तलाक़ से भी ज़्यादा अहम समस्याएँ औरतों के सामने हैं/कलीमुल हफ़ीज़ 

Asia Times Desk

पिछले दिनों लोकसभा में विजय के बाद प्रधानमंत्री ने जो बयान दिया था, इस में अल्पसंख्यकों के विकास और विश्वास की बात कही थी। जिस से तमाम अल्पसंख्यकों को ख़ुशी हुई थी। बयान का स्वागत किया गया था। आशा जगी थी कि इस बार प्रधानमंत्री देश और देशवासियों के हित में काम करेंगे। लेकिन नई संसद का आरंभ जिस तरह जय श्री राम के नारों और बदले में नारे तक्बीर की गूंज से हुआ है, इस से अंदाज़ा हो गया है कि आगे के पांच साल संसद में क्या होने वाला है? पिछले संसद के अंतिम के दो साल मुस्लिम तलाक़शुदा के मसाइल हल करने के नाम पर तलाक़ बिल की नज़र हो गए थे।

नई संसद का आरंभ भी इसी बिल से हुआ है यानी सरकार के ज़िम्मेदारों की न नीयत बदली है, न नीति। हमारे प्रधानमंत्री को न जाने क्यों मुस्लिम तलाक़शुदा औरतों से इतनी हमदर्दी है कि वह उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं। हालांकि देश में इससे ज़्यादा संगीन मसाइल मौजूद हैं।

देश आर्थिक एतबार से पिछड़ता जा रहा है। महंगाई और बे-रोज़गारी से जनता दोचार हैं। जिहालत, ग़रीबी और बीमारी बढ़ रही है। माब लिंचिंग रुकने का नाम नहीं ले रही है। हिन्दू जुनूनियों के हाथों अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। मगर इन बातों से क्या लेना-देना। ये सब तो साहब के इल्म में लाकर ही हो रहा है। उन्हें तो तलाक़ की आड़ में मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करना है, इस्लाम को बदनाम करना है। अपने नासमझ हिन्दू वोटरों को ख़ुश रखना है।जहां तक औरतों के मसाइल का ताल्लुक़ है तो हिन्दू-मुसलमान को अलग किए बग़ैर देश की औरतों को बेहद संगीन मसाइल का सामना है। सबसे बड़ा मसला औरतों की सुरक्षा का है।

जान, माल, इज़्ज़त व आबरू की सुरक्षा हर शहरी का बुनियादी अधिकार है। बुनियादी अधिकार की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सरकार की है। नेशनल कृाइम ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में औरतों पर एक वर्ष में 84746 हम्ले हुए, जिन की एफ आई आर दर्ज की गई। यानी रोज़ाना 232 औरतें हम्ले का शिकार हुईं। दिल्ली में जहां की पुलिस डायरेक्ट केन्द्रीय सरकार के अधीन है, वहां 4165 हम्ले हुए।

महाराष्ट्र्रा जहां वर्तमान सरकार का गठबंधन एक लम्बे समय से है, वहां 11396 हम्ले हुए, उत्तर प्रदेश जहां एक संन्यासी राज-पाट संभाले हुए है, वहां 11335 हम्ले हुए। इस बीच 4485 आत्मघाती हम्ले हुए। पति या उनके घर वालों की तरफ़ से अत्याचार का शिकार औरतों की संख्या 2016 में एक लाख दस हज़ार चार सो चौंतीस (110,434) दर्ज की गईं। यह जनगणना वे हैं, जिन की एफ आई आर दर्ज हुई हैं। इससे कहीं ज़्यादा वह संख्या है, जिनकी कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई। इसके बावजूद औरतों की सुरक्षा के लिए और बेहतर नियम बनाने का हमारे प्रधानमंत्री को कभी ख़्याल पैदा नहीं होता।

यौन शोषण, यौन हिंसा, रेप, इज्तमाई बलात्कार की घटनाएं रोज़ ही अख़्बारों की ज़ीनत बनती हैं। इन घटनाओं में हर महीने और हर दिन इज़ाफ़ा हो रहा है। नेशनल कृाइम रिकार्ड ब्यूरो जो सरकार की अपनी संस्था है। उसकी 2016 की रिपोर्ट के अनुसार 38947 घटनाएं एक वर्ष में दर्ज की गईं। इस में 16863 घटनाएं नाबालिग़ बच्चियों के साथ हुई। इसका मतलब है 106 घटनाएं रोज़ाना दर्ज की गई। यानी हर नौ मिनट में एक औरत की इज़्ज़त लूट ली जाती है। यहां भी पाठक अंदाज़ा कर सकते हैं कि ऐसी घटनाओं की संख्या कितनी होगी, जिनकी एफ़ आई आर भी दर्ज नहीं होती।

