6 राज्यों के 11 शहरों में अस्पतालों का हाल / बीकानेर में साल में सबसे ज्यादा 1681 बच्चों की मौत

राजकोट/रांची/जयपुर/लखनऊ/भोपाल. कोटा में एक महीने के भीतर 110 बच्चों की मौत ने पूरे देश को चौंका दिया है। यहां मौतों की वजह लापरवाही और संसाधनों की कमी है। एक महीने की बात करें तो गुजरात के राजकोट के सरकारी अस्पताल में 111, राजस्थान के कोटा में 110, जोधपुर में 146 और बीकानेर के अस्पताल में 162 बच्चों ने दम तोड़ा। बीकानेर में एक साल में 1681 और झारखंड की राजधानी रांची के रिम्स में 1150 बच्चों की मौत हुई। लखनऊ के केजीएमयू में पिछले साल 654 बच्चों की जान गई, यहां डॉक्टरों के 50% पद खाली हैं। भास्कर ने 6 राज्यों के 11 शहरों के बड़े सरकारी अस्पतालों की पड़ताल की तो पता चला कि डॉक्टरों, संसाधनों की कमी के अलावा लापरवाही नवजातों की जिंदगी के लिए काल बन रही है। एक साल के भीतर इन 11 अस्पतालों में 9336 बच्चों की जान गई।

1. राजस्थान
कोटा: जेके लोन में 36 दिन में 110 बच्चों की जान गई
संभाग के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल जेके लोन में दिसंबर से अब तक 110 नवजात की मौत हो चुकी है। अस्पताल में स्टाफ, बेड और चिकित्सा सुविधाएं नाकाफी हैं। शनिवार को कोटा पहुंचे तो अपनी ही सरकार पर बरसे। उन्होंने कहा कि इतने बच्चों की मौत गंभीर मामला है, इसके लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी। 2019 में यहां 963 बच्चों की जान गई।

वजह: केंद्र की जांच समिति ने लापरवाही को अस्पताल में मासूमों की मौत के लिए बड़ा कारण माना है। इसके अलावा चिकित्सा संसाधनों की कमी है। 

जोधपुर: सीएम के गृहनगर में सालभर में 754 बच्चों की जान गई
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृहनगर जोधपुर में बेहतर इलाज और सुविधाएं नहीं मिलने से डॉ. सम्पूर्णानंद मेडिकल कॉलेज में महीनेभर में 146 बच्चे दम तोड़ चुके हैं। इसमें से 102 नवजात थे। मेडिकल कॉलेज के अधिकारी इसे सामान्य बता रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री शनिवार को बच्चों के मरने के सवाल को अनसुना कर निकल गए। जोधपुर मेडिकल कॉलेज एमडीएम और उम्मेद अस्पताल में शिशु रोग विभाग का संचालन करता है। यहां 5 जिलों- जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर, सिरोही और पाली से मरीज आते हैं। 2019 में शिशु रोग विभाग में कुल 47815 बच्चे भर्ती हुए, जिनमें से 754 की मौत हुई।

बीकानेर: 1 महीने में 162 और साल में 1681 बच्चों की मौत
बीकानेर के पीबीएम शिशु अस्पताल में दिसंबर के 31 दिनों में 162 बच्चों की मौत हो गई यानी हर दिन पांच से ज्यादा बच्चों की मौत हो रही है। दिसंबर में यहां जन्मे और बाहर से आए 2219 बच्चे अस्पताल में भर्ती हुए थे। इन्हीं में से 162 यानी 7.3% बच्चों की मौत हो गई। पूरे साल की बात करें तो जनवरी से दिसंबर तक यहां कुल 1681 बच्चों की मौत हो चुकी है।

जयपुर: सरकारी अस्पताल में साल में 1630 मासूमों की जान गई

यहां के जेके लोन अस्पताल में 2019 में 56 हजार बच्चों को भर्ती किया गया। इसमें 1630 बच्चों की मौत हो गई। अस्पताल में दम तोड़ चुके वेंटीलेटर, खराब वार्मर, इंफ्यूजन पंप के साथ पर्याप्त संख्या में स्टाफ नहीं होने से नौनिहालों की मौत को रोक पाना मुश्किल हो रहा है। दूसरी तरफ डॉक्टर बताते हैं कि जेके लोन जयपुर के हॉस्पिटल में प्रदेशभर से रेफर किए हुए बच्चे पहुंचते हैं। ऐसे में उनकी स्थिति बेहद नाजुक होती है।

