जज लोया मौत मामला: अमित शाह का जिक्र होने पर वकीलों के बीच बहस

महाराष्ट्र सरकार की तरफ से पेश होते हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे पर दवे ने आपत्ति जताई। दवे ने कहा कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की तरफ से पेश होने के बाद महाराष्ट्र सरकार की तरफ से साल्वे का पेश होना उचित नहीं है और उन्होंने संस्थान को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है और यहां पर हितों के लाभ का मामला है।

Awais Ahmad

सीबीआई जज बीएच लोया की संदिग्ध मौत को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई हुई। इस केस की सुनवाई चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि किसी भी हाईकोर्ट में अब जज लोया से जुड़े मामले की सुनवाई नहीं होगी। बॉम्बे हाईकोर्ट में जो दो याचिकाएं पेंडिंग हैं, उन्हें भी सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर किया जाए। कोर्ट ने दोनों पक्षकारों से कहा है कि वे अपने दस्तावेज सीलबंद कर कोर्ट को सौंपे। मामले की अगली सुनवाई 2 फरवरी, दोपहर दो बजे होगी।

पीठ ने कहा, ‘मामला गंभीर है। हम सभी सामग्री का परीक्षण कर रहे हैं। हमारी जमीर को यह कभी नहीं लगना चाहिए हमने सभी पहलुओं पर गौर नहीं किया।’

बता दें जस्टिस लोया सोहराबुद्दीन शेख, उसकी पत्नी कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति की गुजरात में फर्जी मुठभेड़ में कराई गई हत्या के मामले की सुनवाई कर रहे थे। वर्ष 2005 और 2006 के इन मामलों के आरोपियों में से एक गुजरात के तत्कालीन गृह राज्यमंत्री अमित शाह को अदालत में पेश होने के लिए कई बार समन दे चुके थे। लेकिन शाह पेश नहीं हो रहे थे।

बांबे लॉयर्स एसोसिएशन की तरफ से पेश होते हुए वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे हस्तक्षेपकर्ता के तौर पर इंदिरा जयसिंह ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार की तरफ से पेश किए गए रिकार्ड पूरे नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने जिक्र किया कि उन्होंने कुछ कागजात आरटीआई के जरिए प्राप्त किए हैं।

जस्टिस डी.वाई.चंद्रचूड़ सिंह ने दोनों पक्षों को अपने पास मौजूद दस्तावेजों को दाखिल करने की अनुमति देते हुए कहा, ‘रिकॉर्ड को सीमित करने का कोई सवाल नहीं है। रिकॉर्ड का संकलन तैयार करें।’

सुनवाई के शुरू होने पर महाराष्ट्र सरकार की तरफ से पेश होते हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे पर दवे ने आपत्ति जताई। दवे ने कहा कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की तरफ से पेश होने के बाद महाराष्ट्र सरकार की तरफ से साल्वे का पेश होना उचित नहीं है और उन्होंने संस्थान को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है और यहां पर हितों के लाभ का मामला है।

वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने अदालत की सहायता के लिए एमाइकस क्यूरी की नियुक्ति की मांग की, लेकिन अदालत ने उनकी बात को अनसुना कर दिया।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘हम उन परिस्थितियों पर गौर कर रहे हैं जिसकी वजह से जस्टिस लोया की मौत हुई। हम इस पर टिप्पणी नहीं करेंगे कि कौन किसकी तरफ से पेश हो रहा है।’

दवे व साल्वे के बीच बहस में दवे ने कहा, पूरा संस्थान एक आदमी को बचाने की कोशिश में जुटा है-अमित शाह और सिर्फ अमित शाह, जिसका उन्होंने महान उत्कृष्ट राजनेता के तौर पर वर्णन किया है।

इस पर साल्वे ने आपत्ति जताते हुए कहा, ‘अमित शाह, अमित शाह क्या कह रहे हैं। आप किसी पर उसकी अनुपस्थिति में दोष लगा रहे हैं। आप किसी पर आक्षेप नहीं लगा सकते। आप किसी पर टिप्पणी नहीं कर सकते, क्योंकि वह व्यक्ति प्रमुख राजनेता बन चुका है।’

प्रतिद्वंद्वी वकीलों के बीच बहस में जयसिंह ने साल्वे के बयान पर आपत्ति जताई कि वह जो भी कुछ याचिकाकर्ताओं व हस्तक्षेपकर्ता वकीलों से साझा करेंगे, उसकी गोपनीयता बरकरार रखी जाएगी और उसे मीडिया के साथ साझा नहीं किया जाएगा। इस पर जयसिंह ने कहा कि यह मीडिया के खिलाफ झूठ बोलने की अनुमति मांगने जैसा है।

इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि ‘वह यह नहीं कह रहे कि मीडिया से झूठ बोलें। वह सिर्फ कह रहे।’ जयसिंह ने विरोध करते हुए कहा, ‘इसका मतलब झूठ बोलना ही है।’

 

क्या है पूरा मामला?

बता दें कि जस्टिस लोया बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख मामले की सुनवाई कर रहे थे। 2005 में सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर को गुजरात पुलिस ने अगवा किया और हैदराबाद में हुई कथित मुठभेड़ में उन्हें मार दिया गया था। सोहराबुद्दीन मुठभेड़ के गवाह तुलसीराम की भी मौत हो गई थी। इस मामले में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का भी नाम जुड़ा था।

मामले से जुड़े ट्रायल को सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में ट्रांसफर किया था। इस मामले की सुनवाई पहले जज उत्पत कर रहे थे, लेकिन इस मामले में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के सुनवाई में पेश नहीं होने पर नाराजगी व्यक्त की थी। जिसके बाद उनका तबादला हो गया था। इसके बाद जस्टिस लोया के पास इस मामले की सुनवाई आई थी।

वर्ष 2005 और 2006 के इन मामलों के आरोपियों में से एक गुजरात के तत्कालीन गृह राज्यमंत्री अमित शाह को अदालत में पेश होने के लिए कई बार समन दे चुके थे। लेकिन शाह पेश नहीं हो रहे थे।

अगली सुनवाई से एक रात पहले लोया अपने एक दोस्त की बेटी की शादी में शामिल होने नागपुर गए थे। वह एक रेस्ट हाउस में ठहरे थे, जहां उनकी संदिग्ध हालात में मौत हो गई। उनकी बहन के मुताबिक, 48 वर्षीय लोया की मौत की खबर और उनका सामान लेकर आरएसएस का एक कार्यकर्ता उनके घर गया था। उन्हें तभी शक हुआ। मगर वे चुप रहे, क्योंकि उनके परिवार को फोन पर धमकियां मिल रही थीं।

जस्टिस लोया की मौत के बाद जिन जज ने इस मामले की सुनवाई की, उन्होंने अमित शाह को मामले में बरी कर दिया था।

हाल ही में कुछ समय पहले एक मैग्जीन ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि जस्टिस लोया की मौत साधारण नहीं थी बल्कि संदिग्ध थी। जिसके बाद से ही यह मामला दोबारा चर्चा में आया। लगातार इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी जारी रही है। हालांकि, जज लोया के बेटे अनुज लोया ने कुछ दिन पहले ही प्रेस कांफ्रेंस कर इस मुद्दे को बड़ा करने पर नाराजगी जताई थी। अनुज ने कहा था कि उनके पिता की मौत प्राकृतिक थी, वह इस मसले को बढ़ना देने नहीं चाहते हैं।

 

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