National Media Dialogue में बिहार की स्वच्छाग्रही ‘आशा’ ने जब अपनी दर्द भरी कहानी सुनाना शुरू किया तो लोगों की आँखें नम होगईं

पीने का साफ़ पानी आसानी से ना मिलने से एक परिवार को समय , धन और सेहत का कितना नुकसान होता है ?इस पर सेक्रेटरी महोदय अपनी स्कीमों को गिनवाते रहे लेकिन कोई ठोस जवाब आंकड़ों की रोशनी में नहीं दे सके .

Ashraf Ali Bastavi

नई दिल्ली ( एशिया टाइम्स/ अशरफ अली बस्तवी की रिपोर्ट ) अगर आप को जंग आज़ादी में गाँधी जी के चम्पारन ‘सत्याग्रह’ आन्दोलन में सत्याग्रही बनकर शिरकत ना कर पाने का मलाल है , तो आप हरगिज़ मायूस ना हों , प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वच्छाग्रह’ आन्दोलन में भाग लेकर स्वच्छता मुहीम में ‘स्वच्छाग्रही बन कर अपना ख्वाब पूरा कर सकते हैं .जी , हां हम बात कर रहे हैं भारत सरकार के “सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह” आन्दोलन की .

दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर में 3 अप्रैल को unicef और भारत सरकार के Drinking Water and Sanitation Ministry के सहयोग से National Media Dialogue की . बिहार से आई ‘स्वच्छाग्रही’ आशा ने जब अपनी दर्द भरी कहानी सुनाना शुरू किया तो सभागार में मैजूद लोगों की आँखें नम होगईं.

आगे की सीट पर बैठे चारों स्वच्छाग्रही ,लाल साड़ी में बिहार से आई आशा

इस अवसर पर 10 अप्रैल 2018 को ‘चलो चम्पारण’ का नारा दिया गया , प्रधानमंत्री मोदी ने 2017 में चम्पारन ‘सत्याग्रह’ आन्दोलन के 100 साल पूरे होने पर ‘स्वच्छाग्रह’ आन्दोलन शुरू किया था, इस बार 10 अप्रैल को प्रधानमंत्री 20 हज़ार ‘स्वच्छाग्रही’ की टीम को ख़िताब करेंगे
मंत्रालय के सेक्रेटरी Parameshwarana Iyer ने कामयाबी के हैरत अंगेज़ आंकड़े पेश किये उन्हों ने बताया कि 2 अक्टूबर 2014 को 65 करोड़ लोग खुले में शौच करते थे मार्च 2018 में यह संख्या घट कर 20 करोड़ रह गई है और 2019 तक इसे भी पूरा कर लिया उन्हों ने
unicef की एक रिसर्च से यह भी बताया की पूरी तरह ODF हो चुके एक परिवार को सालाना 50 हज़ार की आर्थिक बचत होती है , इसे चार्ट के माध्यम से बताया गया है .

अगर आप अपने घर में शौचालय बनवाते हैं तो 24646 रुपये का समय बचाते हैं , आप की प्रॉपर्टी की कीमत 18991 तक बढ़ जाती है , एक अंदाज़े के मुताबिक दवा का खर्च 8214 रुपये तक कम होजाता है और साथ ही इस से 17882 कीमत की ज़िन्दगी बचा लेते हैं . एक एनी चार्ट में यह दर्शाया गया है कि इस से आप की सेहत पर क्या असर पड़ता है . इस चार्ट को unicef ने पेश किया है .

इस मीडिया Dialogue में सीनियर पत्रकार राहुल देव , भारत सरकार के Drinking water and sanitation ministry के सेक्रेटरी Parameshwarana Iyer , यूनिसेफ के Wash chief Nicolas Osbert, अक्षय रावत ,और बिहार , उत्तर प्रदेश , हरियाणा और तमिल नाडू से चार स्वच्छाग्रही ने शिरकत की .

अंत में सवाल जवाब का सिलसिला चला काफी अहम सवालात आये जिनका उत्तर देने की पूरी कोशिश की गई, चूँकि इसी मंत्रालय को सभी के लिए पीने का साफ़ पानी भी मुहैय्या कराने की जिम्मे दारी है इस लिए एशिया टाइम्स ने पीने का साफ़ पानी से सम्बंधित एक सवाल किया .

पुछा , जिस तरह आप आंकड़ों में ODF लक्ष्य पूरा करने के करीब पहुँच गए हैं बताएं कि आपके मंत्रालय ने 2014 में सभी को पीने का साफ़ पानी मुहैय्या कराने का क्या लक्ष्य निर्धारित किया था और उसको कितना हासिल कर सके है , और यह भी बताते चलें कि पीने का साफ़ पानी आसानी से ना मिलने से एक परिवार को समय , धन और सेहत का कितना नुकसान होता है ?इस पर सेक्रेटरी महोदय अपनी स्कीमों को गिनवाते रहे लेकिन कोई ठोस जवाब आंकड़ों की रोशनी में नहीं दे सके .

बहर हाल कामयाबी के इन सरकारी आंकड़ों और ज़मीनी हकीकत में क्या समानता है यह देखना अभी बाकी है यह एक रिसर्च का विषय है भारत में किसी सरकारी स्कीम का इस तेज़ी से कामयाब होना अपने आप में एक चमत्कार से कम नहीं ,इसका जाएजा ज़रूर लिया जाना चाहिए लेकिन एक बात तो हुई है कि इस स्वछता मुहीम ने बिहार की ‘आशा’ को जीवन की एक नई आशा ज़रूर दे दी है और उनको एक मज़बूत सामाजिक कार्यकता में तब्दील कर दिया है , यही इस मुहीम की बड़ी उपलब्धि है .

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