”ढूंढने वालों को दुनिया भी नई देते हैं”

कलीमुल हफ़ीज़

Asia Times Desk

चुनाव प्रक्रिया चल रही है। राजनैतिक पार्टियां ताल ठोंक कर मैदान में हैं। हर चुनाव की तरह मुसलमानों के सामने फिर वही सवालात हैं, कि आखिर हम क्या करें? किसे वोट दें? किसके कहने पर वोट दें? और क्यों वोट दें? दानिशवरों के दरमियान फिर बहस चल रही है कि आखिरकब तक मुसलमान अपने कंधे पर बैठाकर दूसरों को सत्ता की कुर्सी पर बैठाते रहेंगे? क्या मुस्लिम सियासी लीडरशिप तैयार करने की ज़रूररत है? और क्या वाकई मुसलमानोंका कोई सियासी लीडर नहीं है? मुसलमानों की सियासत में हिस्सेदारी कितनी है और वह कैसे हासिल की जा सकती है?

मुसलमान भी इसी मुल्क का हिस्सा है। यह मुल्क उसका भी इतना ही है जितना दूसरों का है। सियासी प्रक्रिया में भागीदारी के दरवाज़े सब पर बराबर खुले हैं। कुछ रिज़र्व सीटों को छोड़कर हर हिन्दोस्तानी जहां से चाहे चुनाव लड़ सकता है, हर आदमी को वोट डालने को हक़ है और हर वोट वैल्यू बराबर है। इस तरह तो सियासत में मुसलमान बराबर के हिस्सेदार हैं। असल मामला विधानसभा और लोकसभा में प्रतिनिधित्व का है। 2011 की जनगणना के अनुसार मुसलमान कुल आबादी का 14 प्रतिशत है। लेकिन आज़ादी के बाद से आज तक लोकसभा में वह कभी 10 प्रतिशत भी नहीं रहा। केवल 1980 में सबसे ज्यादा 49 एम.पी थे। इस समय 2014 में कुल 23 मुस्लिम एम.पीहैं, यह केवल 4 प्रतिशत होता है।

एक सर्वे के मुताबिक़ देश में 101 लोकसभा सीट ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोट 20 प्रतिशत से अधिक है। इसका मतलब है कि अगर सूझबूझ, सियासी पार्टियों से तालमेल और प्ला निंगकेसाथसे इन सीटों पर चुनाव लड़ा जाए तो ये सीटें मुस्लिम उम्मीदवार या मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टी जीत सकती है। दुख यह है कि इन क्षेत्रों में से 2014 के चुनाव में 54 पर बी.जे.पी के उम्मीदवार कामयाब हुए। इसकी वजह यह है कि असरदार दृष्टिकोण ना होने के कारण हम किसी पार्टी की तवज्जो का केंद्रनहीं बनते बल्कि बहुतसी पार्टियों में वोटबैंक की हैसियत में बंटकर सांप्रदायिक ताक़तों का रास्ता साफ कर देते हैं। यह स्थिति कल भी थी आज भी है और जब तक भी रहेगी तब तक हमारी हालत भी यही रहेगी।

यह प्रश्न भी अहम है कि क्या मुसलमानों को कोई नई सियासी पार्टी बनाना चाहिए? इस प्रश्न से पहले एक सवाल यह है कि क्या मुसलमानों की सियासी पार्टियां नहीं हैं? मुस्लिम लीग अभी जिंदा है। मज्लिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन अपने बेहतरीन दौर में है। एस.डी.पी.आई, ए.आई.यू.डी.एफ,वैलफेयर पार्टी, पीस पार्टी का नेतृत्व भी मुसलमानों के हाथों में है। इनके अलावा भी क्षेत्रीय स्तर की पार्टियां हैं। तो फिर नई पार्टी की ज़रूरत क्या है? इन पार्टियों पर ग़ौर करना चाहिए। इनकी कामयाबी और नाकामी के कारणों का जायज़ा लिया जाना चाहिए।

