अगर हम सब मिलकर ऐसा करने में कामयाब रहे

मुहम्मद अहमद

Ashraf Ali Bastavi

सियासी पार्टी, अपना कायद, सेक्युलर, कई दिनों से ये बहस मेरे सामने से गुज़र रही है बहुत अच्छी अच्छी बातें लोगों के ज़रिये सामने आई है राय मुख़्तलिफ़ हो सकती है मगर ये बात वाज़ेह है कि सभी लोग इस बात पर एक हैं कि क़ौम का सियासी वजूद किस तरह कायम रहे “अल्पसंख्यकों की बढ़ती सियासी बेवज़्नी ज़िम्मेदार कौन “”आप सभी जानते हैं कि 1947 में मुल्क की आज़ादी के तुरंत बाद मुल्क के अंदर जो सियासी हालात पैदा हुए, उससे यहाँ के हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सभी मुतास्सिर हुए।

उस समय पूरा मुल्क खास तौर पर सरहदी इलाके लहू लुहान थे, एक अस्थाई सरकार काम कर रही थी और 1952 में पहला इलेक्शन हुआ नेहरू जी के नेतृत्व में पहली सीधे जनता से चुनी हुई सरकार आई, हम सब को जानना चाहिए कि पहले चुनाव का मुद्दा था देश सेक्युलर रहेगा या हिन्दू राष्ट्र, ज़ाहिर है अवाम ने नेहरू की क़यादत कबूल कर भारी बहुमत से कांग्रेस और कम्युनिस्टों को जिताया, उस वक्त भी हिदुइज़्म के समर्थक हिन्दू महासभा वग़ैरह के नेतृत्व में चुनाव में थे, ,मगर पाकिस्तान बनने और देश में अफरा तफरी का माहौल होने के बाद भी देश की जनता द्वारा नकार दिए गए।सेक्युलरिज़्म पर देश की महान जनता की ये पहली मुहर थी उस वक्त भी आज ही की तरह बहुसंख्यक के रूप में हमारा हिन्दू समाज ही था.

मुल्क में चुनाव होते रहे सरकारें बनती और बिगड़ती रही देश तब से अब तक कई एक उतार चढ़ाव देख चुका है अब ज़रा ग़ौर करिये की देश के हालात 70-साल में कैसे इतना बदल गये कि सरे आम नफ़रत का ज़हर उगलने वाले लोग यका एक देश की सियासी ताक़त पर काबिज़ होते चले गए।यहाँ एक बात क़ाबिले ग़ौर है कि मुल्क का मुसलमान हमेशा सेक्युलर हिन्दू नेताओं को ही अहमियत देता रहा है कभी कांग्रेस के रूप में तो कभी छेत्रीय दल के नेताओं के रूप में, इस दौरान एक खास ज़हनियत के लोगों ने देख लिया की सेक्युलर सेक्युलर खेलने से अच्छा है कि कम्युनल कम्युनल खेला जाय और वो खेलने लगे.

मगर मैं कह सकता हूँ कि हिन्दू समाज की बड़ी आबादी हमेशा सेक्युलर लोगों के साथ ही खड़ी रही, इसके पीछे अल्पसंख्यक समुदाय का भी रोल था वो ये कि वो हमेशा सेक्युलर हिन्दू नेताओं के साथ ही रहे, और वो भी बिना किसी शर्त के या यूँ कह लें कि सेक्युलरिज़्म की बक़ा के लिए।

मैं समझता हूँ की 1950 से1980के दशक तक एक से बढ़ कर एक मुस्लिम सियासी रहनुमा, दानिश्वर, उलेमा, बा हयात रहे मगर कुछ एक स्टेट को छोड़ कर कही भी अलग सियासी महाज़ के लिए कोई बात नहीं की ज़ाहिर है इसकी कोई तो वजह होगी.

बावजूद इसके कम्युनल कम्युनल खेलने वाले सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय विशेषकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ बोलकर इस हालत में आ गए की मुसलमानों को सियासी तौर पर अछूत साबित करने में लग,गए धीरे धीरे हालात ये हो रहे हैं कि तमाम सियासी पार्टियों का फोकस इस समाज से हट रहा है, और हम हैं कि बगैर ये जाने समझे की हमारे ज़रिये अपनी हुकूमत, अपनी सियासत, अपनी क़यादत का नारा लगाने का नतीजा क्या होगा, नारा लगाते चले जा रहे हैं

जबकि होना ये चाहिए कि हम कम्युनल कम्युनल खेलने वालों के चैलेंज को कबूल करें और तै करें की हमारी भाषा, हमारी कारकर्दगी, हमारा अख़लाक़, हमारे किरदार से अगर हमारे किसी मिल्ली भाई को कोई तकलीफ है तो हम उसे दूर करते हुए उन्हें अपने नज़दीक लाएं और नफ़रत की शिद्दत तक पहुँच चुके लोगों को छोड़ कर ,बाकी सब को गले लगाकर 1952 के सेक्युलर हिंदुस्तान की तरफ ले चलें, अपने बीच तालीम को फ़रोग़ दें, बेरोज़गारों को रोज़गार दिलाने में मदद करेंगे, कमज़ोर मिल्ली भाइयों के साथ कदम से क़दम मिलाकर चलेंगे, किसी मामले को हिन्दू मुसलमान के नज़रिए से नहीं बल्कि ज़ुल्म और इंसाफ के नज़रिए से देखेंगे, हर कीमत पर नफ़रत की सियासत करने वालों के हाथ से इस मुल्क को बाहर लाएंगे, चाहे इसके लिए कितनी बड़ी क़ुरबानी क्यों न देनी पड़े.

नफरत की सियासत करने वालों के अलावा हर किसी का गर्मजोशी से इस्तक़बाल करेंगे,।ग़रीब, कमज़ोर, मज़लूम, बेसहारा, बेवतन चाहे वो किसी भी मज़हब का क्यों न हो आगे बढ़ कर उसकी मदद करेंगे।

अगर हम सब मिलकर ऐसा करने में कामयाब रहे तो मुझे अल्लाह की ज़ात पर यक़ीन है कि आप को कोई हरा नहीं सकता, आख़िर में आप ही ग़ालिब हो कर रहेंगे।इंशा अल्लाह।

लेखक : उत्तर परदेश संत कबीर नगर में सरगर्म राजनैतिक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं , और  संत कबीर नगर  में जिला पंचायत सदस्य हैं 

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