6 साल बाद गाँव में गुज़ारे 6 दिन,कितना बदल गया है गाँव ?

अशरफ अली बस्तवी (गाँव से लौट कर)  

Asia Times Desk

गाँव में टूटी फूटी सड़कें हैं

फिर भी उनका लम्स मखमली क्यों है ?

अप्रैल  2014 में ‘इन्कलाब उर्दू’ के नार्थ जोन के संपादक शकील शम्सी द्वारा फेसबुक पर पोस्ट की गई  उक्त लाइनें पढ़ कर मेरे ज़ेहन में ‘बस्ती – मेंहदावल’ मार्ग का जर्जर मंज़र सामने तैरने लगा था.

मैंने भी कविता की इन्हीं लाइनों की रोशनी में उसी समय एक लेख पोस्ट किया था जिसे वतन से दूर  रहने वाले दोस्तों ने खूब पसंद किया और  अपने अपने जज़्बात का इजहार किया.

उलझे तारों को सुलझाने में लगे 6 साल

6 साल के लम्बे अन्तराल के बाद 17 जून को अपनों के दरम्यान हाज़िर होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, अब ‘बस्ती – मेंहदावल’ शानदार राज्य मार्ग में तबील हो चुका है. इस दरम्यान प्रोफेशनल और निजी ज़िन्दगी के उलझे तारों को सुलझाने में मेरे 6 साल कैसे बीत गये पता ही नहीं चला.

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 यह वही ‘बस्ती – मेंहदावल’ मार्ग है जो अब  शानदार BMCT राज्य मार्ग में तबील हो चुका है

दिल्ली से निकलते समय यह फ़िक्र सता रही थी की गाँव के नौजवान नस्ल से जान पहचान कैसे होगी, लेकिन  भला हो सोशल मीडिया का उसने अब बड़ी आसानी पैदा कर दी है.

इस मसरूफ ज़िन्दगी में दूर रह कर भी करीब रहा जा सकता है इसका अंदाज़ा तब हुआ जब गाँव में पहुंचने पर नई नस्ल ने पुरजोश स्वागत किया सब मेरे फेस बुक फ्रेंड निकले.

कौन कहता है कि प्रदेश में रहने वालों को अपनी मिटटी की याद नहीं आती . हर पल याद आता है वह आँगन जिसमे आज भी मेरे लड़खड़ाते क़दमों के निशान बाकी हैं.

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गाँव के नौजवान नस्ल सब मेरे फेस बुक फ्रेंड निकले

दिल्ली से दिल लगाने पर हुए मजबूर 

गाँव के उत्तर दिशा में पुश्तैनी तालाब के करीब क्रिकेट का मैदान में शाम गए तक हम अपने हमजोलियों के साथ आमिर खान की फिल्म ‘लगान’ के स्टाइल में क्रिकेट खेला करते थे .

नौजवानी के दिनों में जहां बैठ कर घंटों विभिन्न विषयों पर दोस्तों के साथ बहस किया करते थे. लेकिन 2006 में वक़्त ने करवट ली गमे रोज़गार की तेज़ हवाओं के थपेड़ों ने हमें दिल्ली की सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया , और दिल्ली से दिल लगाने पर मजबूर होगए.

गाँव अब काफी बदल गया है

गाँव अब बदल गया है विकास की बयार ने वह रंग दिखाया है की अब हर परिवार का अपना पक्का मकान  है घर में फ्रिज है वाशिंग मशीन है और ज्यदा तर घरों के सामने मोटर साइकल खड़ी दिखीं, चार पहिया गाड़ियों का चलन तेज़ी से बढ़ा है.

गाँव में विकास की गंगा यहाँ बहुत देर से पहुँचती है और जल्द सूख जाती है

आप यह कह सकते हैं कि 20 साल पहले साइकलों की जो तादाद थी अब उस तादाद में मोटर साइकलें हैं और 20 साल पहले गाँव में मोटर साइकलों  की जो तादाद थी अब उतनी गाँव में चार पहिया गाड़ियां देखी जा सकती हैं.

पक्की सड़कें पहले से काफी तादाद में बनी हैं लेकिन समय से मरम्मत न होने की वजह से टूट फूट का शिकार हो रही हैं. गाँव की असल समस्या यह है की विकास की गंगा यहाँ बहुत देर से पहुँचती है और जल्द सूख जाती है .

पंचायती राज विभाग स्थाई विकास की योजना लाने में विफल रहा है . गाँव को दी जाने वाली  मूलभूत सुविधाओं को जरी रखने की कोई व्यवस्था नहीं है , अगर है तो निष्क्रिय है .

