न्यायालय पर कभी किसी तरह का राजनीतिक दबाव नहीं आया – जस्टिस कुरियन जोसेफ

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का कोई खेद नहीं है, ऐसा इसलिए किया क्योंकि कोई रास्ता नहीं बचा था। संस्था के हित के लिए ऐसा किया।अभी सब कुछ ठीक नहीं हुआ, उसमे वक़त लगेगा।लेकिन ट्रांसपरेंसी की शुरुआत हुई है।

Awais Ahmad

सुप्रीम कोर्ट से गुरुवार को रिटायर हुए जस्टिस कुरियन जोसफ ने शुक्रवार को रिटायर होने के दूसरे दिन उनका जन्मदिन पत्रकारों के साथ अपने घर पर मनाया। जस्टिस कुरियन जोसफ ने जन्मदिन पर पत्रकारों से बातचीत में कहा कि जनवरी में प्रेस कांफ्रेंस करने का अफसोस नहीं है।

पत्रकार ने जब जस्टिस कुरियन जोसफ से सवाल किया कि क्या चीफ जस्टिस के कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का खेद है? तो जस्टिस जोसेफ ने जवाब में कहा कि कोई खेद नहीं है, ऐसा इसलिए किया क्योंकि कोई रास्ता नहीं बचा था। संस्था के हित के लिए ऐसा किया।अभी सब कुछ ठीक नहीं हुआ, उसमे वक़त लगेगा।लेकिन ट्रांसपरेंसी की शुरुआत हुई।

क्या न्यायपालिका पर सरकार का दबाव के सवाल पर जस्टिस कुरियन जोसफ ने जवाब दिया कि जहां तक एक जज के अपने न्यायिक अधिकार के इस्तेमाल की बात है, उस पर सरकार के दबाव को उन्होंने महसूस नहीं किया। पर हां, कई बार जजों की नियुक्ति, ट्रांसफर से जुड़ी फाइलों को क्लियर करने में सरकार की ओर देरी होती है।

जजों की नियुक्ति को लेकर मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर पर सरकार और कॉलिजियम के बीच मतभेद पर जवाब देते हुए जस्टिस कुरियन जोसफ ने कहा कि मुझे नहीं मालूम क्या मतभेद है। सुप्रीम कोर्ट कॉलिजियम के मुताबिक उनकी ओर से मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर फाइनल है। वही सरकार कहती है कि अभी फाइनल नहीं हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर में कोई बदलाव की भविष्य में उम्मीद पर जस्टिस कुरियन जोसफ नेे कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम बहुत छोटे है। उस अनुपात में, जितनी संख्या में यहां केस और उससे जुड़े लोग आते है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया अयोध्या मामले को लेकर BJP नेताओं के बयान पर कहा कि एक बार जब कोई सुप्रीम कोर्ट का जज फैसला सुनता है, तो वो law of the land बन जाता है। ऐसे राजनीतिक दलों को संशय की स्थिति में स्पष्टीकरण के लिए कोर्ट का रुख करना चाहिए।

जनहित याचिकाओं पर पूछे गए सवाल पर जस्टिस जोसेफ का जवाब देते हुए कहा कि बिना मतलब के मुद्दों पर जनहित याचिका दायर कर कोर्ट का कीमती वक़्त बर्बाद होता है। सुप्रीम  कोर्ट को उन मुद्दों पर खुद को केंद्रित करना चाहिए, जो सीधे जनहित से जुड़े है।

 

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