केदार नाथ जी कितना कुछ कह गए : जैन शम्सी

जब भी प्रकर्ति , मनुष्यता , और शून्यता से भरी कविता का पाठ सुनता हूँ तो केदारनाथ जी की याद आ जाती है। 

Asia Times News Desk

मुद्दे की बात: उन की आदत ही चुपके से आने और चुपके से चले जाने की थी। हम असलम परवेज़ साहब के कमरे से अक्सर देख लिया करते थे। वह आते हलकी मुस्कराहट बिखेरते और फिर चुपके से चले जाते। वो आखिर इसी तरह से इस संसार से भी चले गए , चुपके से चले गए।
असलम परवेज़ साहेब कहते , आप लोग बड़े खुशकिस्मत हो कि केदारनाथ जी को देख रहे हो और बदनसीबी देखिये की अब असलम परवेज़ के बाद केदारनाथ भी दिखाई नहीं देंगे।

जब सड़क पर संतरे के छिलके देखो तो समझ जाओ , मौसम बदल रहा है।

मनोज जी ने जब सड़क पर बिखरे संतरों के छिलकों को देख कर कवितामये वाक्य बोलै तो में ने कहा , क्या यह केदारनाथ जी की कविता है ?
नहीं , वह शरमाते हुए बोले मेरी कविता है।

जब भी प्रकर्ति , मनुष्यता , और शून्यता से भरी कविता का पाठ सुनता हूँ तो केदारनाथ जी की याद आ जाती है।

केदार नाथ जी चले तो गए लेकिन एक ऐसी याद छोड़ गए की जब जब मौसम , पहाड़ , बृक्ष , नदी , और इंसानियत की धरातल खिसकती हुई महसूस होगी , केदारनाथ जी की कविता दूर कहीं दूर से सुनाई देती रहेगी।

केदार नाथ जी की कविता भी उन की ही तरह चुप चाप हलकी सी मुस्कराहट की तरह शांति और क्रांति का सन्देश है। राजनीती पर उन का हल्का सा कटाक्ष समाज के उस ब्लैक होल की तरफ ले जाता है , जहाँ समस्याएं मुंह पर काली पट्टी बांध कर चीखती नज़र आती हैं। उन की

एक कविता

“रह गए जूते”

सूने हाल में दो चकित उदास
धूल भरे जूते
मुँहबाए जूते जिनका वारिस
कोई नहीं था

चौकीदार आया
उसने देखा जूतों को
फिर वह देर तक खड़ा रहा
मुँहबाए जूतों के सामने
सोचता रहा–

कितना अजीब है
कि वक्ता चले गए
और सारी बहस के अंत में
रह गए जूते

उस सूने हाल में
जहाँ कहने को अब कुछ नहीं था
कितना कुछ कितना कुछ
कह गए जूते
सभा उठ गई अब कुछ नहीं था

केदारनाथ जी की कविता क्या थी। स्तूप के ऊपर बरगद , बरगद के ऊपर घर , घर के अंदर आदमी , आदमी के अंदर आत्मा और आत्मा के अंदर संसार। केदार नाथ जी की कविता एहि कहती है कि स्तूप को बचाना है तो संसार को बचाओ। किला को बचाना है तो उस मैले से जगह जगह से चिपटे हो चले कटोरे को बचाओ जिस में दाल न हो तो संसार में काल आ जाये।

केदार नाथ की इस कविता के साथ ही उन को शत शत नमन !!

सिर्फ़ हम लौट रहे थे
इतने सारे लोग सिर झुकाए हुए
चुपचाप लौट रहे थे
उसे नदी को सौंपकर
और नदी अंधेरे में भी
लग रही थी पहले से ज्यादा उदार और अपरम्पार
उसके लिए बहना उतना ही सरल था
उतना ही साँवला और परेशान था उसका पानी

और अब हम लौट रहे थे
क्योंकि अब हम खाली थे
सबसे अधिक खाली थे हमारे कन्धे
क्योंकि अब हमने नदी का
कर्ज़ उतार दिया था
न जाने किसके हाथ में एक लालटेन थी
धुंधली-सी
जो चल रही थी आगे-आगे
यों हमें दिख गई बस्ती
यों हम दाखिल हुए फिर से बस्ती में

उस घर के किवाड़
अब भी खुले थे
कुछ नहीं था सिर्फ़ रस्म के मुताबिक
चौखट के पास धीमे-धीमे जल रही थी
थोड़ी-सी आग
और उससे कुछ हटकर
रखा था लोहा
हम बारी-बारी
आग के पास गए और लोहे के पास गए
हमने बारी-बारी झुककर
दोनों को छुआ

यों हम हो गए शुद्ध
यों हम लौट आए
जीवितों की लम्बी उदास बिरादरी में

कुछ नहीं था
सिर्फ़ कच्ची दीवारों
और भीगी खपरैलों से
किसी एक के न होने की
गंध आ रही थी

लेखक: जैन शम्सी (सीनियर पत्रकार)

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