मेरा ख़्याल है कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई मुस्लिम सियासी पार्टी बनाने से पहले इन पांच राज्यों (जम्मू कश्मीर, लक्षद्वीप, आसाम, पश्चिमी बंगाल और केरल) में प्रयोग करने चाहिए, जहां हम 25 प्रतिशत से अधिक हैं। इसका एक कारण यह भी है कि अधिकतर सरकारी स्कीमें राज्य स्तर पर ही लागू की जाती हैं और प्रत्येक राज्य के मसले और इश्यू भिन्न-भिन्न होते हैं। इन पांच में कश्मीर का मसला नहीं है वहांनेशनल कांफ्रेंस और पी.डी.पी दोनों ही मुस्लिम पार्टियां हैं। लक्षद्वीप की केवल एक सीट है, यहां किसी भी मुस्लिम पार्टी को अवसर दिया जा सकता है। आसाम में मौलाना बदरूद्दीन अजमल हैं, उन पर भरोसा किया जाना चाहिए। बंगाल में नई पार्टी बनाई जा सकती है या कईमुस्लिम पार्टियों का गठबंधन बनाकर शुरूआत की जा सकती है। केरल में मुस्लिम लीग को पूरे राज्य की नुमाइंदगी करनी चाहिए। इन पांच राज्यों में अगर हम मुस्लिम लीडरशिप वाली पार्टियों को अवसर देंतो वह हुकूमत तक बना सकती हैं। अगर हम पांच राज्यों में मुस्लिम पार्टियों का गठबंधन बना लें और इन पांच राज्यों में ज़मीनी काम करें तो कौ़म और मुल्क की तक़दीर के नये अध्याय की शुरूआत की जा सकती है।

शेष सात राज्यों (उ.प्र, बिहार, झारखण्ड, उत्तराखण्ड, कर्नाटक, दिल्ली, महाराष्ट्र) में मुसलमान 10 प्रतिशत से 20 प्रशित तक हैं। यह वोट प्रतिशत भी मामूली नहीं है। दूसरे लोग इतने वोट प्रतिशत पर अपनी हुकूमतें तक बना रहे हैं। अगर कोई मुस्लिम पार्टी या मुस्लिम पार्टियों का गठबंधन एक प्रभावी शक्ति बन जाए और वोट ट्रांसफर करने की स्थिति में आ जाए तो दलित और ओ.बी.सी इनसे गठबंधन करने कोमजबूर होंगे। जैसाकि तेलंगाना में टी.आर.एस ने मज्लिस के साथ किया और केरल में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ किया। यह सोचना कि कोई मुस्लिम पार्टियों को घास नहीं डालता ग़लत है। दरअसल खुद को इस क़ाबिल बनाना चाहिए कि लोग आप पर तवज्जोह दें।

इस पहलू से भी विचार किया जाना चाहिए कि मुस्लिम पार्टियां केवल चुनाव के दौरान ही क्यों नज़र आती हैं? वज सामाजिक कामों में हिस्सा क्यों नहीं लेतीं, वह कौमी और मुल्की इश्यू पर मुहिम क्यों नहीं चलातीं, वह कोई सोशल रिफ़ार्म का काम क्यों नहीं करतीं? जहालत, गरीबी और बीमारी के खिलाफ़ वह क्यों नहीं खड़ी होतीं? उन्होंने ज़मीनी सतह पर काम क्यों नहीं किया? वह इंसानों की ज़रूरत क्यों नहीं बनीं? क्या यह हकीकत नहीं है कि बी.जे.पी के अधिकतर लोक पहले कारसेवक हैं फिर बी.जे.पी के कार्यकर्ताहैं। क्या आर.एस.एस ने मुल्क में शिक्षा का समानांतर सिस्टम नहींखड़ा किया? क्या उन्होंने उच्च पदों पर तैनाती के लिए मुफ़्त कोचिंग सेण्टर नहीं खोले? क्या वह बिना सामाजिक कामों के कामयाब हो सके? इसके अलावा दूसरी पार्टियों की शुरूआत भी दरअसत एक सोशल मूवमेंट के तौर पर ही हुई है, चाहे वह दलित मूवमेंट हो या ओ.बी.सी मूवमेंट हो, हर स्तर पर पहले एक सोशल मूवमेंट खड़ा हुआ बाद में वह एक सियासी ताकत बने। एम.आई.एम ने हैदराबाद में सोशल वर्क के बहुत से काम किए इसलिए वह आज तक वहां कामयाब होते आ रहे हैं। ताज़ा उदाहरण दिल्ली में आप मूवमेंट का है। हम सब जानते हैं कि केजरीवाल इण्डिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट का हिस्सा थे उसी के कारण सियासी ताकत बने।

