25/09/2017


गाय की फ़रियाद

लेखक : अहमद निसार

 

गाय फ़रियाद

मेरा सम्मान करो, मैं सम्मान के योग्य हूँ

****

ये लोग भी अजीब हैं !

 कोई मेरे पीछे पूजने के लिए पड़ जाता है !

 तो कोई काट खाने के लिए !

मानो तो उनका मानना ​​है कि भगवान ने उन्हें दुनिया में मुझे पूजने के लिए भेजा है !

 और उन्हें मुझे काट खाने के लिए !

गाय बढ़ बड़ा रही थी।

मेरा गुजर उधर से हो रहा था।

 हम लेखकों की जाति चुप बैठने वाली नहीं।

 कहीं भी किसी से भी सवाल कर लेती है।

गाय से वार्तालाप करने का मन हवा। चलो यह तो जानें कि गाय के मन की बात क्या है।

फिर सोचा कि गाय को किस नाम या किस रिश्ते से पुकारूँ?

वैसे गाय माता तो नहीं है।

लेकिन नेक और लोकप्रिय ज़रूर है।

सदियों से इंसान की सेवा करती आरही है।

 मैंने फैसला कर लिया,

मैं कलम का मजदूर हूँ।

 बैल खेत और खल्यानों में मजदूरी करता है,

 मैं भी मजदूर और वह भी मजदूर।

इस प्रकार श्रम तुलना से वह मेरा भाई हुआ।

 और गाय प्रजा सेवा करने वाली इस गाय को भाभी बनालूं।

मैं बातचीत छेड़ ही दी।

में           :      गाय भाभी, आप को नमस्कार करूं या सलाम या गुड-मॉर्निंग?

गाय भाभी    :      कुछ भी मत करो। वर्ना तुम्हारे इस शैली से गौ-रक्षक और गौ-बक्षक दोनों

तुम्हारे पीछे पड़ जाएंगे। और तुम्हें ऐसे डंडे मारेंगे कि तुम्हारी एक भी हड्डी नहीं

टूटेगी, लेकिन तुम्हारा शरीर का ढांचा अधूरा हो जाएगा। कानून भी तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाएगा।

में           :      (गाय की यह सूचना दुरुस्त लगी, बड़ी सादगी के साथ पूछा)

गाय भाभी आप क्या और क्यों बड़बड़ा रही थीं?

गाय भाभी    :      कुछ भी नहीं है, मुझे समझ में नहीं आ रहा, मूसा के युग काल के सामरी से

लेकर आजकल की सरकारें तक मेरे और मेरे परिवार के पीछे पड़े हैं। यह भूल

गए कि वेद काल में भी मुझे काटा जारहा था, मेरी चर्बी को यज्ञ में उपयोग

किया करते थे। उन्हें आज अचानक मुझसे प्यार हो गया है, और सम्मान भी

चरम पर पहुंच गया है, और पूजा करने की ख्वाहिश का पारा आकाश को छू रहा

है।

में           :      जरा संभल कर बोलिये भाभी ...

गाय भाभी    :      (कुछ और बिगड़ते हुए) क्या संभ्लूं? और कैसे संभ्लूं? मेरी तो हर कोण से

अपमान और मौत हो रही है।

में           :      वह कैसे?

गाय भाभी    :      किसान को ले लो, जैसे ही उसके घर मेरा जन्म होता है तब से मुझे ऐसे पालता

                  है जैसे उसके घर की सदस्य हूँ। जब मेरा बछड़ा होता है, वह मुझे ऐसे देखता है

जैसे उसके घर के लिए राज कुमार को जन्म दिया है, अगर बछड़ी (शायद नया

शब्द) हुई तो ऐसा समझता है जैसे उसके घर सिक्कों की बारिश करने वाली देवी

आई हो।

में           :      यह तो अच्छी बात है।

गाय भाभी    :      क्या अच्छी बात है? (गुस्सा बरकरार रखते हुए) किसान का यह प्यार और दुलार

जानते हो कब तक रहता है?

में           :      आप ही बताइये।

गाय भाभी    :      जब तक गाभ रहती हूँ और बछड़े बछड़ियों को जन्म देती और दूध देती रहती हूँ।

में           :      फिर उसके बाद ......?

