शरिया कोर्ट क्या समांतर कोर्ट है?

Shakeel Ahmed Gujrat

Ashraf Ali Bastavi

जिन मुद्दों पर वर्तमान सरकार सत्ता में आई थी वह हर क्षेत्र में विफल रही है। इसके अलावा, देश में सांप्रदायिकता और कम्युनलिज्म में वृद्धि हुई है। जो भारत की पहचान को बदनाम कर रहा है। मोबोक्रेसी (भीड़तंत्र) की बढती घटनाओ पर सरकार कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं कर रही है (जब हवलदार खुद चोरी कर रहा तो गिरफतार किसे किया जाएगा!!)। बढ़ती हुई लिंचिंग और कानून व्यवस्था की स्थिति इतनी खराब है के सुप्रीम कोर्ट को लाल आंख करते हुये कहना पडा के लिंचिंग को रोकने के लिए सरकार कोई कानून बनाए। सुप्रिम कोर्ट के आदेश को सरकार कितनी गंभीरता से लेगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा। क्योंकि अक्सर लिन्चींग में “अंधभकत” ही लिप्त हैं। हा अगर अपराधी का संबंध मुसलमानो से होता तो बहुत उत्साह देखने को मिलता। गौ-हत्या और लव-जिहाद के नाम पर, तो कभी औरंगज़ेब और बाबरी मस्जिद के नाम पर, कभी अल्पसंख्यक युनिवर्सिटीओ में रीज़रवेशन के नाम पर, तो कभी त्रीपल तलाक और हलाला के नाम पर दो समुदाय के दरम्यान गलतफहमी, द्वेष, घृणा और दुश्मनी पैदा की जा रही है, ताकि आने वाले चुनावों में इसका लाभ उठाया जा सके। वे इस माहौल को बनाए रखेंगे बल्कि अधिक दूषित करेंगे। दिल खोल कर पैसा मिल रहा हो तो मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी अपनी जवाबदारी को भुल कर सरकार की वफादारी ही करेगा।
इस प्रकार, एक बयान में मुस्लिम पर्सनल लॉ के एक सदस्य ज़फरयाद जीलानी ने कहा है की, हमारी इच्छा देश के हर ज़िले में शरिया कोर्ट की स्थापना करने की है जिसका उद्देश्य यह है कि दारुल कज़ा के माध्यम से शरियत की रोशनी में लोग अपने मामलों को हल कर सकते हैं। भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति डो. अंसारी ने देश के हर जिले में शरिया अदालत के लिए ओल इन्डिया मुस्लिम पर्सनल लो बोर्ड (AIMPLB) के प्रस्ताव को समर्थन देते हुवे कहा है की, “प्रत्येक समुदाय को अपने निजी कानून पर अमल करने का अधिकार है। कानून व्यवस्था के साथ सामाजिक व्यवहार में लोग उलझन महेसूस करते हैं। हमारे कानून में यह स्वीकार कर लिया गया है कि प्रत्येक समुदाय के अपने नियम हो सकते हैं। भारत में पर्सनल लो व्यक्तिगत कानून विवाह, तलाक, गोद लेने और विरासत को शामिल करता है। प्रत्येक समुदाय को अपने निजी कानून पर अमल करने का अधिकार है।”
संविधान के जानकार और कानूनी विशेषज्ञ जानते हैं कि प्रत्येक समुदाय को अपने निजी कानून पर अमल करने की पूर्ण स्वतंत्रता है, और इस तरह की समस्या को हल करने के लिए ऐसे केंद्रों का स्वागत होना चाहीए। लेकिन कुछ कोमवादी किसी मामले को गलत रूप देने के लिए हंमेशा तैयार रहतें हैं, और अगर उन्हें कामयाबी नहीं मिलती तो अफवाह फैलाने में भी पुरा दम लगा देते हैं। इसी तरह, ‘हमें शरियत कोर्ट नहीं दिया जा सकता तो मुसलमानो को अलग देश दे दो’ यह संदेश फेसबुक पर पर्सनल लो के तीन सदस्य की फोटो के साथ पोस्ट किया गया था, जो बाद में इन्डिया टुडे की वाईरल टीमने जांच करते हुवे फेक साबित किया।
