बाबरी मस्जिद विवाद : सुप्रीम कोर्ट में जनवरी 2019 में होगी सुनवाई

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि वह सिर्फ जनवरी के पहले सप्ताह मे केस पर सुनवाई की तिथि तय करने के लिए लगाने का आदेश दे रहे है। उसी समय यह तय होगा कि कौन सी पीठ अयोध्या विवाद मामले सुनवाई करेगी। 

Awais Ahmad

आयोध्या राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद मामले में आज नई बेंच में सुनवाई होनी थी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, संजय किशन कौल और के एम जोसफ की बेंच को मामले की सुनवाई करनी थी। लेकिन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच में दिशानिर्देश जारी करते हुए मामले की सुनवाई जनवरी 2019 के लिए टाल दी।

इससे पहले बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद मामले में पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ अशोक भूषण और अब्दुल नज़ीर मामले को सुन रहे थे।

आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के वकील और रामलला के वकील ने नवंबर में सुनवाई की मांग की थी। उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले की गंभीरता और लंबे समय से लंबित होने के आधार पर दिवाली की छुट्टी के तुरंत बाद सुनवाई का अनुरोध किया था। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और रामलला के वकील की इस मांग को ठुकरा दिया।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि वह सिर्फ जनवरी के पहले सप्ताह मे केस पर सुनवाई की तिथि तय करने के लिए लगाने का आदेश दे रहे है। उसी समय यह तय होगा कि कौन सी पीठ अयोध्या विवाद मामले सुनवाई करेगी।

पिछली सुनवाई में पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने 27 सितंबर 2018 को ‘मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं’ वाले फैसले के खिलाफ याचिका पर पुनर्विचार से इनकार कर दिया था और अपने फैसले में कहा था कि अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में दीवानी वाद का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर होगा और पूर्व का फैसला इस मामले में प्रासंगिक नहीं है।

बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अयोध्या टाइटल विवाद में फैसला दिया था। फैसले में कहा गया था कि विवादित लैंड को 3 बराबर हिस्सों में बांटा जाए। जिस जगह रामलला की मूर्ति है उसे रामलला विराजमान को दिया जाए। सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए, जबकि बाकी का एक तिहाई लैंड सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी जाए।

जानिये क्या है अयोध्या का टाइटिल सूट?

-1950 में गोपाल सिंह विशारद ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में अयोध्या मसले पर याचिका दायर की।

-इस याचिका में विवादित स्थल पर हिंदू रीति रिवाज से पूजा की इजाजत देने की मांग की गई।

-1959 में निर्मोही अखाड़ा ने विवादित भूमि पर नियंत्रण की मांग की।

-निर्मोही अखाड़ा की तर्ज पर ही मुस्लिम सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी विवादित भूमि पर कोर्ट में अपना दावा ठोक दिया।

-2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांट दिया।

-कोर्ट ने रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड को जमीन के हिस्से सौंपने का आदेश दिया।

-इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले पर कोई भी पक्ष राजी नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी गई। 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

अब सुप्रीम कोर्ट में इसी मसले पर फिर से सुनवाई होने जा रही है। कोर्ट ने इस मामले में पहले ही साफ कर दिया है कि ये सुनवाई सिर्फ जमीन विवाद को लेकर की जाएगी, किसी और मसले से इसका कोई लेना-देना नहीं है।

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