नमाज़ ख़तम हुई तो मैं ने रोहित से सवाल किया , क्या यहाँ कोई मस्जिद नहीं है ?

जैन शम्सी 

Ashraf Ali Bastavi

वर्धा आए दो ही दिन हुए थे , पहाड़ पर बनी यूनिवर्सिटी के करीब पठार पर बनी हुई मस्जिद और वहां से आती अज़ान की आवाज़ से दिल मुतमईन था कि अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिए अल्लाह का घर भी ज्यादा दूर नहीं है . जुमे के दिन हज़रत खिज्र से रास्ता पूछता हुआ मस्जिद की तरफ बढ़ गया . चढ़ाई इतनी थी कि सांसे मुन्तशिर हो चलीं थीं . धुप की ग़ज़बनाक तपिश को झेलते हुए मस्जिद के दरवाज़े पर पहुंचा . बाब ऐ मस्जिद पर बड़े बड़े सुनहरे अलफ़ाज़ में दर्ज तहरीर पर निगाह गयी , नोश्ता ए दीवार जो भी था उसे इस लिए नहीं लिख सकता कि इस से किसी ख़ास मसलक को ठेस पहुंच जायेगा बस यह समझ लीजिये कि उस मस्जिद में मुसलमान नमाज़ अदा नहीं कर सकते अगर वह उसी मसलक के नहीं हुए .

मायूसी हुई , फिर सोचा चलो जब मुझे ही मेरे मसलक के बारे में नहीं पता है तो इन्हें क्या पता चलेगा . मस्जिद के अंदर गया , नया चेहरा होने की वजह से लोगों की निगाह में था , नहीं जानता था कि यहाँ किस तरह से नमाज़ पढ़ी जाएगी और मैं उसी तरह से नहीं पढ़ सका तो ना जाने क्या अंजाम हो . दिल में वस्वसा तारी था , ना जाने किस खौफ से बाहर निकल आया . चढ़ाई के वक़्त जिस्म थक सा गया था उतरते वक़्त ज़हन थका हुआ था.

जुमे की नमाज़ बाजमायत ना पढ़ सका . आँखें भीगी हुई थीं और दिल काबू में नहीं था . कमरे पर ही चादर बिछाई और इजतमाई नमाज़ को इन्फ्रादी बनाते हुए अल्लाह से सब कुछ ठीक कर देने की दुआ मांग ली .

नमाज़ ख़तम हुई तो रोहित को कमरे में दाखिल होते ही मैं ने उस से सवाल किया .
क्या यहाँ कोई मस्जिद नहीं है ?

हाँ ! सर है क्यों नहीं . बाजु में ही तो है , देखिये यहाँ से नज़र भी आ रही है .
वह सब के लिए नहीं है . ख़ास लोगों के लिए है . मुझे यह कहने में शर्म आई .
रोहित हंसा , सर अब हिन्दू वहां थोड़ी ना जायेंगे , मुस्लमान ही जायेंगे ना . आप जाओ , गए क्यों नहीं .
नहीं वहां सब मुस्लमान भी नहीं जा सकते हैं . और कोई मस्जिद है तो बताओ .
एक मस्जिद है शहर में , आप को दिखा दूंगा .

रोहित सर खुजाता हुआ “नहीं जा सकते नहीं जा सकते” बडबड़ाता हुआ मेरे लिए लाया हुआ ठंडा पानी कमरे में छोड़ कर चला गया .

