26/09/2017


रोहिंग्या के अल्पसंख्यक मुस्लमानों का क्या होगा

अवैस अहमद उस्मानी

आज कल दुनिया एक ऐसा हिस्से का नाम सामने आया है जिसके सामने फलिस्तीन के लोगो पर हो रहा जुलम भी कम नाराज़ आने लगा है| लोगों की बीच और सोशल मीडिया पर जम कर वहां पर हो रहे जुलम के बारे लोग अपनी राये रख रहे है| कोई उनके हक में बोल रहा है तो कोई उनको आतंकवादी तक बोल रहा है| वहां से रोज़ ऐसी ऐसी खबरे सुनने में आ रहा है जिसको सुन कर रोंगटे खड़े हो जा रहे है| इन सब में सब से अहम बात यह है कि वहां की राजनेता को शांति के लिए नोबल पुरस्कार भी मिल चूका है लेकिन तब भी उन्होंने इस मसले पर चुप्पी साध राखी है| उनके ही मुल्क में उसकी नाक के नीचे उनके ही देश की सेना रोहिंग्या के मुसलमानों पर अत्याचार की सारी सीमायें पार करती जा रही है|

 

रोहिंग्या मुस्लमान कौन हैं 


'रोहिंग्या' शब्द ऐतिहासिक तौर पर मुस्लिम अराकनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अभी भी एक मुस्लिम गांव है जिसे अब सित्तवे शहर के नाम से जानते हैं। रखाइन प्रांत में स्थित इस गांव का नाम रोहांग था, जिससे रोहिंग्या आए। आज यह शब्द विवाद की जड़ बन चुका है।
19वीं सदी में रोहिंग्या मुसलमान बर्मा में रहने लगे और तब से वे बंगालियों, पारसियों, मुग़लों, तुर्कों और पठानों में मिलते गए। 1948 में रोहिंग्या पर कई क़ानून लागू नहीं होते थे जैसे विदेशी एक्ट (इंडियन एक्ट 3, 1846) रजिस्ट्रेशन ऑफ़ फ़ॉरेनर्स एक्ट (बर्मा एक्ट 7, 1940) और रजिस्ट्रेशन ऑफ़ फ़ॉरेनर्स रूल्स 1948। ये क़ानून बर्मा की आज़ादी से पहले और बाद में आने वाले विदेशियों के रजिस्ट्रेशन के लिए थे।राष्ट्रीय कोटे के तहत बर्मा का नागरिक मानते हुए रोहिंग्या प्रतिनिधियों को उत्तर अराकान से चुना गया। 1946 में जनरल आंग सान ने रोहिंग्या मुसलमानों को पूरे अधिकार दिए जाने और भेदभाव न होने का भरोसा दिया। लेकिन जल्द ही उन्हें पद से हटा दिया गया। सत्ता में आने के बाद 1962 में नेविन ने रोहिंग्या समुदाय के सामाजिक और राजनीतिक संगठनों को ध्वस्त कर दिया। 1977 में सेना ने सभी नागरिकों का रजिस्ट्रेशन किया और 1978 में 2 लाख से ज़्यादा रोहिंग्या मुसलमानों को बांग्लादेश में शरण लेनी पड़ी। 1700, 1800, 1940 और 1978 में बड़े स्तर पर रोहिंग्या मुसलमानों को अपना सबकुछ छोड़कर भागने के लिए मजबूर किया गया| इसके अलावा 1991 और 1992 के बाद 2012 में उन्हें निर्वासन भी झेलना पड़ा। 

 

चार बार भगाए जाने के बाद भी यह साबित होती है कि रोहिंग्या सदियों से बर्मा में ही रहते रहे हैं और बर्मा सरकार व बौद्ध बहुल आबादी के उस दावे को झूठा साबित करते हैं कि वे बांग्लादेश से आए शरणार्थी हैं| दुनिया में रोहिंग्या मुसलमान ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय है जिस पर सबसे ज़्यादा ज़ुल्म हो रहा है| म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है| म्यांमार में एक अनुमान के मुताबिक़ 10 लाख रोहिंग्या मुसलमान हैं| सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है| हालांकि ये म्यामांर में पीढ़ियों से रह रहे हैं| रखाइन स्टेट में 2012 से सांप्रदायिक हिंसा जारी है| जिसमें लाखों लोगों की जाने चली गई और लाखों लोग वहां से भागने पर मजबूर हैं| 

 

पिछले कुछ दिनों से वहां पर फिर से नरसंहार की ऐसी खबर आ रही है जिसको पढ़ कर इंसान की रुक कांप जाये| ब्रिटिश अखबार इंस्पेक्टर के अनुसार, बर्मी सेना की हिंसा के शिकार लोगों ने जो कहानियों का बताई ऐसा किसी लोकतांत्रिक देश में नहीं हो सकता| 41 वर्षीय अब्दुर रहमान ने कहा कि उनके गाव चोट प्यूट पर पांच घंटे तक लगातार हमला किया गया। रोहिंग्या पुरुषों को घेर कर एक झौपंडी मे ले जाया गया उन्हे सर्कल में बैठा कर आग लगाई गई जिसमे अब्दुर रहमान का भाई भी मारा गया। अब्दुल रहमान ने दर्दनाक हादसे के बारे में बताते हुए कहा कि मेरे दो भतीजे, जिनकी आयु छह और नौ साल थी, उनके सर काटे गए और मेरी साली को गोली मार दी गई। हमने बहुत से जले और कटे शव देखे जिन्हे क्रूरता के साथ मारा गया था। 

 

वही 27 वर्षीय सुलतान अहमद ने बताया कि कुछ लोगों को सर काटे गए और उन्हे बड़ी क्रूरता के साथ काटा गया जबकि मै अपने घर मे छुपा हुआ था। इस बात का पता लगते ही मै घर के पिछवाड़े से भाग गया अन्य गांवों में भी गले रेतने और वध करने की घटनाओं की सूचना है। 

 

भारत में भी रोहिंग्या मुस्लमानों को लेकर सरकार का रुख सख्त है| केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने साफ़ कहा है कि “रोहिंग्या अवैध आप्रवासी हैं और उनको उनके मुल्क भेजा जाएगा| किसी को भी इस मुद्दे पर भारत को प्रवचन नहीं देना चाहिए क्योंकि देश ने दुनिया में अधिकतम संख्या में शरणार्थियों को अपने यहां शरण दी है|” रिजिजू ने कहा, “मैं अंतरराष्ट्रीय संगठनों से कहना चाहता हूं कि चाहे ​रोहिंग्या संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के तहत रजिस्टर्ड हैं या नहीं| वे भारत में अवैध आप्रवासी हैं|”

 

रोहिंग्या मुस्लमानों को लेकर भारत में जगह जगह प्रदर्शन भी हो रहे हैं| भारत में इनकी तादात 40 हज़ार है| वहीँ इस मामले में भारत की सर्वोच्च न्यायालय में भी मुकादा चल रहा है जहाँ पर वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने भारत सरकार के रोहिंग्या मुस्लमानों को म्यांमार वापस भेजने के खिलाफ याचिका डाली है जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से 11 सितम्बर तक जवाब माँगा है| वहीँ इस याचिका के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने दो याचिका डाली गई है| जिसमे रोहिंग्या मुस्लमानों को आंतकवादी बताया गया है और देश की आंतरिक रक्षा के लिये खतरा बताया गया है| अब देखना यह है कि भारत सरकार सुप्रीम कोर्ट में क्या कहती है|

 

रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या और हिंसा पर रोक लगाने के लिए अब तक आर्कबिशप डेसमंड टूटू से लेकर मलाला यूसुफजई तक- 12 नोबल पुरस्कार विजेता स्टेट काउंसलर और नोबल विजेता आंग सान सू की से अपील कर चुके हैं। लेकिन अभी तक आंग सान सू की  तरफ से कोई ऐसा बयां अनहि आया है जिससे यह लगे की अब रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों का अंत होगा| अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तुर्की को छोड़ कर किसी भी देश ने इस मामले में कुछ भी बोलने ज़हमत नहीं उठाई है| ऐसे में रोहिंग्या के अल्पसंख्यक मुस्लमानों का क्या होगा उनको जीतेजी ज़मीन तो नहीं मिल रही क्या मरने के बाद के बाद दो गज़ ज़मीन रोहिंग्या में मिलेगी या नहीं??





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