2. गुजरात
राजकोट: सिविल अस्पताल में दिसंबर में 386 बच्चे भर्ती हुए, 111 की मौत हुई
सिविल अस्पताल में 111 बच्चों में से 96 प्री-मैच्योर डिलीवरी से हुए थे और कम वजन वाले थे। इनमें से 77 का वजन तो डेढ़ किलो से भी कम था। चिकित्सा अधीक्षक ने कहा कि बच्चों के अस्पताल में एक एनआईसीयू है, लेकिन इसमें डेढ़ किलो वजन वाले बच्चों को बचाने की क्षमता और सुविधा नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक, अस्पताल में 2018 में भर्ती 4321 बच्चों में से 20.8 प्रतिशत यानी 869 की मौत हो गई। 2019 में, 4701 बच्चे भर्ती हुए और नवंबर तक 18.9% यानी 881 बच्चों की मौत हुई। हालांकि, दिसंबर महीने में भर्ती हुए 386 में से 111 बच्चे बचाए नहीं जा सके। साल में कुल 1000 बच्चों की जान गई।

वजह: डॉक्टरों के मुताबिक, गांव क्षेत्र में कई बच्चों का जन्म घर पर होता है। ऐसे में जब तक बच्चों को अस्पताल लाया जाता है, तब तक उनकी हालत बहुत बिगड़ चुकी होती है।

एनआईसीयू में 2 बच्चों पर 1 नर्स की जरूरत, सिविल अस्पताल में में 10 के लिए एक नर्स
एनआईसीयू में विशेष नर्सिंग देखभाल, तापमान नियंत्रण, संक्रमण मुक्त हवा की विशेष जरूरत होती होती है। बच्चा अगर कम वजन का है, तो उसके लिए कम से कम एक नर्स और अधिकतम दो नर्स मौजूद होनी चाहिए। हालांकि, राजकोट सिविल अस्पताल में 10 नवजातों के लिए केवल एक नर्स है।

अहमदाबाद: 30 दिन में 85 मासूमों की मौत
अहमदाबाद सिविल अस्पताल में भी दिसंबर में 85 मौत हुई हैं। यहां 455 नवजात बच्चों को भर्ती कराया गया था। अस्पताल के अधीक्षक जीएस राठौड़ ने बताया कि 265 बच्चों को दूसरे अस्पतालों से रेफर होकर यहां लाए गए थे। राठौड़ ने दावा किया कि दिसंबर 2018 की तुलना में बच्चों की मौतों में 6 फीसदी की कमी आई है। 

3. झारखंड
रांची: राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में बच्चों की स्थिति नाजुक

रांची स्थित रिम्स से मिले आंकड़ों के अनुसार, 2019 में जनवरी से लेकर दिसंबर तक यहां भर्ती होने वाले 1150 बच्चों की मौत हुई। संसाधनों की कमी, मरीजों की बढ़ती संख्या के चलते यहां 1 वॉर्मर पर 2-3 बीमार नवजातों को रखा जाता है। वार्मर और फोटोथैरेपी मशीन की कमी इतनी की एक-एक वार्मर पर दो से तीन बीमार नवजात को रखा जाता है, जिससे इनके आपस में ही संक्रमण का खतरा बना रहता है। रिम्स के 16 बेड वाले शिशु रोग आईसीयू में हर दो बीमार बच्चे पर एक नर्स की जरूरत होती है पर यहां 16 बेड के लिए 24 घंटे के लिए सिर्फ 9 नर्स हैं।

वजह: शिशु रोग विभाग के डॉ. एके चौधरी ने बताया कि गंभीर रूप से बीमार बच्चों को देर से रिम्स पहुंचने के चलते उनकी तबीयत बिगड़ जाती है। जिस पर सुधार कर पाना कई बार मुश्किल होता है।  

हेमंत सोरेन ने ट्वीट की भास्कर की खबर
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दैनिक भास्कर की खबर के साथ ट्वीट में कहा ‘झारखंड की यह स्थिति बदलेगी।'