देखने में यह भी आया कि इस दौरान छोटे बाज़ारों का आकार तेज़ी से विकसित हुआ है , छोटे बाज़ारों ने अब कस्बों का रूप लेना शुरू कर दिया है , दो बड़े कस्बे सेमरयावा और लोहरौली शहरों का पीछा कर रहे हैं , बस्ती शहर की रौनक में लखनऊ का मंज़र साफ़ दिखाई दे रहा था.

‘तालीम से ही तस्वीर बदलेगी’

इलाके में स्कूलों की संख्या देख कर लगा कि ‘तालीम से ही तस्वीर बदलेगी’ का मतलब तप्पा उजिआर के लोग अब बखूबी समझने लगे हैं पहले से चल रहे स्कूलों का स्तर बढ़ा है, नये नये स्कूल खुल रहे हैं , स्कूलों की संख्या बढ़ी है लगभग एक दर्जन के करीब 12 वीं तक के नए स्कूल खुल गए हैं .

शिक्षा की गुणवत्ता में हुआ सुधार

शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है , प्रतियोगी परीक्षाओं का रुझान बढ़ा है. इसका श्रेय ‘बुनियाद फाउंडेशन ‘ के मुखिया AW Khan  को जाता है  बुनियाद ने उजिआर में ‘बुनियाद टैलेंट सर्च परीक्षा’ की शुरूआत 2012 में की थी इस का बड़ा अच्छा नतीजा रहा .

बच्चों में प्रतियोगिता की  भावना का विकास हुआ अब हर साल तप्पा उजिआर के बच्चे AMU, BHU , Navodaya  समेत  बस्ती व खलीलाबाद शहर के प्रतिष्ठित स्कूलों में दाखिला पा रहे हैं.

ख़ुशी इस बात की है कि वह सपना जो मैंने 1996 में देखा था पूरे 20 साल बाद साकार हुआ

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‘अली मियाँ मेमोरियल पब्लिक स्कूल ‘ के ऑफिस में 

चूंकि यह सफ़र मुकम्मल निजी था इसलिए ज्यादा समय अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मुलाक़ात में गुज़रा ,लेकिन फिर भी कोशिश रही की कुछ अहम लोगों से मुलाक़ात की जाये ,

पहली मुलाक़ात बड़े भाई हाजी मुहम्मद हुसैन साहब और उनके परिवार से हुई. बड़े बेटे सुफियान , सलमान , अल्ताफ और अराफात की कारोबारी और तालीमी सरगर्मियां देख ख़ुशी हुई .

सब से ज्यादा ख़ुशी इस बात की हुई की मैंने स्कूल खोलने का जो ख्वाब को 1996 में देखा था और उसी वक़्त उसका ज़िक्र हाजी साहब से किया था आज उसी स्थान पर ‘अली मियाँ मेमोरियल पब्लिक स्कूल ‘ चल रहा है .

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‘अली मियाँ मेमोरियल पब्लिक स्कूल ‘ के युवा डायरेक्टर मुहम्मद अल्ताफ से मुलाक़ात 

पूरे 20 साल बाद जाकर 2016  में सपना साकार हुआ . बहुत कम समय में स्कूल ने काफी तरक्की की है . फ़िलहाल 400 से अधिक बच्चे हैं 10 वीं तक की तालीम का बंदोबस्त है. स्कूल के डायरेक्टर मुहम्मद  अल्ताफ  ने बताया की हमें  इस को 12 वीं तक ले जाना हैं जिसकी कोशिश जरी है .

यकीनन हाजी हुसैन साहब का यह बड़ा क़दम है यह स्कूल इस एतेबार से काफी अहम समझा जाना चाहिए की यह उस गाँव (‘बननी’) के एक व्यक्ति ने कायम किया है जहां 20 वीं सदी के अंत तक तालीम हासिल करने को गाँव  का समाज इसे समय की बर्बादी  समझता था .

1999 में  पहला ग्रेजुएट होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था और अब उसी गाँव का एक नौजवान मुहम्मद अल्ताफ 400 बच्चों को पढ़ा रह है. खुदा इस इदारे को बुलंदियां अता करे (आमीन) .

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 ‘जीवन विकास संसथान’ के राष्ट्रिय अध्यक्ष डॉक्टर शकील खान से रही  तफ्सीली मुलाक़ात

दूसरी मुलाक़ात  ‘जीवन विकास संसथान’ के राष्ट्रिय अध्यक्ष डॉक्टर शकील खान से उनके आवास पर तफ्सीली मुलाक़ात रही उनसे इलाके के तालीमी हालात सामाजिक , राजनैतिक सूरतेहाल पर चर्चा हुई .

