मिल्ली मसाइल के हल में मस्जिदों की भूमिका

कलीमुल हफ़ीज़ 

Asia Times Desk

संसाधन का इस्तेमाल भी एक कला है। बहुत से व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो संसाधन होते हुए भी उन का सही इस्तेमाल न करने के कारण परेशान रहते हैं। पैदा करने वाले ने हर शख़्स को कुछ न कुछ संसाधन ज़रूर दिए हैं। इंसान को जिस्म दिया गया, देखने, सुनने, समझने की क्षमता दी गई। इसी तरह इल्म हासिल करने के ज़रिए दिए गए। उसके आस-पास भी ऐसे संसाधन दिए गए, जिन को इस्तेमाल करके वह अपने जीवन को बेहतर तरीक़े से गुज़ार सकता है। इसी तरह भारत में मुसलमानों के पास अगर मसाइल हैं, तो उसके पास संसाधन भी हैं। मिसाल के तौर पर वक़्फ़, मदरसे का व्यवस्था, समूह की ताक़त, ईमानी जज़्बा वग़ैरह इन संसाधन में मस्जिद एक बेहद महत्वपूर्ण संसाधन है, जिस का सही इस्तेमाल करके मुसलमान अपने बहुत से मसलों पर क़ाबू पा सकती है।

मस्जिद मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ी नेमत है। अल्लाह का शुक्र है कि जहां-जहां मुसलमान आबाद हैं, वहां मस्जिदें हैं, सिवाए उन जगहों को छोड़ कर, जहां या तो मुसलमान बहुत कम और कमज़ोर हैं या वे जगहें, जो हमारे देशवासियों के लिए पवित्रता का दर्जा रखती हैं। कुछ शहरों और गांओं में हर गली और मुहल्ले में मिस्जद है। मस्लकों (विचारधारा) के नाम पर तो मस्जिदें हैं ही, साथ ही बिरादरियों की मस्जिदें भी हैं। मस्जिदों का ज़्यादा होना अच्छी बात है। अल्लाह इन मस्जिदों की हिफ़ाज़त फ़रमाए और आबाद फ़रमाए।

मुसलमानों में मस्जिद का इस्तेमाल बहुत सीमित है। ज़्यादातर मस्जिदें सिर्फ़ नमाज़ के लिए ख़ास होकर रह गई हैं। पांच नमाज़ों में मुश्किल से दो घंटे का समय लगता है। किसी ज़माने में मस्जिद में मक्तब भी होता था, अब भी कुछ मस्जिदों में मक्तब का नज़्म है, लेकिन अधिक्तर मस्जिदों के साथ मक्तब और मदरसा अलग से क़ायम किया गया है। वे मस्जिदें, जहां मक्तब हैं, वे फिर भी किसी क़द्र ग़नीमत हैं कि वहां दो-चार घंटे नाज़रा कु़रआन और दीनी शिक्षा के मसले की तालीम हो जाती है।

मस्जिद के अधिक इस्तेमाल पर हमें विचार करना चाहिए। आज के दौर में जबकि ज़मीनें बेहद महंगी हैं, मुसलमानों के पास जगह की कमी है। हम लोग लाखों रुपये से बनी मस्जिद को सिर्फ़ दो घंटा इस्तेमाल करके छोड़े देते हैं, यह कहां की होशमंदी है। पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. की मस्जिद, जिसे हम मस्जिदे नबवी से जानते हैं, इस का इस्तेमाल नुबूवत और ख़ुलीफ़ाओं के ज़माने में नमाज़ के लिए इबादत की जगह, शिक्षा के लिए स्कूल, न्यान के लिए न्यायालय, मश्वरों के लिए कम्यूनिटी सेंटर की तरह होता था। यहां तक कि बद्र की जंग के काफ़िर क़ैदियों को मस्जिदे नबवी में ही रखा गया था। ख़ुलफ़ाए राशिदीन रज़ि. ने मस्जिदे नबवी में बैठ कर ही ख़िलाफ़त के काम अंजाम दिए थे। वहीं पर लड़ाई-झगड़े के फ़ैसले होते, वहीं पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडलों से मुलाक़ातें होतीं। इसी के चबूतरे पर इल्म के प्यासे अपनी प्यास बुझाते।

आज मस्जिदों में मुसलमानों के मसलों की बात या देश के हालात पर कोई बात-चीत करता है, तो उसे रोका और टोका जाता है कि यह दुनियादारी की बातें हैं। दीन और दुनिया की तक़्सीम और इबादत के सीमित धारणा ने मस्जिद के किरदार को भी सीमित कर दिया है। लाखों और करोड़ों रुपये लगाकर लम्बी-चैड़ी मस्जिद बनाई जाती है। इसलिए कि मस्जिद के नाम पर सहायता आसानी से मिल जाता है।

मैं बड़े अदब के साथ यह कहना चाहता हूं कि मस्जिद के निर्माण में भी एतदाल से काम लिया जाए। बे-जा ख़र्च हर जगह बे-जा ख़र्च है। महल्ले की आबादी के लिहाज़ से मस्जिद की चैड़ाई और उस की मज़बूती पर तो कोई समझौता नहीं करना चाहिए। जिस मिल्लत की आधाी आबादी अनपढ़ हो, जिस मिल्लत की आधाी आबादी बीमार हो, जेल के क़ैदियों में जिसकी संख्या तीस प्रतिशत हो, जिस की बड़ी तादाद सड़कों पर भीक मांग कर गुज़ारा करती हो। उस मिल्लत के लिए मस्जिदों की सजावट के नाम पर लाखों रुपये ख़र्च करना मुनासिब नहीं। न सिर्फ़ मस्जिदें, बल्कि हमें अपने निजी घरों के निर्माण, अपनी शादी-ब्याह के फंक्शन वग़ैरह में मिल्लत की ज़रूरत और प्राथमिकता का ख़्याल रखना चाहिए।

