कांग्रेस और बीजेपी तो एक दुसरे को रिप्लेस करती रहेंगी लेकिन देश के मुसलमानों का क्या होगा? 

इमामुद्दीन अलीग

Asia Times Desk

आरएसएस, अम्बानी, रामदेव, की तरफ से मिल रहे संकेत, एनडीए पार्टियों की छटपटाहट, मोदी एंड कंपनी का टूटा हुआ मनोबल… यह सब स्पष्ट इशारा है कि 2019 में कांग्रेस की वापसी तक़रीबन तय है। हाल ही की कई घटनाओं से लगा कि आरएसएस और अम्बानी ने मोदी से अपना हाथ खींच लिया है या वो खुद को मोदी अलग करने लगे हैं। अगर ऐसा है तो यह नरेंद्र मोदी की हार के सर्टिफिकेट से कम नहीं है। बाक़ी रामदेव का गिरगिट की तरह रंग बदलना भी अपने आप में एक दलील है… नितिन गडकरी के हालिया बयान को भी कम नहीं आंका जा सकता जो आरएसएस चीफ मोहन भागवत के अत्यंत करीबी माने जाते हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि ये आरएसएस की कोई बड़ी कूटनीतिक चाल हो सकती है कि अब वो गडकरी के चेहरे को आगे करके नया समीकरण बनाना चाहती हो या फिर उनके नाम पर आगामी लोकसभा चुनाव लड़ना चाहती हो। हालाँकि इस बात में कोई वज़न नहीं नज़र आ रहा है।

वजह यह है कि गडकरी का कोई ऐसा पब्लिक फिगर नहीं है या वो ऐसे नेता नहीं हैं जो मोदी के मुक़ाबिले खड़े किये जा सकें और उनको रिप्लेस कर सकें। दूसरी संभावना यह ज़ाहिर की जा रही है कि आरएसएस राहुल की तारीफ करके यह सन्देश देना चाहती है कि इनके पीछे भी आरएसएस का समर्थन है। इस बात में भी कोई दम नहीं है.

इस समय आरएसएस राहुल का समर्थन करके उनकी छवि पर कोई ख़ास असर नहीं डाल सकती, लोग इसे आरएसएस का छलावा या संभावित समीकरण के लिए सेटलमेंट की स्ट्रेटेजी ही मानेंगे और असल बात तो यही लग रही है कि ‘मोदी नाव’ के डूबने की आशंका के मद्दे नज़र सारे चूहे उससे छलांग लगा रहे हैं और 2019 के चुनाव के बाद की संभावित परिस्थितयों के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं.

साफ़ साफ़ कहा जाए तो ये लोग 2019 में बनने जा रही नई सरकार से सेटलमेंट की कोशिश में हैं। लेकिन अहम सवाल यह है कि चेहरे तो बदलते रहेंगे… कांग्रेस और बीजेपी तो एक दुसरे को रिप्लेस करती रहेंगी लेकिन देश के मुसलमानों का क्या होगा?

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