देश के विभाजन की त्रासदी के कारण मुसलमान पहले से ही नहीं किये हुये कामों की सजा भुगत रहे है तो एसा सपने में भी नहीं सोच सकते। मुसलमान भारत के संविधान के प्रति प्रतिबद्ध हैं, उनकी देश से मोहब्बत – राष्ट्र भावना पर कोई उंगली नहीं उठा सकता, न ही मुसलमानो को इसको साबित करने की जरुरत है। शरिया कोर्ट के मामले में बहुत सारे प्रश्न उठाए गए हैं या कुछ लोगों ने इसे समांतर कानून प्रणाली के रूप में समझा है। इस प्रकार, हमारी सरकार और मीडिया एक गैर-मुद्दे को मुद्दा बनाने में पूरी तरह शक्तिमान है। इसकी बहस से पहले दो घटनाओं का उल्लेख सुसंगत रहेगा।
एक महिला हमारे केंद्र में आई और खुब गुस्से से कहा के मेरे पतिने मुजे खुब मारा है, में घर से चली आई हुं और किसी भी किंमत पर मुजे तलाक चाहीए, मुजे उसके साथ अब नहीं रहना है। वह मुझे तलाक दे दे ताकि मैं दूसरी शादी कर के सुखी जीवन गुजार सकुं । जब उसके पति से संपर्क किया गया तो वह भी बहुत चिढा हुवा था। उसने कहा की, 25 साल से सहन कर रहा हुं, अब बहुत हो गया है, जब से गई है खूब शांति है, मे फिरसे अपने जीवन को नर्क नहीं बनाना चाहता। परिस्थिति बिल्कुल स्पष्ट थी लेकिन हमने सोचा कि तलाक की प्रक्रिया शुरू करने का प्रयास करने से पहले, दोनों के संबंध सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए, हालांकि, महिला उसके लिए तैयार नहीं थी । हमने दोनों को सुना. कुरान-हदीस की रोशनी में खूब समझाया, साथ में रहेने से दुनिया और आखेरत में क्या कया फायदे हैं। 25 साल के विवाहित जीवन के बाद इस उम्र में यह फैसला लेने से खूब नुकसान होगा इस बात पर भी खूब काउन्सेलिंग की गई, और अल्लाह की कृपा से हमारी कोशिशों को सफलता मिली, आज दोनो खुशी से जीवन गुजार रहै हैं। मात्र दो मीटिंग में, एक भी रुपया खर्च करे बगैर समस्या का हल आ गया। यह मात्र एक घटना है। ऐसी अनेक घटनाएं हमारे सेंटर पर आती हैं जिसमें 99 प्रतिशत केसो में हमें सफलता प्राप्त हो जाती है। किसी भी प्रकार का खर्च और फीस नहीं ली जाती। इस प्रकार के सेंटर को हम शरई पंचायत या काउन्सेलिंग सेन्टर कहेते हैं। अब आप स्वयं विचार करे कि ऐसे सेंटर समाज के लिए अभिशाप हैं या आशिर्वाद समान हैं।
एस भाई से मुलाकात हुई, बात-बात में घर की बात नीकली तो गमगीन हो गया। कहने लगा, साहब जी, 10 साल हो गया है मेरी पत्नी पीअर से नहीं आ रही और खाना-खोराकी का केस करा हुवा है, इससे ऊब पर मेने भी छुटाछेडा लेने का केस कर दिया है, अभी तक कोई फैसला के निर्णय आया नहीं है। लेकिन कोर्ट का धक्का, वकीलो का खर्च और पत्नी को खाना-खोराकी के लिए महिने का 10 हजार रृपिया देते देते मानसिक और आर्थिक तौर पर मेरी कमर तूट चुकी है, जीवन बहोत मुश्किल हो गया है… आप लोगो का बहोत अच्छा है के तलाक दे कर अलग हो जाते हैं।!!!
दोनों मामले काल्पनिक नहीं हैं। मेरे व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर हैं। निराकरण की कौन सी प्रक्रिया सरल, सस्ती, सुखद और अच्छी है यह आप खुद समझ सकतें हैं। पहले मामले में आया सुखद अंत इसी शरई पंचायत या काउन्सेलिंग सेन्टरनी दैन है।
शरिया कोर्ट की हकीकत क्या है?
