क्या सच में टैक्स पेयर होना महान काम है?

रविशंकर प्रसाद अपनी बेटी को बोस्टन पढ़ाई करने भेजते हैं कोई सवाल नहीं करता?

एशिया टाइम्स

जनता दरबार:- बहुत सारे लोग कहते हैं कि आप हमारे टैक्स के पैसों से पढ़ाई कर रहे हो। कोई कहता है मैं टैक्स पेयर हूँ। कब तक टैक्स पेयर के पैसों से पढ़ाई करोगे। देखो आईआईटी वाले 25 साल में टैक्स देने लगते हैं और जेएनयू वाले 30 साल तक टैक्स पेयर के पैसों से पढ़ाई करते हैं।

पहली बात स्पष्ठ है कि टैक्स देने के लिए शिक्षा जरूरी नहीं आमदनी जरूरी है। आप कितना टैक्स देंगे ये आपकी आमदनी पर निर्भर करता है पढ़ाई या डिग्री पर नहीं। आईआईटी वाला 90 लाख का वेतन लेकर टैक्स देता है और अगर कोई समोसा बेचने वाला 90 लाख कमाएगा तो वो भी उतना ही टैक्स देगा। इसमें आईआईटी से पढ़ने से कौन सा तीर मार लिया है?

इकॉनमिक सर्वे के अनुसार किसान की औसतन आमदनी 20 हजार सालाना है तो क्या वो कम देशभक्त है। मेरा वेतन टैक्स के दायरे में नहीं आता तो क्या में भारतीय नहीं हूँ वो बात अलग है सारा पैसा GST भरने के लिए खर्च होता है। घरों मैं औरतों को मुफ्त काम कराया जाता है तो क्या वो भारतीय नहीं है क्योंकि उन्हें जब पैसे नहीं मिलते तो टैक्स कहां से भरेंगी। जानवर टैक्स नहीं भरते तो उनकी हत्या कर दी जानी चाहिए?

टैक्स-टैक्स-टैक्स बड़ी बहस है? हमारे सांसद, मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और नौकरशाह वो भी टैक्स के पैसे से अपना खर्चा चला रहे हैं कोई पूछता हैं कि बिना टैक्स भरे ये लोग टैक्स के पैसों को क्यों बर्बाद कर रहे है।

टैक्स पेयर के पैसों से सेना को घटिया खाना मिलता है आवाज़ उठाने पर निकाल दिया जाता है। सीआरपीएफ के जवान गोल्ड स्टार का जूता पहनते हैं और अधिकतर लोग मलेरिया से मर जाते हैं कोई पूछा टैक्स पेयर का पैसा कहां गया?

छात्र पर हमला करना आसान है लेकिन वो बैक फायर करता है। रविशंकर प्रसाद अपनी बेटी को बोस्टन पढ़ाई करने भेजते हैं कोई सवाल नहीं करता कि आपने अपने बच्चों को सरस्वती शिशु मंदिर में क्यों नहीं पढ़ाया? टैक्स पेयर होना कोई महान काम नहीं है।

लेखक:- प्रशांत कनोजिया

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