कितनी पीड़ित औरतें बदनामी के डर से पुलिस में नहीं जातीं। कितनी पीड़ित औरतें दबंगों की दबंगई से मुंह बंद रखती हैं। इस एक साल में इज्तिमाई बलात्कार के 2171 घटनाएं हुईं। ताज्जुब और हैरत की बात तो यह है कि इस बीच 10 घटनाएं ऐसी हुईं, जिस में पीड़ित सरकारी कार्यकर्ताओं की कस्टडी में थी। ये घटनाएं स्कूल, कालेज, स्पतालों, ट्रेन, बस और धार्मिक आश्रमों तक में घटीं। इन में मासूम बच्चियों के साथ भी इज्तमाई बलात्कार किया गया।

औरतों की इज़्ज़त के लुटेरों में पुलिस, राजनीतिक रहनुमा, सरकारी नौकर भी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ दस महीने की बी जे पी की सरकार में (अप्रैल 2017 से जनवरी 2018 तक) बलात्कार की 3704 घटनाएं दर्ज हुईं। क्या सरकार और हमारे प्रधानमंत्री को औरतों की इज़्ज़त के तार-तार होने की कोई चिंता नहीं?

एक महत्वपूर्ण मसला दहेज की ख़ातिर जला कर मार दिए जाने का है, जिसे हम DOWRY DEATH कहते हैं। यह संगीन अपराध है। इस पर नियम भी है। इस के बावजूद दहेज के नाम पर औरतों को आज भी मौत की नींद सुला दिया जाता है। 2016 में दहेज की ख़ातिर औरतों को जान से मार दिए जाने की 7621 घटनाएं घटीं, जिसमें सबसे ज़्यादा उत्तर प्रदेश में 2223 घटनाएं की एफ आई आर दर्ज की गईं। मां बाप के पास दहेज के न होने पर कुंवारी औरतों की संख्या भी देश में लाखों में है। शादियाँ सरेआम होती हैं, तिलक और दहेज की नुमाइश भी होती है, नियम लागू करने वाले लोग और नियम बनाने वाले नेता भी शादी के प्रोग्राम में शामिल होते हैं। लेकिन मुस्लिम तलाक़शुदा के हमदर्दां को यह बुराई नज़र नहीं आती।

मुस्लिम तलाक़शुदा औरतों के हमदर्दों को कभी उन औरतों का ख़्याल नहीं आया, जिन को सरकार ने इज़्ज़त फ़रोशी का लाइसेंस दे रखा है। देश में क़ानूनी क़हबा ख़ाने और इस्मत फ़रोशी के अड्डे जिन्हें आम बोल चाल में कोठे कहा जाता है, उन में जिस्म फ़रोशी करने वाली औरतों की संख्या 657829 है। यह जनगणना Wikipedia की 2016 की रिपोर्ट से लिए गए हैं। इनके अलावा लाखों औरतें और कम उम्र लड़कियां पेट की आग बुझाने की ख़ातिर रोज़ाना अपनी इज़्ज़त बेचती हैं। क्या सरकार के पास उनकी इज़्ज़त वाली जीवन का कोई योजना नहीं? क्या देश के प्रधानमंत्री को उन औरतों की इज़्ज़त की कोई फ़िक्र नहीं? क्या उन औरतों को घर बसाने का कोई अधिकार नहीं?

भ्रूण हत्या (Foetecide) अगरचे क़ानूनी तौर पर अपराध है, मगर 20 हफ़्ते के गर्भ को ज़ाया करने की क़ानूनी छूट देकर यह रास्ता अब भी खुला हुआ है। इसी का नतीजा है कि देश में सेक्स अनुपात में फ़र्क़ आता जा रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार 1000 लड़कों पर 943 लड़कियां हैं। पंजाब में यह अनुपात सिर्फ़ 834 हैं। यह मसला केवल औरतों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण मसला है। लड़कियों की कम होती संख्या और कुंवारे लड़कों की बढ़ती संख्या देश में सेक्स अपराध में इज़ाफ़े का सबब है।