शायद ‘कोर्ट’ शब्द लोगों में गैरसमज पैदा करा हो या कुछ लोगो को शरियत के नाम से ही अेलर्जी हो सकती है। AIMPLB जिस शरियत कोर्टनी बात कर रहा है वो वर्तमान कोर्ट की कोई समान्तर व्यवस्था नहीं बल्कि परिवार के व्यक्तिगत मामलो को कुरआन और हदीस की रोशनी में निराकरण लाने वाला सेन्टर है। कोर्ट शब्द से गलतफहमी पैदा होती है तो उसके लिए दारुल कज़ा, शरई पंचायत या इस्लामी काउन्सेलींग सेन्टर जैसे नाम देना ज़्यादा व्यवहारिक है। मुसलमान सिविल और अपराधिक मामले में वर्तमान अदालत में ही जाते हैं। शरियत कोर्ट (दारुल कज़ा) दो पार्टीयों के बीच में Arbitral Council (मध्यस्थ सम्मेलन) की तरह काम करता है।
दूसरा, जो लोग अल्लाह से डरते हैं और उस पर विश्वास करते हैं वो अपने कामों के लिए सर्वशक्तिमान अल्लाह के सामने ही जवाबदार हैं और कल (मरने के बाद) अपने कामो के नतीजो का सामना करना पडेगा एसे लोग ही फतवा लेने ऐसी कोर्ट में जाते हैं। दोनो पार्टीयां शरीअत कोर्ट (दारुल कज़ा)के प्रमुख अर्थात् काज़ी के फैंसले को मानने का विश्वास दिलाते हैं, तो ही कीसी मामले में वह फतवा देते हैं. फैंसला सुन्ने के बाद जो पार्टीयां उस पर अमल न करें तो दारुल कज़ा को कोई अधिकार नहीं है के वह उसे लागू कर सके, न ही दंडित कर सकता है और न ही जेल भेज सकता है. न ही उसके फैंसलो को कोई लीगल बाउन्डींग है, बल्कि दोनो पार्टीयां वर्तमान कोर्ट में भी जा सकती हैं।
तीसरा, पारिवारिक समस्याओं को छोडकर सिविल और क्रिमिनल मैटर में वो कोई हस्तक्षेप नही करता । ऐसे मामलों में सामान्य अदालत का पालन किया जाता है, इस्लामी कानून के अऩुसार फैंसला नहीं दिया जाता।
क्या शरीयत कोर्ट असंवैधानिक है?
मुसलमानों की व्यक्तिगत समस्याएं के निराकरण के लिए 1937 में जो शरिया एक्ट बनाया गया था वह आज भी लागू है। भारत की वर्तमान कोर्ट भी कोई फैंसला देते समय उसे अपने सामने रखती है। और मात्र मुसलमान ही नहीं भारत में लगभग 250 पर्सनल लाॆ हैं, जैसे शीख, ख्रिस्ती, जैन आदि सब अपने अपने पर्सनल लो पर अमल करते हैं उसी तरह मुसलमानो को भी उसका अधिकार है। विवाह, तलाक आदि मामलो में ज़्यादा तर धार्मिक लोग अपने धर्म के रीति रिवाज के अनुसार अमल कर हैं और धार्मिक गुरुओ के पास जाते हैं।
कलम 89 और सिविल प्रोसीजर कोड के आर्डर 10 के नियम 1-ए को पढीए जो स्पष्ट करता है के कोर्ट, पक्ष को Alternative Dispute Resolution (वैकल्पिक विवाद समाधान) की पांच स्थितियों में चुनने का निर्देश देता है। इसमें मध्यस्थता (Arbitration), समाधान (Conciliation,) मध्यस्थ (Mediation), न्यायिक निपटान (Judicial Settlement), लोक अदालत (Lok Adalat) है। शरिया कोर्ट भी इस तरह की ADR है।
क्या शरीयत कोर्ट महिला विरोधी है?
