इमरान के न्यू पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार-बेरोजगारी

इस्लामाबाद से सैयद मसरूर शाह

Ashraf Ali Bastavi

इस्लामाबाद से सैयद मसरूर शाह. पाकिस्तान के आम चुनाव में अब तक घोषित हुए नतीजों में इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। थोड़ी सी बाहरी मदद के बाद पीटीआई चीफ का प्रधानमंत्री बनना तय है। लेकिन, यहां से इमरान की राह आसान नहीं होगी। जिस ‘नए पाकिस्तान’ का वादा इमरान ने अवाम से किया है, उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कमजोर अर्थव्यवस्था है। जहां तक बात भारत से रिश्तों और कश्मीर मसले की है, तो इसमें इमरान का नजरिया ज्यादा मायने नहीं रखता है। क्योंकि, इस पर पॉलिसी सेना ही तय करेगी।

मुश्किलें बस इतनी ही नहीं हैं। नवाज शरीफ भले ही जेल में बंद हैं, लेकिन उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) दूसरे नंबर और पहली बार चुनाव लड़ रहे शहबाज भुट्‌टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) तीसरे नंबर पर है। सदन में विपक्ष भी कमतर नहीं होगा और चुनौतियां पेश करेगा।

नतीजों ने राजनीतिक गणित बदला : इमरान 22 साल से पाकिस्तान की सियासत में हैं और वजीर-ए-आजम बनना चाहते थे। शुरुआत में तो लोग उनकी खिल्ली उड़ाते थे। यहां तक कि उनकी बातों को सुना भी नहीं जाता था। लेकिन, 2018 के आम चुनाव के नतीजों ने पाकिस्तान के राजनीतिक गणित को पूरी तरह बदल दिया। इसमें 30 साल पुरानी राजनीतिक ताकतें कराची की मुताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) अचानक कमजोर नजर आ रही हैं। ऐसा लगता है यह पाकिस्तानी राजनीति का नया युग है।

इमरान को अपनी ही रणनीति का सामना करना पड़ेगा : जिन मुद्दों पर इमरान ने पुरानी सरकार को अब तक घेरा था, अब उन्हीं मुद्दों पर विपक्ष को जवाब देना पड़ सकता है। 2013 में चुनाव के बाद वे लगातार कहते रहे, चुनाव में धांधली हुई। मेरे साथ ज्यादती हुई। इसे लेकर उन्होंने धरने दिए। भ्रष्टाचार, बेरोजागारी पर उन्होंने कई बार प्रदर्शन किए। चुनाव में धांधली और ज्यादती की बात पीएमएल-एन अभी से कह रही है। बाकी मुद्दों पर भी विपक्ष एक हो गया तो इमरान के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है। अर्थव्यवस्था उनके लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकती है। टेरर फाइनेंस की ग्रे लिस्ट में पाकिस्तान का नाम शुमार हो चुका है। अगर हालात नहीं सुधरे तो वह ब्लैक लिस्टेड भी हो सकता है। युवाओं से किए गए वादे इमरान के लिए तीसरी चुनौती हैं। उनकी जीत में ऐसा तबका काफी बड़ा है, जिसने पहली बार वोट डाला। वे भ्रष्टाचार खत्म करने के इमरान के वादे पर घरों से बाहर निकले थे।

भारत को लेकर रुख से कोई फर्क नहीं: इमरान भारत को लेकर सकारात्मक रहें या नकारात्मक, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पाकिस्तान में तीन बार प्रधानमंत्री बन चुके नवाज शरीफ हमेशा भारत से अच्छे रिश्तों की बात करते थे। जब भी उन्होंने भारत से बात करने की कोशिश की, उन्हें हटा दिया गया। इस बार चुनाव में भी ‘भारत का दोस्त’ कहकर शरीफ पर निशाना साधा गया। इस मुद्दे पर काफी हद तक पाकिस्तानी आर्मी की राय चलती है। अगर इमरान उसके खिलाफ जाते हैं तो उन्हें मुश्किल हो सकती है।

तगड़े विरोधियों से रहना होगा सावधान: यह बिलावल का पहला चुनाव था। लोगों का अनुमान था, उनमें बेनजीर जैसा जादू नहीं है। लेकिन, उनकी पार्टी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। सिंध प्रांत में अपना दबदबा कायम रखा। आम चुनाव में 2013 की 31 सीटों के मुकाबले 2018 में 42 सीटों पर जीत दर्ज की। वे युवा हैं और उनके बोलने का तरीका पाकिस्तानी मिजाज से एकदम इतर.. शालीन है। अगर इमरान सफल नहीं होते हैं तो यूथ की नजर उन पर टिक सकती है। वहीं, शरीफ खानदान की सियासत को भी अभी खत्म नहीं माना जा सकता है। उनकी पार्टी काफी सीटें हारी है, लेकिन काफी जीती भी है। ऐसे में वे मजबूत विपक्ष बनकर इमरान को टक्कर जरूर देंगे।

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