देश के मदरसे उर्दू छोड़ हिंदी माध्यम और देवनागरी लिपि को अपनाएं

इमामुद्दीन अलीग

Asia Times Desk

इस वक़्त उर्दू का झंडा अहले मदारिस के हाथों में है और उन्हीं के कंधों पर दीन की दावत व तब्लीग़ की ज़िम्मेदारी भी है… यह दोनों काम एक साथ दो नाव में सवारी के जैसा है .

हिंदी बेल्ट में उलमा का अमल-दखल कितना है ये सभी बखूबी जानते हैं। हिंदी भाषी हिंदू भाइयों को छोड़ दें, हिंदी भाषी मुसलमानों के बीच भी उलमा के रवाबित ठप हैं

इसकी सब से बड़ी वजह भाषाई रुकावट है.

अहले मदारिस ने खुद को उर्दू के खोल में बंद करके और उसकी की बाध्यता को खुद पर थोप कर बड़ी ग़लती की है… इसी का नतीजा है कि उर्दू के साथ साथ उलमा का दायरा भी दिन बदिन सिकुड़ता जा रहा है जबकि इसके उलट मुसलमानों की अक्सरियत उर्दू को छोड़ हिंदी में मुंतकिल हो चुकी है.

इस वक़्त अक्सर मुसलमान फ़ारसी लिपि के बजाए देवनागरी लिपि में ही पढ़ते और समझते हैं

 हिन्दू भाई तो पहले से ही माजमूई तौर पर हिंदी में शिफ्ट हो चुके हैं यही वजह है कि उलमा और अहले मदारिस समाज से मुकम्मल तौर पर कट चुके हैं… जिसकी वजह से दीन की दावत का काम भी काफी हद तक मुतास्सिर हो रहा है.

ज़रुरत इस बात की है कि मुल्क के मदारिस उर्दू माध्यम और फ़ारसी लिपि को छोड़ हिंदी माध्यम और देवनागरी लिपि को अपनाएं और इसी में तालीम व तदरीस की सरगर्मियां अंजाम दें

. यह एक कारगर तरीका हो सकता है जिससे अहले मदारिस अपने पैग़ाम के साथ मेन स्ट्रीम से जुड़ सकते हैं और अपने खिलाफ तैयार हो रहे माहौल में भेद लगा सकते हैं. हालाँकि सेलेबस और टीचिंग मैथड समेत दीगर पहलुओं पर भी कई तब्दीलियों की ज़रुरत है। 


ये इंतिहाई हैरत की बात है हिंदी के इतनी बड़ी भाषा होने के बावजूद हिंदी मीडियम का एक भी बड़ा मदरसा मौजूद नहीं है जबकि आपको बंगाली, मलयाली और दीगर इलाकाई भाषाओँ में कई मदरसे मिल जायेंगे।

ये हैरत और अफ़सोस की बात है कि दावत व तब्लीग़ की ज़िम्मेदारी उठाने वाले उलमा की तवज्जो हिंदी की तरफ क्यों नहीं जा रही है? बहरहाल उलमा और मदारिस को उर्दू और फ़ारसी लिपि के खोल से निकल कर इस दिशा में पहल करने की ज़रुरत है यकीन मानें कि अगर बड़े पैमाने पर इस सिम्त में काम किया जाये तो इसके ग़ैर मुतवक़्के नताइज बरामद होंगे।

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