रमजान के पहले जुमा शहर की एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ कर निकला तो गर्म धुप में मोटर साइकिल के पास रोहित इंतज़ार कर रहा था . वह मुझे ज़बरदस्ती अपनी मोटर साइकिल पर मस्जिद लाया था और जब तक मैं नमाज़ पढता रहा वह बाहर मेरा इंतज़ार करता रहा . मोटर साइकिल के पीछे बैठ कर में रोहित के बारे सोच रहा था . इस बच्चे के लिए मैं जन्नत की दुआएं भी नहीं मांग सकता , कि यह अल्लाह का मुनकिर है और अल्लाह का मुनकिर खाह कितना भी अच्छा काम करे जन्नत तो नहीं जा सकता .
छोटी स्नेहा अफ्तार के वक़्त बर्फ ला कर पूछती है . आप दिन भर पानी भी नहीं पीतो इस गर्मी में .
नहीं , में मुस्करा कर जवाब देता हूँ .
हे भगवान् कितनी प्यास लगती होगी आप को .
बहुत , बहुत ज्यादा . में उसे जवाब देता हूँ . मेरे साथ अफ्तार करोगी . देखो मैं ने tang बनाया है , अब उस में बर्फ डालूँगा और देखो यह खजूर और यह केले और अंगूर , आम भी है .
उस ने सब चीज़ों को देखा , में माँ से पूछ कर आती हूँ ,
माँ यानी मेरी मकान मालकिन ,
आप का उपवास ख़राब हो जायेगा , स्नेहा की ऊँगली पकड़ कर वह मेरे पास आते हुए बोलीं ,
नहीं उपवास तोड़ते हुए जितने लोग साथ होंगे , रोज़ा उतना ही अच्छा होगा , मैं ने उन्हें बताया . आप भी मेरे साथ रोज़ा खोल लीजिये , मैं ने उन से दरखास्त की .
नहीं स्नेहा है ना , मैं अभी काम कर रही हूँ , वह फैसला नहीं कर पाईं शायद , या फिर ऐसा उन्हों ने कभी क्या नहीं था , इस लिए मुस्कराते हुए जाने लगीं तो में ने कहा , रोहित को भेज दीजिए .
रोहित ने कहा आप लोग फलों से उपवास तोड़ते हैं , हम लोग भी .
हाँ , मगर यहाँ बहुत कुछ नहीं मिलता , घर पर होता हूँ , तो पापड़ , पकोड़ा , चना , चूड़ा , मिठाई और बहुत कुछ होता है .
बोलते ना माँ बना देती .
नहीं , रोज़े में किसी को तकलीफ देना गुनाह है .
हम ने दोनों बच्चओं के साथ छ दिन तक , जब तक मैं वहां रहा अफ्तार करता रहा और उन के मासूम सवालों का जवाब देता रहा .
आप के यहाँ उपवास का का क्या कांसेप्ट है . नारायण जी ने एक दिन पुछा . वह मेरे मकान मालिक थे .
भूक का करीब से एहसास करना . यह समझ पैदा करना कि भूका आदमी कितना सहता है अपनी ज़िन्दगी में . ग़रीबों के बारे में सोचना कि वह कितना कष्ट झेलते हैं जीवन भर . उन के लिए खाना पीना कितनी अहमियत रखता होगा . यही कांसेप्ट है .
पंजाब कॉलोनी से ज़रा सी बाहर निकलेंगे तो एक हनुमान मंदिर मिलेगा . उस के बग़ल की दीवार से सटी हुई है , वसीम भाई की चाय की दूकान . 5 घोंट चाय 8 रूपए की देते हैं . छोटे से कप में चाय लेते हुए मैं ने पुछा , वर्धा वाले चाय कम पीते हैं क्या . बहुत महंगी बेचते हैं आप .
नहीं पूरे वर्धा में यही कीमत है ,
मुझे ज्यादा दिया किजिये, हम दिल्ली वाले चाय के बगैर नहीं रह पाते . उन्हों ने दो घूँट चाय कप में और डालते हुए पुछा , आप दिल्ली से हैं .
हाँ यहाँ पढ़ाने आया हूँ यूनिवर्सिटी में . चाय का नशा है , आप की दूकान देखी तो आ गया . मुझे पूरे 10 की चाय दे दिया किजिये .
चाय पीते हुए मैं ने एक दिन उन से पुछा , हनुमान जी के बग़ल में चाय बेचते हैं , कोई परेशानी तो नहीं हुई , अब तक .
जो परेशान करता है , उसे ख़राब चाय दे देता हूँ , वह हँसे . परेशानी क्या होगी , सर जी , 25 साल तो हो गए हमें , अब तक तो नहीं हुई . अल्लाह का करम है , हनुमान जी के बग़ल में ही रोज़ी लिखी हैं उन्हों ने . मेहरबानी है . और क्या बताऊँ .