दारुल कज़ा कोई महिला विरोधी सेन्टर नहीं है। इस्लामने महिला को जितना अधिकार दिया है शायद दुसरे किसी धर्मने नहीं दिया। दारुल कज़ा नियमों के आधिन है और अधिकतर एसे सेन्टर में खुला (तलाक लेने के लिए) के केस और विरासत से संबंधित केस आतें हैं। काज़ी कुरआनकी रोशनी में फतवे देकर समाधान लाता है। और अधिकतर पक्षकारों को संतोष होता है। कोर्ट में हंमेशा पक्षकारो को असंतोष होता है या अन्याय की भावना पैदा होती है। लेकिन दारुल कज़ा में अधिकतर दोनो पक्षकार खुशी खुशी घर जाते हैं। “शरियत कोर्ट महिला विरोधी है” यह मात्र प्रोपेगन्डा है, जिसका कोई आधार नहीं है।
सभी नागरिक इन्डियत पीनल कोड का पालन करते हैं तो मुसलमानो को कया समस्या है?
अदालत किसी भी राज्य का एक अभिन्न अंग है उसके बिना देश में अराजकता फैल सकती है। देश को मजबूत बनाने के लिए कानून बनाया जाता है जिसके अनुसार अदालतें फैसले देती हैं। इसे सरकार, प्रबंधन प्रणाली, पोलीस के द्वारा लागू किया जाता है जो उसके खिलाफ जाता है उसे दंडित किया जाता है। एक देश में दो अलग-अलग अदालत नहीं हो सकती हैं, इससे समस्या बढ़ जाएगी। किसी भी देश में दो सर्वोच्च प्राधिकरण नहीं हो सकते हैं। लोग, सरकार को सत्ता देते है की देश की प्रणाली चलाए लेकिन लोग और सरकार के बीच एक समझौता होता है की सरकार उसके निजी जीवन में हस्तक्षेप नहीं करेगी। जिस देश में यह जन अधिकार और कर्तव्य के बीच संतुलन होगा वहां समाज में शांति और न्याय रहेगा। भारत में सभी नागरिक हिंदु हो या मुस्लिम, शिख हों या ईसाई सभी देश के संविधान पर भरोसा रखते हैं और अपने नीजि मामलो के अलावा सभी मामले में वर्तमान कोर्ट का ही अनुगमन करते हैं और भारत का हर नागरिक अपने पर्सनल लो पर अमल करता है जिसका अधिकार संवेधानिक कलम 25 मे दिया गया है।
कभी-कभी पुलिस स्टेशन में दोनों पक्षों के बीच सुलह हो जाती है. हर कोर्ट में मीडीएशन सेन्टर होता है. जहां दोनो पक्षकारो के बीच सुलेह करवाने की कोशिश की जाती है। वहां असफलता मीलती है तो केस टेबल पर आता है। आंतरिक समस्याओ का एसे सेन्टर्स में निराकरण मिल जाय एसा खुद सरकार सोचती है। कोर्ट में केसो की संख्या बहोत ज़्यादा है और न्यायाधीशों की संख्या पुरी नहीं है. 5 हजार न्यायाधीश की जगा खाली है और एक कानूनविद के मुताबिक एक लाख 30 हजार जजीस की जरुरत है। एसी स्थिति में शरिया कोर्ट, पंचायत या काउन्सेलींग सेन्टर हमारी न्याय प्रक्रिया के लिए खुब मददगार साबित हो सकती है।
एक डर दिखाया जाता है कि, मुसलमानो की तरह दूसरे धर्म के लोग भी एसी मांगे करें तो देश का क्या होगा? इस तरह का सवाल व्यर्थ है। हकीकत में दूरसे धर्म के लोग भी अपनी निजी समस्याओ के निराकरण में पंच या धार्मिक आगेवानो का आश्रय लेते हैं। मुझे बताइए अगर कोई सेन्टर नहीं हो और दो आदमी आपके पास आए के हमें आपके उपर पुरा विश्वास है… आप हमारी बीच मध्यस्थ बन कर हमारी समस्याओ का निराकरण लाओ तो आप क्यां करेंगे? कोई भी सज्जन व्यक्ति मध्यस्थ बनने के लिए मना नहीं कहेगा। इस तरह, शरिया