जीवन विकास संसथान’ की स्थापना  

‘जीवन विकास संसथान’ की स्थापना  के अब 25 साल हो गये हैं श्री खान ने इस की स्थापना 1994 में किया था , संसथान के बैनर पर कई अहम् प्रोग्राम किये और लोगों में समाज सेवा की चेतना जगाया और प्रतिभाओं को सम्मानित किया. श्री खान बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति हैं.

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‘ज़ोहरा फैज़ेआम गर्ल्स इंटर कालेज ‘ बाघनगर

सरगर्म सियासत में क़दम रखा  और जिला पंचायत का चुनाव जीत कर जनता की सेवा की, इस वक़्त उनकी पूरी तवज्जो बच्चियों की तालीम के लिए कायम ‘ज़ोहरा फैज़ेआम गर्ल्स इंटर कालेज ‘ बाघनगर के विकास पर केन्द्रित है डॉक्टर खान से मिलकर माज़ी ,हाल और मुस्तकबिल पर काफी अच्छी चर्चा  हुई .

‘अदनान’ की सरगर्मियों से वाकफियत से ख़ुशी हुई

तीसरी मुलाक़ात राष्ट्रिय सहारा हिंदी के संवददाता छोटे भाई ‘अदनान दुर्रानी‘ से हुई , अदनान की सरगर्मियों से वाकफियत से ख़ुशी हुई की वह उजिआर की अवाम को आस पास के हालत से  बा खबर रखने के साथ साथ  नई नस्ल को तालीम देने का भी सरगर्म  हैं .

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‘अदनान दुर्रानी‘

इलाके के शिक्षित युवा देश दुनिया के विकास में भागीदार बनें,  उनका  का  बेहतर भविष्य कैसे और बेहतर बने इस पर चर्चा हुई .

बाघनगर में ‘मुस्लिम इंडस्ट्रियल हायर सेकंड्री स्कूल’ की स्थापना उनके पिता मरहूम हबीबुर्रहमान साहब  ने 1978 में किया था , इस स्कूल ने अपने स्थापना के दिन से ही तमाम चैलेंजों का डट कर सामना किया .

बच्चे 12 वीं तक की तालीम पा रहे हैं , खुदा से दुआ है की तालीम का यह मरकज़ हमेशा  आबाद रहे. मेरी जूनियर तक की तालीम यहीं की है.

जमात इस्लामी हिन्द सेमरियावा की लोकल यूनिट

चौथी मुलाक़ात , जमात इस्लामी हिन्द सेमरियावा की लोकल यूनिट से रही ,तप्पा उजिआर में जमात इस्लामी हिन्द से फिकरी तौर पर वाबिस्ता लोग हमेशा से रहे हैं मुकामी जमात का नज़्म बहुत पहले से था.

जमात के सीनियर मेम्बर हकीम शकील साहब लम्बे समय से काम कर रहे थे लेकिन 2012 -13 में  सेमरियावा में जमात का विस्तार तेज़ी से तह हुआ जब डॉक्टर नफीस अख्तर इस कारवां में शामिल हुए और जमात की सरगर्मी बढ़ी. इस समय जमात के  9 मेम्बर हैं.अब्दुल हादी खान अमीरे मुकामी हैं.

यहाँ हकीम शकील साहब और  अब्दुल हादी खान,खैरुल बशर ,एजाज़ अहमद , शमीम अहमद वकील से उजिआर में तहरीके  इस्लामी की पेशरफत पर गुफ्तगू रही.

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एन आई सी मूंडाडीहा बेग के प्रिंसपल  मुजीबुल्लाह कलीम के साथ 

और किन किन अहम लोगों से हुई मुलाक़ात

मुलाकातों के इसी क्रम में एन आई सी मूंडाडीहा बेग के प्रिंसपल मेरे उस्ताज़ मुजीबुल्लाह कलीम व ए एच एग्री इंटर कालेज दुधारा के प्रिंसपल मुनीर अहमद, से दुआएं लेने के बाद पूर्व ब्लाक प्रमुख महमूद आलम चौधरी , मौलाना वकार असरी ,अब्दुल बारी खान , अल हुदा
पब्लिक स्कूल के मेनेजर फैजान अहमद, सीनियर पत्रकार ज़फीर अहमद करखी , पत्रकार मुहम्मद परवेज़ अख्तर, दसवीं के  सहपाठी मास्टर अब्दुल्लाह , सुल्तान नूरुद्दीन ,  भाई रमजान अली , भाई अदील अहमद ,  ए एच इंटर कालेज पैडी के संस्थापक सुहेल अहमद, इन्तहाई मुखलिस करम फरमा जनाब फ़तेह अहमद, पूर्व कनिष्ठ प्रमुख शब्बीर अहमद,सामाजिक   कार्यकर्ता मोहम्मद हारुन साहिल , डाक्टर तारिक रशीद उस्मानी , डॉक्टर अदील अहमद, डॉक्टर समीउल्लाह सिद्दीकी, बड़े भाई जमाल अहमद , जमील अहमद मुहम्मद नैय्यर, जूनियर स्कूल के मेरे उस्ताज़ मास्टर जमाल अहमद, और मुहम्मद अलीमुल्लाह से मिलने, उनका हाल जानने उनके साथ कुछ पल गुज़ारने का अनुभव ज़ेहन अब भी ताज़ा है .