गाय भाभी    :      फिर उसके बाद क्या? किसान इस बात को परख लेता है कि अब मेरी कोई

संतान नहीं होने वाली, दूध देने के योग्यता समाप्त हो गई, यानी कि बाँझ हो

गई, तो मेरे एहसान भूल जाता है. अब मैं उसे देवी की जगह राक्षसी दिखने

लगती हूँ। और मुझे बोझ समझने लगता है। जाहिर सी बात है मुझे जो घास

डालेगा इसकी कीमत बराबर अब गोबर तो नहीं दे सकती ना?

में           :      अच्छा.... उसके बाद आप को पृथ्वी और प्रकृति के हवाले छोड़ देता होगा।

गाय भाभी    :      नहीं! यही तो बुरी बात है। बुरी नहीं बल्कि बहुत बुरी बात। मुझे पृथ्वी या प्रकृति

के हवाले छोड़ देता तो कम से कम नदी नालों, तालाबों के किनारे या जंगल और

बियाबानों में बसेरा करके जी लेती। प्रकृति में मिलने वाली घास खाकर नदी नालों का पानी पीकर अपनी आयु तो पूरी जी लेती।

में           :      तो क्या ऐसा नहीं होता?

गाय भाभी    :      ऐसा मासूम चेहरा बना रहे हो जैसे कुछ जानते ही नहीं!

में           :      ऐसा नहीं भाभी, मैं आप से जानना चाहता हूँ।

गाय भाभी    :      वह ताक में रहता है कि कोई गुलाबी कंपनी मुझे खरीदेगी और मेरे अच्छे दाम

देगी। तुरंत दलालों के माध्यम से मुझे बेच देता है।

में           :      इसमें सरकार और पुलिस आपकी मदद नहीं करती?

गाय भाभी    :      हमारी इतनी नसीब कहां। यह पुलिस कलमुवी मेरे बेचे जाने का इंतजार करते

रहते हैं। अगर गुलाबी कंपनी खरीदती है जिसके मालिक ब्राह्मण या जेन हों तो

चुप रहती है। अगर मुसलमान खरीदता है तो उसे तुरंत पकड़ लेती है। उसे

सताता भी और उस से पैसा वसूली भी करता है।

में           :      तो आप को इस बात से क्या परेशानी? पुलिस के गूस खाने से आपके घास

खाने में क्या फर्क पड़ता है?

गाय भाभी    :      मुझे फ़र्क जरूर पड़ता है। जब यह लोग खरीदारों को हिरासत में लेते हैं, तो हमें

भी हिरासत में लेते हैं। लोगों को थाने ले जाते हैं खूब मारपीट भी करते हैं और

खाना भी खिलाते हैं। लेकिन बदनसीब तो हमारी ही है। हमें हिरासत में लेते हैं, गौ-शालाओं में ले जाकर छोड़ देते हैं। इन गौ-शालाओं से तो तुम्हारी जेल ही बेहतर, वहाँ समय पर खाना तो मिलता है, मार के साथ क्यों न सही। लेकिन हमारा मामला कुछ और है। हमें बांध के मानो कैद करके रखा जाता है। मेवे फल दूर की बात खाने के लिए घास तक प्राप्त नहीं होती। आखिर पीने को पानी तक नहीं (आवाज में गुस्सा थमता और ग़म बढ़ता नजर आया)।

में           :      यह तो बहुत बुरी बात है। आप के हिसाब से आप को क्या करते तो अच्छा था?

या फिर, क्या करते तो अच्छा होता?

गाय भाभी    :      हमें हमारे हाल पे छोड़ देते तो अच्छा था। हमें स्वतंत्र प्रकृति में छोड़ देते तो

हम इधर उधर वन व बियाबानों में स्वतंत्र घूमते, भगवान का दिया हुआ खाते-

पीते और अपनी असली मौत मरते।

में           :      वैसे शहरों में तो आप को खुला छोड़ देते हैं?

गाय भाभी    :      शहरों में भोजन क्या खाक मिलता है? कुछ न मिलने पर हम प्लास्टिक खाकर

जीते हैं और कुछ दिन में ही इसके रासायनिक प्रभाव से तुरंत मर जाते हैं।

शहरों में मनुष्य को ही नहीं मिलता तो हमें क्या मिलेगा?