इन मसाइल के अलावा औरतों के अपहरण की घटनाएं एक साल में 33796 दर्ज की गईं, जिनमें यू.पी. में 13226 अपहरण की घटनाएं घटीं। औरतों की स्मगलिंग की घटनाएं भी देश में आए दिन होती रहती हैं। लाखों विधवा औरतें आश्रमों में दो मुठ्ठी चावल के लिए सारा दिन काम करती हैं, लाखों बीमार औरतें स्पतालों में धक्के खा रही हैं। बड़ी संख्या में ‘इज़्ज़त घर’ TOILET बनाने के बावजूद लाखों औरतें खुले में शौच करने पर विवश हैं। लाखों औरतें शराबी पति के हाथों रोज़ाना मार खाती हैं, लाखों बूढ़ी माएं तन्हा जीवन बिताने पर मजबूर हैं बुजुर्गों के लिए ओल्ड एज होम की संख्या देश भर में 728 हैं।

इन में लगभग 72000 बूढ़ी औरतें अपनी मौत का इंतिज़ार कर रही हैं। कितनी ही महिलाओं को उनके पतियों ने बग़ैर तलाक़ के छोड़ रखा है और अपनी प्रेमिका के साथ मज़े ले रहे हैं। ख़ुद प्रधानमंत्री ने शादी के बाद अपनी बीवी को अकेले इश्वर की कृपा पर छोड़ रखा है।

जिसे वह बलिदान और त्याग का नाम देते हैं, घर की औरतों को छोड़ देना, उन्हें प्यार और प्रेम से वंचित करना,उन की ज़रूरतों का ख़्याल न रखना, उनकी फ़ित्री ज़रूरतों की अनदेखी करना कौन-सा त्याग है? अगर पूरे देश के मर्द यह त्याग करने पर आ जाएं तो देश का क्या होगा??

सरकार को मुस्लिम औरतों से न कल हमदर्दी थी और न आज है। यह बिल और आरडीनेंस मगरमच्छ के आंसू और हाथी के दांत हैं। उन्हें तलाक़ के नाम पर देश को गुमराह करना है। उन्हें तलाक़ के नाम पर मुसलमानों को ज़ेहनी तक्लीफ़ में मुब्तला करना है, ताकि वह गम्भीर मसले पर बात न कर सकें। उन्हें तलाक़ के नाम पर कट्टर हिन्दुओं को ख़ुश करना है, उन्हें तलाक़ के नाम पर मस्लकी इख़्तिलाफ़ाता को हवा देना है।

तलाक़ की आड़ में देश की दम तोड़ती आर्थिक व्यवस्था और बढ़ती हुई फासीवाद की ओर से देशवासियों की तवज्जोह हटाना है, वह तलाक़ बिल की आड़ में सेक्यूलर राजनीतिक पार्टियों को हिन्दू मुख़ालिफ़ साबित करना चाहते हैं। वरना उन्हें ज़रा सी भी मुस्लिम महिलाओं से हमदर्दी है तो वह उनकी शिक्षा के लिए स्कूल क़ायम करें, उनके इलाज के लिए अस्पताल बनाएं, उनके बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए स्कालर्शिप दें, बेगुनाह नौजवानों को जेल से रिहा करें, जिन की माएं उनकी सूरतें देखने को तरस रही हैं, वह नजीब को ढूंढ कर लाएं, जिस की मां घर की चौखट पर बैठी अपने लाल का इंतिज़ार कर रही है।

मेरी राय है कि देश के बुद्धिजीवि और इल्म व क़लम वाले लोग आगे आएं और देश के लोगों को औरतों के असली मुद्दों से आगाह करें। तलाक़ की आड़ में सरकार के एजेंडे पर से नक़ाब उठाएं। इस सिलसिले में क़लम वाली औरतें अगर पेश-पेश हों तो ज़्यादा बेहतर होगा।

मैं मुसलमानों से भी अपील करूंगा कि वह सब्र व धैर्य से काम लें, देश के हालात को समझें। शरीअत को मज़ाक़ न बनाएं। तलाक़ के बेहतर तरीक़े पर अमल करें। अभी सरकार तलाक़ न देने का क़ानून नहीं बना रही है, बल्कि तलाक़ को किस तरह देना है? इस पर क़ानून बना रही है। जैसा कि मैंने कहा कि सरकार की मंशा इसके ज़रिए मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करना है। आज एक क़ानून में तब्दीली करके वह यह इशारा देना चाहती है कि पर्सनल लॉ बदलने के लायक़ है। पर्सनल लॉ के बदलने के लायक़ होने से देश में समान नागरिक संहिता का रास्ता आसान हो जाएगा।

 लेखक : इंडियन मुस्लिम इंटेलक्चुअल्स फ़ोरम, कन्वेनर हैं 

 

 

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