इससे मालूम होता है कि हमें तो ठीक तरह से अपनी खुशी भी मनानी नहीं आती

अशरफ अली बस्तवी

Ashraf Ali Bastavi

 आज से कोई चार साल पहले रूस के पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल गोरबा चौफ अमेरिका अफगानिस्तान युद्ध के दौरान कहा था कि”  अफगानिस्तान में अमेरिका की जीत असंभव है, उन्होंने यह बात अपने एक लंबे लेख में दर्ज किया था और यह उन्होंने यूं ही नहीं कहा   था बल्कि यह अफगान युद्ध में उनकी हार का अनुभव था।

दरअसल मुस्लिम दुनिया  के पास जो सूचना थी अगर वह अमेरिका के पास होती तो इससे पांच सौ घंटे की टेली न्यूज़  प्रोड्यस  कर चुके होते,  दो हजार छोटे बड़े डिबेट  प्रसारित हो चुके होते, प्रतिष्ठित हस्तियों के एक हजार साक्षात्कार प्रसारित होकर दर्शकों के  डिस्कोर्स  का एक हिस्सा बन चुके होते ,  बड़े बजट  की फिल्म बन चुकी होती , हालीवुड में पांच बड़ी बजट  की फिल्मों तैय्यार। हो चुकी होतीं  वह  रिपोर्ट क्या थी  ? वह रिपोर्ट  अफगानिस्तान में अमेरिका और उसके सहयोगियों और फिलीस्तीन में हमास के हाथों इसराइल के पराजय की  ऐतिहासिक सूचना थी।

याद कीजिए कभी अमेरिका के पास ऐसी ही ऐतिहासिक सूचना थी, अमेरिका को मालूम हो गया था कि अफगान  ने सोवियत संघ को शिकस्त दे दिया   है केवल एक रिपोर्ट  से अमेरिका और उसके सहयोगियों ने समाचार,  विश्लेषण, साक्षात्कार,  फीचर फिल्मों के  कारखाने नहीं मिलें लगा ली थी ,सूचना का  संचार इस प्रक्रिया का नाम है। हमारा  मामला भी अजीब है ऐतिहासिक खबरें हैं लेकिन इससे कुछ और क्या एक अखबार की हैडलाइन भी  नहीं बन पा रही है।

सूचना और संचार के मैदान में  हमारी  गरीबी ना  क़ाबिले बयां  है, इस  मामले में पूरी दुनिया के मुसलमान  बेशक गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे  हैं।

इससे मालूम होता है कि हमें तो ठीक तरह से अपनी खुशी भी मनानी  नहीं आती ।

इसका   क्या कारण है? कुछ लोगों  का मानना ​​है कि इस की  वजह संसाधनों की कमी है नहीं , मूल समस्या संसाधनों की कमी नहीं वरीयता का  सही निर्धारण है

समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो मस्जिदों और मदरसों के निर्माण के लिए आप  को करोड़ों रुपये दे  सकते हैं लेकिन आप उनसे कहें कि एक टेलीविजन चैनल शुरू करना है तो वह इस  के लिए आप को दस रुपये नहीं देने वाले क्यों कि वे समझते हैं कि यह कोई धार्मिक काम नहीं है उन्हें ऐसा समझने का  एक कारण टेलीविजन के  सम्बन्ध में  सामान्य अवधारणा है, टेलीविज़न आमतौर पर गुनाह  माना  जाता है लेकिन समस्या यह है कि राय बनाने की जंग   में टेलीविजन सबसे सशक्त  माध्यम बन गया  है,.  जिसका इनकार संभव नहीं है करोड़ों लोगों के लिए जो कुछ टेलीविजन स्क्रीन पर है वही सच है और जो कुछ टेलीविजन पर नहीं  है, वह  या तो अस्तित्व में नहीं है.

भारतीय मीडिया  हमारे सामने  है। यह अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों के मुद्दों पर  गंभीर नहीं है।

अल जज़ीरा टेलीविजन को ले लें अरब  शासकों की भूमि है वहाँ राजनीतिक राय बनाना और  जनता को जागरूक और प्रोत्साहित  करना आसान नहीं था, लेकिन अल जज़ीरा ने यह काम कर दिखाया। क्या आपको लगता है कि अल जजीरा ने यह काम क्यों किया था? फिलिस्तीन में इजरायली ज़ुल्म का  विवरण दिखाकर उसने केवल इसराइल कि बमबारी और हमले  की  ही रिपोर्ट नहीं दी  बल्कि उसने इन हमलों के कारण उत्पन्न होने वाली मानवीय समस्याओं को भी रिपोर्ट किया  और यह बताया कि जिस घर के लोग शहीद  हुए उस घर का  क्या हुआ,  बच्चों की शिक्षा स्वस्थ ,रहन सहन  पर  क्या असर पड़ा ? यह जानकारी हमेशा मौजूद थी  लेकिन कभी रिपोर्ट नहीं हुई थीं अल जज़ीरा ने उन्हें रिपोर्ट करके इसराइल ही नहीं अमेरिका के खिलाफ भी अरब दुनिया में जबरदस्त हलचल  पैदा कर दिया।   आज सऊदी  अरब खुद अलजज़ीरा को बंद करने की ज़िद कर रहा है क़तर को जो लिस्ट दी है उसमे अलजज़ीरा को बंद करने का मुतालबा भी शामिल है।

दरअसल अगर हम सूचना  और संचार माध्यम के मामले में  गरीबी के मारे न होते तो आज हम बहुत कुछ तब्दील कर सकते थे। आज हम   पश्चिम  के बारे में हीन भावना से ग्रस्त न होते.  हमें   लगता है कि हमारे पास कुछ नहीं है जो कुछ है पश्चिम के पास ही।  हमारे पास भी सब कुछ है  मुस्लिम दुनिया के धनी शासकों के पास यहूदियों से दस गुना अधिक धन है, लेकिन हमरे पास वो विज़न मिशन और एक्टिविजम नहीं है।

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