अत्यंत दुःखद!
झारखण्ड की यह स्थिति बदलेगी।

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4. मध्य प्रदेश

भोपाल: हमीदिया अस्पताल में एक साल में 800 बच्चों की मौत
बच्चों की मौत के मामले में प्रदेश की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। हमीदिया अस्पताल में शिशु रोग विभाग की अध्यक्ष डॉ. ज्योत्सना श्रीवास्तव ने बताया कि यहां हर साल 4 हजार से ज्यादा नवजात भर्ती होते हैं। इनमें 800 से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है। यहां इतनी डेथ नॉर्मल हैं। एसएनसीयू में बेड ऑक्यूपेंसी 150 फीसदी से ज्यादा होती है। कभी-कभी एक ही वार्मर पर दो बच्चों को भी लिटाना पड़ता है। वहीं, भोपाल के ही जेपी अस्पताल में नवंबर-दिसंबर में एसएनसीयू में 200 बच्चे भर्ती हुए, इनमें से 22 नवजात की मौत हो गई। जेपी हॉस्पिटल में पिछले साल भर्ती हुए 1246 बच्चों में से 120 से ज्यादा ने दम तोड़ दिया।

वजह: हमीदिया शिशु रोग विभाग की अध्यक्ष डॉ. ज्योत्सना श्रीवास्तव ने बताया कि नवजात के मौत की सबसे बड़ी वजह- रेस्पिरेटरी डिस्टर्बेंस सिंड्रोम (आरडीएस) और प्री-मिच्योर डिलिवरी (पीएमडी) होती है। 

इंदौर: 2017-18 के 4 महीने में 146 बच्चों की मौत
प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एमवाय में अव्यवस्थाओं और पर्याप्त संसाधनों के आभाव में औसतन 40 बच्चों की मौत हर महीने हो रही है। यहां नवंबर 2017 में शॉर्ट सर्किट से अस्पताल के एसएनसीयू में आग लगी थी। जिससे वहां लगे कई संसाधन जल गए थे। संसाधनों के आभाव में वर्तमान में यहां एक मशीन (वॉर्मर) पर दो से तीन बच्चों का एक साथ इलाज किया जा रहा है। आग लगने से पहले जुलाई 2017 से अक्टूबर 2017 तक यहां 878 बच्चों को भर्ती किया गया था। इसमें 16.6% यानी 146 बच्चों की मौत हो गई। वहीं, आग लगने के बाद दिसंबर 2017 से मार्च 2018 तक 724 नवजातों को भर्ती किया गया था। इसमें 163 बच्चों ने दम तोड़ दिया। जो भर्ती किए गए बच्चों की संख्या का 22.51% है। एमवाय अस्पताल में 2019 में बच्चों के एडमिट होने और मौत के आंकड़े नहीं मिल पाए।

5. उत्तर प्रदेश 

लखनऊ: केजीएमयू में एक साल में 650 बच्चों की मौत
लखनऊ के सबसे बड़े हॉस्पिटल में शामिल केजीएमयू के बाल रोग विभाग के डॉक्टर सिद्धार्थ कुंवर भटनागर ने बताया कि साल 2019 में 4015 बच्चे भर्ती हुए थे। इनमें 650 बच्चों की मौत हुई थी। यहां उत्तर प्रदेश के अलावा नेपाल से भी बच्चों को इलाज के लिए लाया जाता है। हॉस्पिटल में 315 बच्चों को भर्ती करने की व्यवस्था है।

वजह: केजीएमयू के बाल विभाग में डॉक्टरों के 50% पद खाली हैं। मौजूदा समय में 10 कंसल्टेंट डॉक्टर हैं, लेकिन जरूरत 20 की है।

6. महाराष्ट्र

पुणे: ससून हॉस्पिटल में सालभर में 208 बच्चों ने दम तोड़ा
ससून हॉस्पिटल में भी बच्चों की मौत का आंकड़ा चिंताजनक है। यहां 2019 में 5 साल की उम्र तक के 2219 बच्चों को भर्ती किया गया। इसमें 208 बच्चों की मौत हो गई।

वजह: डॉक्टर बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों से यहां आने वाले ज्यादातर बच्चे बेहद क्रिटिकल होते हैं। यहीं कारण है कि मौत का आंकड़ा ज्यादा है।

साभार : भास्कर 

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