गई थी और उसके पीछे सऊदी राजघराने के ही अत्यंत ताकतवर व्यक्ति का था। निजी तौर पर मेरे लिए भी वह भावुक क्षण था। मैंने भी उसी सत्र में एक पैनलिस्ट के रूप में भाग लिया।

समाधान की कोशिश
फिलिस्तीन हो या दुनिया का कोई और विवाद, उसके समाधान में राजनीति और राजनय के साथ मीडिया की अहम भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। राजनीति और‌ राजनय अगर किसी मुद्दे पर नकारात्मक नजर आ रहे हैं तो मीडिया अपने जागरूक हस्तक्षेप से उसके हल में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 70 साल पुरानी फिलिस्तीन-इजरायल समस्या के संदर्भ में फिलिस्तीनी अगर मीडिया के मार्फत दुनिया से संवाद की कोशिश कर रहे हैं तो अच्छा ही है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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