मुलाकातें जो अधूरी रह गईं

जो मुलाकातें अधूरी रह गईं उनमें पत्रकारिता के गुरु बड़े भाई कमालुद्दीन सिद्दीकी ، हरदिल  तप्पा उजिआर के अज़ीज़ लीडर ज़िला पंचायत सदस्य मुहम्मद अहमद,, भाई रज़ी अहमद , एम् एन पब्लिक स्कूल के संस्थापक जुबैर अहमद , एम् आई एम् के जिला सचिव वसीम अहमद, ग्राम सेहुंडा के लोकप्रिय प्रधान अफ़ज़ाल अहमद , अल हिदयाह पब्लिक स्कूल के संस्थापक मौलाना निसार नदवी, स्कूलिंग  लाइफ के मेंटोर मास्टर अब्दुर रहीम,  ग्रेजुएशन के  करीबी क्लास फेलो मुनव्वर हुसैन, तनवीर अहमद ,गुलाम हुसैन , खालिद कमाल, और इलाके के दीनी मदरसों के ज़िम्मेदारों से मिलने का प्रोग्राम पूरा ना हो सका. इंशाल्लाह फिर मिलेंगे अगर खुदा लाया .

दुःख इस बात का है कि अब गांवों में नैतिक मूल्यों पर भौतिकता हावी हो चुकी है

यह तो रही सफ़र की मुख़्तसर रूदाद जो आप ने सुनी , कहते हैं ना कि सफर आप को काफी कुछ सिखाता है, मुझे भी इस सफ़र से बहुत कुछ सीखने और जानने समझने को मिला.

देखने में यह आया कि गाँव का भाई चारा ,मेल मिलाप  भौतिक विकास की भेंट चढ़ गया है, मालूम हुआ कि अब मेरे गाँव के छोटे मोटे झगड़े भी बाघनगर पुलिस चौकी पर ही हल होते हैं .

समाज में भौतिक वादी सोच ने गहरी पैठ बना ली है कोई किसी को बर्दाश्त करने को बिलकुल तैयार नहीं है , फिरका परस्ती का जो बीज प्रेम की मनों मिटटी तले दबा  हुआ था अब वह कांटेदार झाड़ी की शकल ले चुका है.

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गाँव की दो बेटियों की शादी में हुई शिरकत

दीनी मदारिस के मौलाना मदरसों के भविष्य को लेकर चिंतित दिखे, इनकी चिंता वाजिब है क्योंक कि मदरसे इस समय स्टूडेंट्स की कमी से कराह रहे हैं. मुसलमानों की नई नस्ल में इस्लाम से दूरी बढ़ी है अलबत्ता मुशायरों का चलन आम हुआ है.

आम नौजवान  अपनी समाजी जिम्मेदारियों के प्रति गंभीर नहीं हैं , अमीर और गरीब के दरम्यान खाई बहुत गहरी हुई  है . बेटियों की शादियों  में मुश्किलात  बहुत बढ़ी हैं दहेज़ का रिवाज शिद्दत से पकड़ चुका है , अब दहेज़ में मोटर साइकल का लेन देन आम हो गया है बात चार पहिया तक आ पहुंची है.

लोग बताते हैं कि गाँव में गाड़ियों की तादाद बढ़ने की बड़ी वजह दहेज वाली मोटर साइकलें ही हैं . कुल मिलाकर अगर यह कहा जाये तो ग़लत ना होगा कि नैतिक मूल्यों पर भौतिकता हावी हो चुकी है

सफ़र 6 साल बाद हुआ था इसलिए कोशिश रही की ज्यादा से ज्यादा मुलाकातें की जाएँ इस लिए कुछ मुलाकातें अधूरी रहीं और कुछ छूट भी गईं . लेकिन जिन जिन लोगों से मुलाक़ात रही उन से दोबारा मिलने की तमन्ना लिए दिल्ली वापस लौट आया .

लेखक : एशिया टाइम्स नई दिल्ली  के चीफ एडिटर हैं

#standagainstmoblynching जंतर-मंतर से एशिया टाइम्स की Live Reporting

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