क्या राम मंदिर निर्माण सिर्फ चुनावी मुद्दा है?

Awais Ahmad

Written by: Rukhsar Anjum

 

भारत एक कृषि प्रधान देश के साथ साथ धर्म प्रधान देश भी है। जहां किसान और धर्म दोनों के नाम पर खूब सियासत होती है। एक तरफ जहां देश का किसान आत्महत्या कर रहा है वहीं दूसरी तरफ हर धर्म के अनुयायी अपने धर्म के प्रति कट्टरवादी विचारधारा रखते हैं। जिसका लाभ राजनितिक पार्टियाँ उठाती हैं।

पांच राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और मिज़ोरम में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और चुनाव प्रचार ज़ोरो पर है रोज़ लगभग 50 से ज़्यादा चुनावी जनसभा इन राज्यों में हो रही है। चुनाव का मौसम हो और राम का नाम सियासी पार्टी की ज़बान पर ना ऐसा हो नही सकता। एक तरफ जहां पीएम मोदी से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चुनावी मैदान में अपना दम भर रहे है वही दूसरी तरफ राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर ज़ोरों पर है। कोई यह कहता है कि सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस से राम मंदिर का विरोध किया और 2019 तक सुनवाई टालने की बात कही तो कोई कहता है कि संसद में राम मंदिर को लेकर अगर कानून लाया जाए तो क्या विपक्ष इसका सहयोग करेगा तो कोई कहता है राम मंदिर अयोध्या में ही बनेगा और आपसी सहमति से बनेगा तो कोई कहता है कि राम मंदिर की एक इंच भी ज़मीन किसी को नही दी जाएगी।

यहाँ सवाल यह है कि क्या राजनितिक दल वाक़ई में राम मंदिर का निर्माण चाहते हैं या इस बार भी ये महज़ एक चुनावी मुद्दा बन कर रह जायेगा? जैसा कि अभी तक हर चुनाव में देखने को मिला है सत्ता में आने के लिए राम मंदिर बनाने का वादा करके वोट का धुर्वीकरण करने की कोशिश जम कर होती रही है।

देश के पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। जिसमे से ज़्यादातर राज्यों में भाजपा की सरकार 10 साल से है। जहां राज्यों में चुनाव का मुद्दा विकास का होना चाहिए वहां राम को याद किया जा रहा है और जम कर बयान बाज़ी लगभग सभी जनसभाओं में देखने को मिल रही है। 2019 में भी लोकसभा का चुनाव होने वाला है। जिसमे अब ज़्यादा वक़्त नही बचा है। इसी लिए एक बार फिर राम मंदिर निर्माण का मुद्दा ज़ोरों पर हैं। क्योंकि भाजपा का अभी तक के चुनाव में अहम मुद्दा राम मंदिर ही रह है। लोगो को उम्मीद भी थी कि प्रचंड बहुमत वाली केंद्र में मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आने क्व बाद राम मंदिर बनाने का रास्ता साफ हो जाएगा। लेकिन अब दोनों ही सरकार वादा तो कर रही है कि राम मंदिर वही बनेगा लेकिन इस वादे में सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई की दुहाई भी जम कर दी जा रही है।

इस बार चुनाव से पहले राजनीतिक दलों की जगह लेकिन हिंदू कट्टरवादी विचारधारा वाले संगठन राम मंदिर मुद्दे पर फ्रंटफुट पर नज़र आ रहे है। दिल्ली से लेकर अयोध्या तक विराट धर्म सभा का आयोजन भी हो रहा है। और राम मंदिर को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर मन्दिर निर्माण के लिए दबाव बनाया जा रहा है। शायद उन्हें भी ये बात समझ आ गयी है कि राम मंदिर का निर्माण कोई भी राजनितिक दल नहीं करवा सकता। इसी लिए हिन्दू संगठनो ने खुद ही इस मुद्दे को खत्म करने के लिए राम मंदिर निर्माण के लिए आगे गया रहे है।

24- 25 नवंबर अयोध्या, वाराणसी और नागपुर में धर्म सभा का आयोजन हुआ। अयोध्या में को शिव सेना, आर एस एस और हिन्दू युवा वाहिनी के संचालकों के साथ साथ तक़रीबन दो लाख लोगों ने शिरकत की और राम मंदिर निर्माण के कार्य को आरम्भ करने की मांग की। अयोध्या में विहिप के महामंत्री चम्पत राय ने कहा कि हमें पूरी की पूरी जमीन चाहिए। पूरी जमीन मिलेगी तभी विकास होगा। सुन्नी वक्फ बोर्ड केस वापस ले। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अब हमारे सब्र की परीक्षा मत लो, जमीन का बंटवारा नहीं होना चाहिए, विवादित जगह नमाज नहीं पढ़ने देंगे।

वही दूसरी तरफ पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की धर्म संसद में शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि धर्म में राजनीति,राजनीति में धर्म नही होना चाहिए। मोदी सरकार को घेरते हुए कहा कि नोटबन्दी से जनता और व्यापारी परेशान है।

वाराणसी की धर्म संसद में शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि इनकी नियत राम मंदिर की नही है। ढांचे को गिराया मुसलमानों को मजबूती दी। ढांचा गिराकर मुसलमानों को मजबूती दी। 6 दिसंबर के दिन एक ढांचा ही नही कई चीजें टूटी। राम चबूतरा और हनुमान मंदिर भी वहां तोड़े गए।

नागपुर में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर नहीं बनेगा तो कहां बनेगा। अयोध्या में राम का भव्य मंदिर बनेगा। लगता है मंदिर कोर्ट की प्राथमिकता नहीं।कोर्ट से जल्दी निर्णय मिलना चाहिए। आरएसएस प्रमुख मोहनभागवत ने अल्टीमेटम देते हुए कहा कि मंदिर के मामले को बार-बार टाला जा रहा है। जनहित का मामले कोर्ट में नहीं टलना चाहिए। भागवत ने कहा कि राम मंदिर होने की पुष्टि हो चुकी है। सत्य औऱ न्याय को टालना ठीक नहीं है। कोर्ट को मंदिर मामले पर जल्द फैसला देना चाहिए। अयोध्या में मंदिर बाबर के सेनापति ने गिराया।

अब बात यह है की 2014 के लोक सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर निर्माण को अपने वोटिंग अजेंडे में सर्वोपरि रखा था और अपनी हिन्दू हित की छवि बनाई थी लेकिन सत्ता में आने के बाद बीजेपी जैसे राम मंदिर निर्माण को भूल ही गयी। केंद्रीय सरकार और राम भक्तों को जगाने के लिए हिन्दू कट्टरवादी संगठनों ने अयोध्या में विराट धर्म सभा का आयोजन किया और साथ ही ये भी चेतावनी दी कि अगर राम मंदिर निर्माण में कोई भी अड़चन आई तो एक बार फिर 1992 जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।

यहाँ सवाल ये उठता है कि क्या हर बार की तरह इस बार भी राम मंदिर निर्माण सिर्फ चुनावी प्रचार और वोट बैंक बन कर ही रह जायेगा या फिर राम मंदिर का निर्माण होगा?

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