‘जंग और खिदमत’ दुनिया में दोनो का एक साथ हो रहा धंदा

इमरान अंसारी

एशिया टाइम्स

मुद्दे की बात: पिछले कई दिनों से सीरिया की भयावह तस्वीरों और वीडियो से सामना हो रहा है। इंसान इस हद्द तक जा सकता है इंसानों को गाजर मूली की तरह काटा जाएगा इन सब बातों की तर्जुमानी ये तस्वीरें करती है। वहां के हालात की भयावहता का अंदाज़ा इसी से होता है कि मजबूत से मजबूत और पत्थर दिल इंसान भी इनको देख कर ख़ौफ़ से तारी हो जाए।

परंतु मुद्दा यहां ये नही है असल मुद्दा तो ये है कि जो लोग जंग कर रहे हैं या हजारों लोगों के नरसंहार के जिम्मेदार है वही लोग बाद में समाज सेवा और पुनरूद्धार का ढोंग करेंगे। आलमी सियासत का ये हाल दिल को दर्द देता है बहुत दर्द देता है।

जी चाहता है कि उठ के चला जाऊं उन सीरिया के मज़लूमों के पास और अपनी रहती जान तक जितना बन पड़े उतनी खिदमत करूँ। छोटे छोटे बच्चे जो खून में लतपथ हैं उनको अपनी गोद मे ले कर हॉस्पिटल तक जाऊ और उनके पूरी तरह ठीक होने तक उनके कदमों में पड़ा रहूं।

ऐसी भी क्या सियासत जो लोगों की लाशों पर कायम हो। उस सत्ता का क्या करना जो हजारों बच्चों की लाशों पर कायम हो। ठोकर मरता हूँ ऐसी सत्ता को जो मुझमे से मेरे इंसान होने का एहसास खत्म कर दे।

एक इंसान का कत्ल पूरी इंसानियत का कत्ल है ये बात आज के आलमी नेता कूड़े के डब्बे में डाल चुके है। पहले लाखों डॉलर के हथियार बेचेंगे और लोगों की कब्रें खुदवा डालेंगे फिर कुछ हजार डॉलर उन्हीं में से समाज सेवा के नाम पे दान कर के शैतान के फ़रिश्ते होने का ऐलान करेंगे।

पनाह मांगता हूं ऐसी सोच से। कुछ तो ख़ौफ़ खाओ उस अल्लाह का जिसके पास एक दिन हम सबको लौट के जाना है।

शैतानों की फ़ौज इंसान की जान की कीमत समझो और खिदमत को बदनाम मत करो। समाज सेवा एक पाक साफ रूहानी ग़िज़ा है इसको अपनी गंदी राजनीति से दूर रखो और उन सीरिया के बच्चों में अपने बच्चों के चेहरे देखो फिर शायद तुम लोग को कुछ रहम आ जाए।

इमरान अंसारी

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