अगर हमें कोई प्रभावी ताकत बनना है और अपने हिस्से का हक़ हासिल करना है तो व्यक्ति और लीडर से ज्यादा इश्यू पर बात करनी होगी। हमारा अहम मसला यह नहीं है कि कितने मुसलमान मेम्बर पार्लिमेण्ट में हैं बल्कि हमारा असल मसला हमारे इश्यू हैं। हमारे इश्यू शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी हैं। हमारे इश्यू की लिस्ट में वक़्फ़ का ठीक ढंग से इस्तेमाल है। हमारा इश्यू हमारी पहचान की हिफ़ाज़त भी है। इसलिए हमें इश्यू को समझने, उन्हें सही तरीक़े पर पेश करने और सही समय पर उठाने का हुनर आना चाहिए। इसकी बेहतरीन मिसाल केरल है। केरल के मुसलमान किसी एक सियासी पार्टी को वोट नहीं करते बल्कि मुस्लिम लीग, सी.पी.आई.एम और कांग्रेस तीनों को वोट करते हैं और तीनों पार्टियों में रहते हैं। लेकिन हर नेता अपनी पार्टी में रहते हुए उस पार्टी से अपने इश्यू पर बात करता है और अपनी मांग पूरी करवाता है। यही कुछ हमारे मुल्क में सिख करते हैं वह भी तमाम पार्टियों में हैं लेकिन वह जहां भी हैं वहां सिखों के हितों की बात करते हैं। इश्यू को शक्ल देने की एक मिसाल जस्टिस सच्चर का सच है। जिस सच्चर कमेटी की बात हम करते हैं और हर दानिशवर उसका हवाला देना ज़रूरी समझता है वह यह नहीं जानते कि सच्चर कमेटी अबू सालेह शरीफ़ के एक मज़मून का नतीजा है जो अंग्रेज़ी अख़्बार में मुसलमानों की दुर्दशा पर प्रकाशित हुआ था। उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उस मजमून का नोटिस लिया और अबू सालेह शरीफ़ को बुलाकर बात की थी जिसके नतीजे में सच्चर कमेटी बनी और एक चिंताजनक स्थिति सामने आई। उसकी रोशनी में बहुत सी सरकारी स्कीमें मुसलमानों के लिए बनीं। दरअसल यह काम हैं जो हमें करना हैं। सियासत में हिस्सेदारी का फ़ायदा ही तब है जबकि सरकारी स्कीमों में हिस्सेदारी हो।

इस समय जिस इश्यू को उठाने की ज़रूरत है वह तालीम का इश्यू है। हमें हर लोकसभा क्षेत्र में मुसलमानों की तालीमी सूरतेहाल और ज़रूरत पर एक रिपोर्ट बनाना चाहिए। उस रिपोर्ट की रोशनी में उम्मीदवार से बात करना चाहिए। जो उम्मीदवार आपकी मांग को पूरा करने का भरोसा दिलाए उसको वोट करना चाहिए। जहां शिक्षा की स्थिति बेहतर हो वहां दूसरे इश्यू पर बात की जा सकती है।

आखि़र में, मै फिर यह बात कहूंगा क हम वोटबैंक की सियासत से बाहर आएं। अपनी लीडरशिप पर भरोसा करें, खुद को असरदार बनाएं। मुस्लिम लीडरशिप को भी अपनी ग़लतियों से सबक़ लेना चाहिए। हर चुनाव पांच साल बाद आता है। पांच साल अगर ज़मीनी सतह पर आप इंसानियत के लिए काम करेंगे , जहालत, बीमारी, गरीबी,करप्शन आदि के खिलाफ सन्घयर्ष करेगे, मज़हब और मसलक से ऊपर उठकर पिछड़े वर्ग , मज़लूमों और वंचितों के दिल की आवाज़ बनेंगे, तो कोई कारण नहीं कि लोग आप पर भरोसा ना करें और दूसरे समुदाय के लोग आपकी तरफ़ दोस्ती व सहयोग को हाथ ना बढ़ाएं। जैसा कि अल्लामा इक़बाल कहते हैं-

कोई क़ाबिल हो तो हम शान कई देते हैं।
ढूंढ़ने वालों को दुनिया भी नई देते हैं।।

लेखक  ऑल इण्डिया मुस्लिम इंटेलेक्चुअल्स फोरम  कन्वीनर है
अपना फीडबैक दें  _  9891929786

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