उर्दू विभाग के सहायक प्रोफेसर हिमांशु शेखर ने एक दिन कहा , चलिए आज में आप को सिद्दीकी साहब से मिलवाता हूँ .
यह कौन साहब हैं .
अनुवाद विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं , दिलचस्प आदमी हैं , शायरी भी करते हैं . आप से मिलेंगे तो खुश हो जायेंगे .
शायरी तो करता हूँ जैन साहब . लेकिन लोग कहते हैं कि मीटर ठीक नहीं है . आप कुछ मदद करें .
उन के घर पर पहुंचा तो इसी जगह से बात शुरू हुई .
आप दर्जी नहीं हैं कि मीटर से नाप लीजियेगा . शायरी कोई कपडा है सिद्दीकी साहब . बस कहते जाईयें , कहना ज़रूरी है . ग़ालिब और इकबाल , फैज़ और जोश के सारे शेर सुनने लाईक थोड़े ही हैं , कुछ ही शेर से मशहूर हुए . ज़रूरी है कहना , कहने का सलीका तो तभी आएगा जब कहना आएगा .
हाँ बस यही सोच कर कहता हूँ . फिर उन्हों ने कुछ अच्छे और कुछ बहुत अच्छे शेर सुनाए , अब में उन से क्या कहता कि मीटर की समझ तो मुझ में भी नहीं है , और शेर पर दाद ना देना गुनाह ए अज़ीम है , सो में दाद देता गया .
बहुत दिनों से हूँ यूनिवर्सिटी में . लोग कहते हैं , मराठी मुस्लमान और वह भी हिंदी का, असंभव , मगर में हूँ . मेरी हिंदी और संस्कृत और मराठी बहुत अच्छी है , उर्दू से दिलचस्पी है , सो शेर कह लेता हूँ . लोग बुलाते हैं . और सुनिए , शहर के सब से बड़े राम नवमी उत्सव में मैं पर्मुख वक्ता के रूप में शिरकत करता हूँ . बजरंग दलियों की महफ़िल में राम कथा सुनाता हूँ , साफ़ साफ़ कहता हूँ , मैं बेहंगम जय श्री राम के नारों वाले राम को नहीं जानता , मैं उस मर्यादा पुर्शुत्तम राम को जानता हूँ जो सत्य के पुजारी थे . मैं उस राम की बात नहीं करता जिस के नाम पर हिंसा का रास्ता निकाला जाता है .
सिद्दीकी साहब खुले दिल ओ दिमाग के आदमी हैं . उन्हों ने कहा कि जैन साहब जब भी दिल करे अफ्तार के वक़्त घर पर आ जाए , साथ बैठ कर बातें करेंगे .
वर्धा एक ग़रीब जिला है . जो महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में बसा है . आप जो महाराष्ट्र के किसानो की आत्म हत्या के बारे में सुनते हैं , उन में 80 प्रतिशत किसान इसी छेत्र के होते हैं , और इसी छेत्र के बारे में नाना पाटेकर का वह डायलाग है कि महाराष्ट्र में अगर कोई आदमी भीख मांगता दिखाई दे तो यह मत समझ लेना की वह भिकारी है , हो सकता है कि वह कोई किसान हो . वर्धा के लोग बहुत शालीन और भोले हैं , वीमन स्टडी विभाग में प्रोफेसर शरद जैसवाल कहते हैं कि यह रिसर्च का मौजू होना चाहिए की वर्धा अब तक नफरत की राजनीती से दूर क्यों है .
वर्धा में सिर्फ 4 प्रतिशत मुस्लमान हैं, और वह भी मस्ल्की तौर पर बटे हुए हैं . इस लिए यहाँ की सियासत हिन्दू मुस्लिम वाली नहीं है . शायद यही वजह है कि रोहित को मालूम नहीं कि रोज़ा और नमाज़ पर भारत की क्या दिशा और दशा है , वसीम भाई को भी मालूम नहीं की नफरत की इस दुनिया में मेरे सवाल की क्या अहमियत है , और सिद्दीकी साहब को भी शायद यह पता नहीं की कब रामनवमी के उत्सव में उन का नाम प्रमुख वक्ता से हटा दिया जाए .
बहुत दिनों के बाद एक ऐसा भारत देखने को मिला जहां लोग अपने काम में लगे हैं और बेहद प्रोफेशनल हैं . बहुत दिनों के बाद एक ऐसे शहर में था जहाँ से लौटने पर मन दुखी है.

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