कोर्ट भी आंतरिक संघर्ष के हल की वैकल्पिक विधि का नाम है। इन केन्द्रो की वजह से हिन्दु और मुसलमान के बीच दूरी या नफरत का सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि इसमे सिर्फ एक ही धर्म के लोग जाते हैं। दूरीयां और नफरत बढने का कारण एसी पंचायतो या सेन्टर्स नहीं बल्कि राजनेताओ की नीति है। जैसे की गुजरात में कई सालो से शांति होने के बावजुद कई इलाको में ‘अशांत धारा’ लागू है और ऐसे विस्तार बढ़ रहे हैं। यह लोग नहीं चाहते के दो समुदाय के लोग एक मंच उपर आए या बहु-धार्मिक समाज की रचना हो। बल्कि संवेदनशील इलाको में शांति कमिटी या सद्भावना मंच का काम ही यह है की अलग-अलग समुदाय के बीच स्नेह-प्रेम पैदा हो और लोग मिलजुल कर रहें। इसकी प्रभावशीलता और लाभों को ध्यान में रखते हुए, पुलिस स्टेशनो में भी ऐसी समितियां बनाई गई हैं, जो पोलीस के कामो को आसान बनाती हैं। इसी तरह शरीयत कोर्ट से अदालतो के कामो में आसानी होगी।
यह गलत शंका भी दूर करना चाहीए कि शरियत कोर्ट के जरिये इस्लामी राज्य की स्थापना का प्रयत्न किया जा रहा है और न हीं भारत का इस्लामीकरण करने का मकसद है। इसकी हैसियत मात्र मध्यस्थी कमिटी की है. यह शंका साम्राज्यवादी ताकतो द्वारा नियोजित तरीके इस्लाम विरोधी दुष्प्रचार है। जिन्होंने ISIS और अलकायदा जैसे संगठऩ उत्पन्न करके इस्लाम को बदनाम करके का षड्यंत्र बनाया है। इस्लाम धर्म किसी भी देश में अराजकता फेलाने में विश्वास नहीं रखता। वह अपनी विचारधारा को तार्किक और बुद्धिमानी तरीके से प्रस्तुत करता है।
क्या शरीयत कोर्ट (दारुल कज़ा) और खाप पंचायत एक जेसी हैं?
शरीयत कोर्ट की खाप पंचायत के साथ तुलना करना ठीक नहीं. क्युंकि खाप पंचायत पारिवारिक के अलावा दुसरे सिविल मेटर और कितनी बार क्रिमीनल मेटर (चोरी, बलात्कार, हत्या आदि) में भी हस्तक्षेप करती है, फैंसला सुनाती है। यह पंचायत भी कोई कानूनी इकाई नहीं लेकिन उनके पास अपने फैंसलो का पालन करवाने का सामाजिक दवाब होता है। जबरन बल का उपयोग कर सकते हैं। वो दंड और बोयकोट कर सकते हैं। जब कि शरीयत कोर्ट के पास एसी कोई ताकत नहीं, काज़ी मात्र अपना अभिप्राय दे सकता है।
क्या एसी कोर्टे देश के लिए लाभकारी हैं या हानिकारक?
ऐसी कोर्ट या सेन्टर्स देश के लिए बहुत ही लाभकारी है। अब, जबकि वर्तमान कोर्ट में एक अंदाजे के मुताबिक 4 करोड से भी ज़्यादा केस पेन्डींग हैं … उनको निपटाने में एक विशेषज्ञ के मुताबिक 366 साल लगेंगे। देश की एक तिहाई जनता गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजार रही हैं और बहुमत मध्यम वर्ग पर आधारित हैं। एक आम व्यक्ति के लिए न्याय प्राप्त करना कठिन, महंगा और लंबा है जिससे कोई संतुष्टि भी नहीं है। एसी स्थिति में ज़्यादा से ज़्यादा एसे सेन्टर्स खड़े किये जाएं तो त्वरित निकाल मिल सकता है।
 (अमीर, जमाअते इस्लामी इस्लामी हिंद, गुजरात)
(गुजराती से अनुवाद: RashidHussain Shaikh – युवासाथी के सौजन्य से)

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