फासीवाद के विरुध मुसलमानों का व्यर्थ संघर्ष

इमामुद्दीन अलीग

Asia Times Desk

ये सत्य है कि देश की बहुसंख्यक आबादी की नज़र में धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता की लड़ाई कोई खास महत्त्व नहीं रखती है। बल्कि, हक़ीक़त यह है कि बहुसंख्यक जब-जब कांग्रेस से उकताते हैं तो वे भाजपा को ले आते हैं और लाते रहेंगे और दोनों पर्टियों को बदल-बदल कर आज़माते रहेंगे।
बहुसंख्यक आबादी न तो कभी भाजपा को खत्म होने देगी और न ही कभी उससे पूर्ण रुप से अपना नाता तोड़ेगी।
अभी के हालात तो यही बता रहे हैं कि दोनों पार्टियों की अदला-बदली का ये खेल लंबा चलेगा और इस क्रम में मुसलमान, इस पाले से उस पाले में सिवाए उछल-कूद के कुछ नहीं कर पाएंगे।
क्योंकि गिनती के इस खेल लोकतंत्र में 15 प्रतिशत मुसलमान 80% हिंदुओं के फैसले को कभी प्रभावित नहीं कर सकते हैं। दो मुसीबतों में से कमतर मुसीबत (अह्वनुल बलिय्यतैन) और दो मुसीबतों में से बड़ी मुसीबत (अस्वउल बलिय्यतैन) की रट लगाने वाले मुसलमानों को समझना होगा कि उनके भाजपा और आरएसएस विरोधी प्रयासों से कभी कुछ नहीं बदलेगा और न ही उन्हें कुछ हासिल होगा, सिवाए बहुसंख्यक आबादी के फैसलों के बीच में फुटबॉल की तरह व्यर्थ उछल-कूद के और दूसरों के खेल में खिलौना बनने के।
मान लेते हैं कि यदि आगे चल कर भाजपा कभी हिंदू राष्ट्र को लागू करना चाहे और यहां के बहुसंख्यक हिंदू भी उसके लिए तय्यार हो जाएं, तो मुसलमान क्या कर पाएंगे? मेरे ख्याल से कुछ भी नहीं। हालांकि, भौगोलिक विवादों, अलगाववाद के झगड़ों, आबादी की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता और वैचारिक मतभेदों के संदर्भ में ये बात पूर्ण विश्वास के साथ कही जा सकती है कि भाजपा न कभी देश को हिन्दू राष्ट्र बना पाएगी और न ही कभी देश की जनता उसे स्वीकार्य करेगी।
यदि हिन्दू राष्ट्र की कथित योजना को लागू भी कर दिया जाता है… तो विविधता के इस देश को किसी एक धर्म का राज\राष्ट्र बनाने का प्रयास कभी सफल नहीं हो पाएगा। वैसे अगर भजपा अगर हिंदू राष्ट्र के मंसूबे को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध होती, तो वह अध्यादेश के माध्यम से आंशिक रुप से ही सही, इसका परीक्षण करने की कोशिश जरूर करती जिस तरह उन्होंने हाल ही में कई फैसलों को अध्यादेश के माध्यम से लागू किया है।
ये बात तो तय है कि अगर कभी भाजपा और देश की बहुसंख्यक आबादी ने हिन्दू राष्ट्र की योजना पर अमलदरामद करने की ठान लिया तो, मुसलमान इस संबंध में कुछ भी नहीं कर पाएंगे, क्योंकि वो कुछ करने की हालत में हैं ही नहीं।
बेहतर यही होगा कि मुसलमान इस अनावश्यक भय और व्यर्थ संघर्ष को छोड़, भाजपा की टांग खींचने और उसे हराने की राजनीति छोड़, अपना भविष्य बनाने और हिस्सेदारी पाने के लिए राजनीति करें। यदि हम राजनीतिक रूप से मजबूत होंगे हैं तो कभी ऐसी स्थितियों का सामना होने पर शायद कुछ प्रभाव डाल सकें।
भारत के मुसलमान रोहंगिया की तरह 8-10 लाख नहीं बल्कि 20-25 करोड़ की विशाल जनसंख्या में हैं। इतनी बड़ी जनसंख्या को न तो कोई ताकत खत्म कर सकती है, न मुल्कबद्र कर सकती है, और न ही देश के मुसलमान कभी भाजपा को खत्म कर सकते हैं, खत्म कर पाना तो दूर की बात है, अल्पसंख्यक उसकी हार-जीत को भी तय नहीं कर सकते। यहाँ मुसलमान भी हमेशा रहेंगे और यहाँ की बहुसंख्यक आबादी भाजपा को भी हमेशा बाक़ी रखेगी।
इसलिए, मुसलमानों को चाहिए कि इस अनावश्यक डर और भाजपा जैसी पार्टियों को हराने के व्यर्थ प्रयासों को दीवार पर दे मारें और अपनी जीत-हार, अपने राजनीतिक भविष्य के निर्माण लिए राजनीति की रचनात्मक पारी की शुरूआत करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *