25/09/2017


बेरोजगार है,मूर्ख नहीं

इरफान आलम

 

आज के भागम भाग ज़िन्दगी में शायद ही किसी के पास समय है, चाहे वह रोजगार व्यक्ति हो या बेरोजगार। लेकिन इतना तो निश्चित है कि सब लोग पैसा कमाने में व्यस्त है।

जो बेरोजगार है वह रोजगार की तलास में व्यस्त है तथा जिनके पास रोजगार है वे लोग पैसा कमाने में व्यस्त है। कुछ लोग तो ऐसे भी है जो न तो पैसा कमा रहे है और न हीं उनके पास रोजगार है। रोजगार हो भी कैसे रोजगार के लिए तो पैसे की जरूरत पड़ती है,जो है ही नहीं।फिर भी ज़िन्दगी चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है।

 
कुछ लोग तो अपनी ज़िन्दगी गुजारने के लिए छोटा मोटा रोजगार कर लेते है।भारत में ऐसे बेरोजगारो की कमी नहीं है जो अपनी ज़िन्दगी गुजारने के लिए कुछ न कुछ कर ही लेते है। दिल्ली के गलियो में या सड़को के किनारे सैकड़ो लोग ऐसे मिल जाते है जो अपना पेट पालने के लिए ठेले पर गोलगप्पे,चाउमीन,टिक्की चाट आदि कि दुकान लगा के घूम-घूम कर बेचते है। आज कल लोगो को इन ठेले वालो के पास जाकर कुछ खाना शायद अच्छा नहीं लगता है। लोगो को होटल में जाकर खाना कही ज्यादा पसंद आ रहा है

शायद कुछ लोगों को ठेले वालो से कुछ खाना अपने पर्सनाल्टी के हिसाब से अच्छा नहीं लगता है।अगर लोग ऐसे ही ठेले वालो के पास जाकर कुछ खाना छोड़ देंगे तो इन गरीब लोगों का क्या होगा जो अपनी ज़िन्दगी गुजारने के लिए इस ठेले के दुकान पर ही निर्भर है। ये लोग बेरोजगार जरूर है पर इतनी समझ तो इनके पास भी है कि ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अलग करते ही रहना चाहिए। इनलोगो ने भी अपने चलते फिरते दुकान को चलाने के लिए नए तरिके खोज लिए है। ये लोग पहले गलियो में चिल्लाते हुए घूमते थे,लेकिन अब ये ठेले वाले अपने साथ लाऊड स्पीकर लेके चलते है। गाने बजाते रहते है और गलियो के पास जाकर लोगो को आकर्षित करने के लिए लाऊड स्पीकर में चिल्ला कर लोगो को बुलाते है।

इनकी आवाज़ में इतना आकर्षण तो जरूर होता है कि लोगो को अपनी तरफ  आकर्षित कर ही लेते है। अगर लोग व्यस्तता के कारण घर से बाहर नहीं आ पाते है तो उनके घर के बच्चे उनको घर से बाहर आकर कुछ खरीदने के लिए मजबूर कर ही देते है।लोग अपने घरो से निकल कर गली में आकर देखते है कि कौन और क्यों आवाज़ लगा रहा है। जब लोग अपने घरो से  बाहर आते है तो कुछ न कुछ खरीद ही लेते है। इस तरह लोग इन ठेले वालो से कुछ खरीद कर खा लेते है और इनलोगो का अपना रोजगार भी चलता रहता है। इसे कहते है रोजगार वही सोच नई।





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