25/09/2017


मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील का बाबरी मस्जिद और तलाक़ के बीच समझौते का इशारा!

इमामुद्दीन अलीग

 

सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने जो बयान दिया वह अपने आप में बहुत आश्चर्यजनक और मुस्लिम पक्ष के लिए निहायत ही खतरनाक बयान कहा जा सकता है।

इस बयान में सिब्बल ने एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की है जैसा कि उन्हों कहा कि "जिस तरह राम का जन्मस्थान अयोध्या के लोगों की आस्था से जुड़ा मामला है, उसी तरह तीन तलाक भी आस्था से जुड़ा मामला है।" ब्राह्मण सिब्बल के बयान का साफ़ साफ़ मतलब ये है कि अदालत समझौता करते हुए मुसलमानों को तीन तलाक़ का अधिकार दे दे और बदले में हिन्दू पक्ष को बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने दे।

इस तरह से ब्राह्मण कपिल सिब्बल ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से पहले ही मान लिया कि राम अयोध्या में उसी विवादित स्थान पर जन्म लिए थे।

उनके अनुसार अगर मुसलमान तीन तलाक़ को आस्था का मामला बता कर उसमें हस्तक्षेप न करने की बात कर रहे हैं तो इसी तरह राम जन्म भूमि और राम मंदिर का मामला भी हिन्दुओं की आस्था का मामला है जिसमें हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। जबकि यह दोनों दो अलग अलग मामले हैं।

बाबरी मस्जिद /राम जन्म भूमि मामला दो पक्षों के बीच का विवादित मामला है। इस बात में कोई शक नहीं कि एक पक्ष का दावा विवादित स्थान पर मौजूद ऐतिहासिक बाबरी ढांचे के नाक़ाबिले इंकार सबूत पर आधारित है जबकि दुसरे पक्ष का दावा मात्र आस्था और कुछ अन्य विवादित सबूतोँ के आधार पर है।

वकील कपिल सिब्बल च्योंकि दुसरे पक्ष से ताल्लुक़ रखते हैं लेहाज़ा मौके का फायदा उठाते हुए वह अपनी आस्था को दर्शाने से नहीं चूके। जबकि बाबरी मस्जिद/राम जन्म भूमि मामले का ताल्लुक़ न तो हिन्दू पर्सनल लॉ से है और न ही मुस्लिम पर्सनल लॉ से।

इसके इलावा जबकि तलाक़ का मामला खालिस मुसलमानों का निजी मामला है, इससे हिन्दू या किसी और पक्ष का कोई लेना देना नहीं और न ही उन पर इसका कोई प्रभाव पड़ता है। कपिल सिब्बल का ब्यान दुर्भाग्यपूर्ण है और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को इस पर स्पष्टीकरण देते हुए तुरंत ही कपिल सिब्बल को हटा कर दूसरा वकील करना चाहिए।

रही बात तलाक़ के मुसलमानों का मज़हबी मामला होने की तो इसमें कोई शक की गुंजाइश ही नहीं है। क्योंकि निकाह और तलाक़ पर अमल ही वही करते हैं जो इस्लाम धर्म को मानते हैं।

जो धर्म को ही नहीं मानेगा वो धर्म के अनुसार निकाह और तलाक़ ही क्यों करेगा? ऐसे लोगों के लिए तो लिव-इन और कोर्ट मैरिज आदि दरवाज़े खुले हुए हैं। आखिर माननीय अदालत को इतनी सी बात क्यों नहीं समझ आती और वह क्यों किसी के निजी धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने के दर पे है !





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