गूगल ने अंग्रेज़ी और मलयालम भाषा की लेखिका कमला सुरय्या के ऊपर अपना डूडल बनाया है

मलयालम लेखिका कमला सुरैया

एशिया टाइम्स

गूगल ने अंग्रेज़ी और मलयालम भाषा की लेखिका कमला सुरय्या के ऊपर अपना डूडल बनाया है

वे पंद्रह वर्ष की उम्र से ही कवितायेँ लिखने लगी  लेकिन सबसे ज़्यादा उन्हें अपनी आत्मकथा ‘माई स्टोरी’ से प्रसिद्धि प्राप्त हुई, ये किताब अंग्रेज़ी भाषा में 1976 में प्रकाशित हुई और 1984 में नोबेल प्राइज़ के लिए नामांकित भी हुई।

ग्यारह दिसम्बर 1999 को कमला सुरय्या ने इस्लाम कबूल करने का एलान किया और अपना नाम कमला दास से बदल कर कमला सुरय्या रख लिया, जो एक चौंकाने वाली ख़बर थी क्योंकि कमला सुरय्या शायद पहली विश्वप्रसिद्ध भारतीय महिला साहित्यकार थी जिन्होंने इस्लाम क़बूल करने का एलान किया था चूँकि कमला सुरय्या भारतीय सहित्य में स्त्री विमर्श पर लेखन करने वाली और नारीवाद की समर्थक एक बड़ा नाम रह चुकी थी इसलिए भी इस्लाम कबूल करने का उनका एलान चौंकाने वाला था।

इस्लाम कबूल करने का एलान करने के कुछ दिनों बाद पंद्रह दिसम्बर को एक अख़बार को इंटरव्यू देते हुए उन्होंने कहा के –

‘‘इस्लामी शिक्षाओं में बुरके़ ने मुझे बहुत प्रभावित किया अर्थात वह लिबास जो मुसलमान औरतें आमतौर पर पहनती हैं। हक़ीक़त यह है कि बुरक़ा बड़ा ही ज़बरदस्त (Wonderful) लिबास और असाधारण चीज़ है। यह औरत को मर्द की चुभती हुई नज़रों से सुरक्षित रखता है और एक ख़ास क़िस्म की सुरक्षा की भावना प्रदान करता है।’’ ‘‘आपको मेरी यह बात बड़ी अजीब लगेगी कि मैं नाम-निहाद आज़ादी से तंग आ गयी हूं। मुझे औरतों के नंगे मुंह, आज़ाद चलत-फिरत तनिक भी पसन्द नहीं। मैं चाहती हूं कि कोई मर्द मेरी ओर घूर कर न देखे। इसीलिए यह सुनकर आपको आश्चर्य होगा कि मैं पिछले चौबीस वर्षों से समय-समय पर बुरक़ा ओढ़़ रही हूं, शॉपिंग के लिए जाते हुए, सांस्कृतिक समारोहों में भाग लेते हुए, यहां तक कि विदेशों की यात्राओं में मैं अक्सर बुरक़ा पहन लिया करती थी और एक ख़ास क़िस्म की सुरक्षा की भावना से आनन्दित होती थी। मैंने देखा कि पर्देदार औरतों का आदर-सम्मान किया जाता है और कोई उन्हें अकारण परेशान नहीं करता।’’

एक नारीवादी पृष्ठभूमि रखने वाली कमला सुरय्या का परदे को लेकर दिया जाने वाला ये बयान भी बहुत आश्चर्यजनक था इसके इलावा उन्होंने कहा –

‘‘दुनिया सुन ले कि मैंने इस्लाम क़बूल कर लिया है, इस्लाम जो मुहब्बत, अमन और शान्ति का दीन है, इस्लाम जो सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था है, और मैंने यह फै़सला भावुकता या सामयिक आधारों पर नहीं किया है, इसके लिए मैंने एक अवधि तक बड़ी गंभीरता और ध्यानपूर्वक गहन अध्ययन किया है और मैं अंत में इस नतीजे पर पहुंची हूं कि अन्य असंख्य ख़ूबियों के अतिरिक्त इस्लाम औरत को सुरक्षा का एहसास प्रदान करता है और मैं इसकी बड़ी ही ज़रूरत महसूस करती थी…इसका एक अत्यंत उज्ज्वल पक्ष यह भी है कि अब मुझे अनगिनत ख़ुदाओं के बजाय एक और केवल एक ख़ुदा की उपासना करनी होगी।

यह रमज़ान का महीना है। मुसलमानों का अत्यंत पवित्र महीना और मैं ख़ुश हूं कि इस अत्यंत पवित्र महीने में अपनी आस्थाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर रही हूं तथा समझ-बूझ और होश के साथ एलान करती हूं कि अल्लाह के अलावा कोई पूज्य नहीं और मुहम्मद (सल्ल॰) अल्लाह के रसूल (दूत) हैं। अतीत में मेरा कोई अक़ीदा नहीं था। मूर्ति पूजा से बद-दिल होकर मैंने नास्तिकता अपना ली थी, लेकिन अब मैं एलान करती हूं कि मैं एक अल्लाह की उपासक बनकर रहूंगी और धर्म और समुदाय के भेदभाव के बग़ैर उसके सभी बन्दों से मुहब्बत करती रहूंगी।’’

‘‘इस्लाम ने औरतों को विभिन्न पहलुओं से बहुत-सी आज़ादियां दे रखी हैं, बल्कि जहां तक बराबरी की बात है इतिहास के किसी युग में दुनिया के किसी समाज ने मर्द और औरत की बराबरी का वह एहतिमाम नहीं किया जो इस्लाम ने किया है । इसको मर्दों के बराबर अधिकारों से नवाज़ा गया है। मां, बहन, बीवी और बेटी अर्थात इसका हर रिश्ता गरिमापूर्ण और सम्मानीय है। इसको बाप, पति और बेटों की जायदाद में भागीदार बनाया गया है और घर में वह पति की प्रतिनिधि और कार्यवाहिका है।”

मई 2009 में 75 वर्ष की आयु में उनका इन्तकाल हो गया।

प्रिन्स ऑफ़ ढम्प यहाँ है –

की वाल से

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