मस्जिद को आज भी हमें कम से कम 12-15 घंटे इस्तेमाल करने की स्कीम बनाना चाहिए। मिसाल के तौर पर फ़ज्र के बाद कु़रआन व हदीस के दर्स की मज्लिस हो, जिस में कु़रआन व हदीस की तालीम हो, यह तालीम केवल रसमी न हो, बल्कि इस तालीम का मक़्सद नमाज़ियों को पूरे दीन से अवगत कराना हो। उस का बाक़ायदा एक व्यापक पाठ्यक्रम हो, सुबह में आम स्कूलों के वक़्त से पहले उन छात्र-छात्राओं के लिए दीनी शिक्षा का व्यवस्था हो, जो ऐसे स्कूलों में शिक्षा पाते हैं, जहां दीनी तालीम नहीं दी जाती। दस बजे से जु़हर तक महल्ले के विभिन्न व्यक्तियों के लिए शिक्षा और अध्ययन का इंतिज़ाम रहे, ताकि अपनढ़ लोग लाभ उठा सकें। इस का भी बाक़ायदा एक पाठ्यक्रम हो। एक अध्ययन रूम हो, एक लाइब्रेरी हो, वहां अख़्बारात आते हों, ताकि महल्ले के लोग वर्तमान परस्थिति से वाक़िफ़ हो सकें। ज़ुहर की नमाज़ के बाद चार बजे में बच्चियों और महिलाओं की शिक्षा-दीक्षा का व्यवस्था किया जा सकता है। अस्र के बाद स्कूलों और कालेजों में शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चों को बुलाया जा सकता है। मग़रिब के बाद बड़ों की शिक्षा का केन्द्र हो सकता है। इशा के बाद सवाल और मशवरे और महल्ले को होने वाले मसलों पर विचार-विमर्श के लिए हो सकती है। मस्जिदों में काउंसिलिंग केन्द्र क़ायम किए जा सकते हैं। वहां डिस्पेंस्री खोली जा सकती है, जिस से महल्ले के मरीज़ मामूली ख़र्च पर लाभ उठा सकते हैं। विभिन्न विषयों पर डीबेट और बात-चीत का भी एहतमाम किया जा सकता है, ताकि महल्ले वाले वर्तमान परस्थिति से बाख़बर हों और इन परस्थिति में उन को कोई रणनीति दिया जा सके।

शादी-ब्याह के अवसर पर हज़ारों और लाखों रुपये ख़र्च करके शादी हाॅल लिए जाते हैं। मस्जिद में अगर मेहमानों के बैठने का व्यवस्था कर दिया जाए तो यह पैसे बच सकते हैं। मस्ज्दि में निकाह की मज्लिस होगी, तो अल्लाह की ताईद और फ़रिश्तों की हिमायत भी हासिल रहेगी। पति-पत्नी में भी इसके प्रभाव होंगे, लेकिन नाम, दिखावे के लिए शादी हाॅल को इज़्ज़त की निशानी समझा जाने लगा है। मस्जिद जो अल्लाह का घर है, पूरी ज़मीन में इस से इज़्ज़त और बरकत वाली जगह कौन सी हो सकती है? मुम्बई, चन्नई और बंेगलोर की कुछ मस्जिदों में बाक़ायदा सरकार से प्रस्ताव पारित संस्थाएं चल रही हैं। वानमबाड़ी (तामिलनाडु) में शादियां भी मस्जिद में होती हैं, और फ़ैसले भी।

यह हमारी बद-क़िस्मती है कि मस्जिदों की व्यवस्था आम तौर पर कम पढ़े लिखे लोगों के हाथों में है, ज़्यादातर मस्जिदों में इमाम भी कम पढ़े-लिखे हैं। महल्ले के समझ-बूझ रखने वाले या तो ख़ुद दूर रहते हैं या उन को ज़िम्मेदारी से दूर रखा जाता है। यह हम सब की ज़िम्मेदारी है कि अपने महल्ले के लोगों को भरोसे में लेकर महल्ले की मस्जिद का व्यवस्था इस तरह करें कि उस की पवित्रता भी बाक़ी रहे और इस से ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाया जा सके। इस संदर्भ में दीनी जमाअतें महत्वपूर्ण किरदार अदा कर सकती हैं। वे इमामों की ट्रेनिंग का व्यवस्था भी कर सकती हैं, पाठ्यक्रम भी संकलन कर सकती हैं। इसके लिए जहां तक माली संसाधन की आवश्यकता होगी, वह महल्ले और बस्ती से पूरे किए जा सकते हैं, जो सेवाएं दी जाएंगी, उन का ख़र्च लिया जाएगा। मिल्लत के हमदर्द इसके लिए अपना सहयोग दें। मेरी अधूरी राय है कि मस्जिद का निमार्ण अगरचे बहुत सादा हो, ज़मीन पर भले ही मारबल न हो, क़ालीन के बजाए चटाई पर भी सजदा किया जा सकता, लेकिन मस्जिद में इन कामों पर पैसा ख़र्च करना ज़्यादा मुनासिब होगा। सारांश मस्जिद मसले के हल और शिक्षा-दीक्षा में बहुत महत्वपूर्ण किरदार अदा सकता है और समाज मंे इस के ज़रिए एक बड़ी तब्दीली लाई जा सकती है।

लेखक : – अल-हफ़ीज़ एजुकेशनल एकेडमी के चेयरमेन व   इंडियन मुस्लिम इंटेलक्चुवल फ़ोरम,नई दिल्ली  के कनवेनर हैं
लेखक को अपना फीडबैक भेजें  : 9891929786

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