26/09/2017


देश के सरकारी अस्पतालों की स्थिति

अब्दुल हफीज मोहम्मद हुसैन
 
अगर देश के सरकारी अस्पतालों की बात की जाए तो उनकी हालत बेहद न गुफ्ता बे है, सरकारी अस्पताल के डॉक्टर हों  या प्राइवेट क्लिनिक चलाने वाले बिजनेसमैन दोनों ही मानवता की सेवा के बजाय पैसे बनाने के चक्कर में रहते हैं। किसी भी सरकारी अस्पताल में जाएं तो आपको अनुमान होगा कि स्थिति कैसी है,  अगर किसी सरकारी अस्पताल में सुविधा है तो इससे मरीजों को लाभ नहीं पहुंच पाता, सरकारी अस्पताल में मामूली परीक्षण "जिस की सुविधा मौजूद है "भी नहीं हो पाता,
इसकी वजह यह है कि सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों हज़रात ने अपनी प्राइवेट क्लिनिक खोला हुई हैं, सरकारी अस्पताल में आए मरीजों को सलाह दी जाती है कि यहां सुविधाएं नहीं हैं फलां अस्पताल में जाएं वहाँ बेहतर इलाज मिलेगा, और प्राइवेट अस्पताल में गरीब मरीजों की चमड़ी उधेड़ी जाती है।
शुक्रवार की रात गोरखपुर में हुए हादसे ने यह साबित कर दिया है कि देश के सरकारी अस्पतालों की स्थिति क्या है जहां प्रशासन की लापरवाही की वजह से बच्चों को ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं किए जाने पर 63 बच्चों की जान चली जाती है और इसकी जिम्मेदारी लेने के बजाय मुख्यमंत्री कहते हैं कि यह मौत गंदगी की वजह से हुई। इस अस्पताल के बारे में पीड़ित मरीजों का कहना है कि यहां एक नर्स मरीज दवा मंगाएगी
और दूसरी नर्स आकर उसे डांट लगाएगी  और दूसरी दवा मंगाएगी और इस तरह कई बार दवा मंगवाकर  अपने पास रख लेते हैं जिससे मरीजों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस तरह वहाँ जो बच्चे खराब हो जाते हैं उन्हें वहीं पर फेंक दिया जाता है, जिस से बहुत ज्यादा गंदगी होती है और कई बीमारियों की आशंका रहती है। कुछ मरीजों का कहना है कि रात में यहां का गेट खुला रहने के कारण कुत्ते बच्चों को उठा ले जाते हैं, जिस पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।
गोरखपुर में इस मेडिकल अस्पताल की लापरवाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां उपचार के दौरान डॉक्टर मरीज़ के किसी भी रिश्तेदार और परिवार को मिलने नहीं देते हैं और मरीज के मरने के बाद ही उन्हें खबर दी जाती है और दुर्भाग्य से इन अस्पतालों में मरीजों को जिस प्रकार की सुविधा प्रदान की जा रही हैं वह बिल्कुल घटिया हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर मरीजों से जानवरों जैसा व्यवहार करते हैं उनकी गफलतों की वजह से कई मजबूर आदमी इन सफ़ाक दरिंदों के सामने ही दम तोड़ देते हैं। मरीज को पूरी तरह से युवा डॉक्टरों या प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले डॉक्टरों के अनुभव के रहमोकरम पर छोड़ देना वरिष्ठ डॉक्टरों की आदत बन चुकी है। सफाई की घटिया व्यवस्था कीड़े की प्रजनन का कारण हैं जो रोगियों में अधिक बीमारियों को फैलाने की वजह बनते हैं। डॉक्टरों या अन्य मेडिकल स्टाफ की अनुपस्थिति कोई नई बात नहीं है, इससे पहले भी यह सामान्य बात रही है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र की स्थिति अत्यंत भ्रमित है प्राइवेट अस्पताल और क्लिनिक लूटपाट करने में जुटे रहतें  हैं, जबकि सरकारी अस्पताल प्रशासनिक समस्याओं से बजट उपयोग में भ्रष्टाचार करने तक की समस्याओं से ग्रस्त हैं, सिविल अस्पताल सरकारी सेक्टर का एक बड़ा अस्पताल है जिस पर हर साल बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च किया जाता है करोड़ों रुपये के बजट के बावजूद मरीजों को बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं ,दवाएं नहीं मिलती, स्ट्रेचर, बिस्तर और चादरें उपलब्ध नहीं हैं, वाशन रूम और वार्डज़ में सफाई का अभाव है
गंदगी हर जगह मौजूद है सभी रोगियों को टेस्ट और आपरेशन की सुविधा नहीं मिलती, सिविल अस्पताल जिसमें प्रतिदिन रोगियों की बड़ी संख्या इलाज और चिकित्सक के लिए आती है यह मरीज निजी अस्पताल महंगा होने की वजह से लागत वहन नहीं कर सकते इसलिए सिविल और अन्य सरकारी अस्पतालों का रुख करते हैं, यह अस्पताल करोड़ों रुपये के कोष रखने के बावजूद मरीजों को उचित इलाज नहीं कर सकते मेडिकल कंपनियां जो मार्केटिंग कंपनियां और माफिया बन चुकी हैं अपनी उत्पाद बेचने के लिए डॉक्टरों का उपयोग कर रही हैं डॉक्टर साहेबान रोगियों की जेब से पैसे निकालने के लिए भारी भर कम पर्चे लिख देते हैं। ऐसे में मौजूदा सरकार के लिए सख्त जरूरत है कि ऐसे अस्पतालों की कड़ी निगरानी करे और जो बजट अस्पतालों के लिए प्रदान किए जाते हैं उनका सही ढंग से इस्तेमाल हो ताकि मरीजों का बेहतर इलाज हो सके जहां सबसे अधिक गरीब रोगी होते हैं। मेरा उच्च अधिकारियों से  अनुरोध है कि सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था में सुधार के लिए आकस्मिक आधार पर कदम उठाए जाएं।
ग्राम पैकोलिया मुस्लिम, पोस्ट पैकोलया, जिला बस्ती,उत्तर प्रदेश
   

 





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