में           :      वैसे लोग आप को वध करके खाने में आपको क्या दिक्कत है?

गाय भाभी    :      आप जानते हो कि बूचड़खानों में कैसे जानवर लाए जाते हैं?

में           :      जानवर तो जानवर हैं, अच्छे ही होंगे।

गाय भाभी    :      नहीं, लंगड़ा, लूला, बीमार, सूखे व भुखमरी से परेशान भूखे सूखे जानवर, अधिक

काटे जाते हैं।

में           :      (बात केवल गाय की करनी थी, इसलिए बात काटते हुए)

वैसे साठ साल से भारत के कई राज्यों में यह कानून है कि आप की हत्या न

हो।

गाय भाभी    :      हमारे देश में जानते हो कानून किस लिए होते हैं या बनाए जाते हैं?

में           :      इसलिए कि कानून का सम्मान हो, और इन्हें ईमानदारी से अमल करें।

गाय भाभी    :      नहीं, कानून होते हैं तोड़ने के लिए। इसी कानून की आड़ में एनिमल हसबंडरी,

नगर पालिकाएं और पुलिस वाले कमाई का जरिया बना लेते हैं। अरे यह कानून

के रखवाले वेश्यावृत्ति महिलाओं का पैसा तक नहीं छोड़ते! और बड़े गर्व से

निवाला तोड़ते हैं। क्या तुम लगता है कि मुझे और मुझसे होने वाली कमाई

को छोड़ देंगे?

में           :      इतना भी गुस्सा मत होइए। आजकल नया कानून आया है। आप ही नहीं बल्कि

अपने परिवार वालों की हत्या न करने का फरमान जारी हुआ है।

गाय भाभी    :      मियां बुद्धू! हमारे देश में जितने कानून इतने अधिक काले धंदे और चोरी के नए

रास्ते खुलते हैं। यहां भगवान या परमेश्वर का भय कहाँ है? और धर्म भी कहां है?

जहां यह दो नहीं वहाँ मानवता कहाँ? लोग एंटरटेनमेंट (Entertainment) को धर्म

और धर्म को एंटरटेनमेंट समझ और बना बैठे हैं। समझे ही नहीं बल्कि निर्णय

भी कर चुके हैं। यह मनोरंजन ही आस्था है और आस्था ही मनोरंजन हैं।

में           :      भाभी आप तो बड़ी समझदार हैं। इतनी सारी अच्छी बातें और समझदारी आप

को कहाँ से मिली?

गाय भाभी    :      एक दौर ऐसा भी बीता है कि लोग सच्चे थे, उनकी संगत में मैं ने खुद को

ढाला है। लोग समाज सेवा को पवित्र मानते थे। मैं भी उन्हीं से सीखा हे, और

ऐसा ही करती आरही हूँ, मानव सेवा। दुनिया में आज तक जितने

मानव् संतान आई है, उनमें नब्बे (90) प्रतिशत बच्चों की मैं या मेरी बहन

भैंस दाई होती आई हैं। वह कौन मनुष्य है जिसने मेरे दूध से अपनी भूख न

मिटाई हो?

में           :      जी बहुत अच्छे।

गाय भाभी    :      लेकिन यह आदमी धीरे-धीरे बदल गया। इसमें अंतर बढ़ गया। काले गोरे का भेद

करने लगा। भैंसों को ले लो, उन्हें कोई पूजने वाला नहीं. क्योंकि वह जरा भद्दी

और काली होती है। जैसे भारत के इतिहास में गोरे लोगों को देव और काले

लोगों को राक्षस मानते थे, ठीक उसी तरह आज की जन जाती मुझे यानी गाय

को देवी या माता मानते हैं। लेकिन भैंस को देवी या माता नहीं माना जाता,

शायद राक्षस माना जाता है, मानो कि मैं आर्यन हूँ और भैंस द्रविड़। जहां

मंदिरों में बली चढाना हो तो भैंस की बली दी जाती है, मेरी नहीं।

में           :      (मैं ने सोचा कि कहीं गाय भाभी के इस भाषण को हेट स्पीच (Hate speech)

क़रार न दे दें। इसलिए बात को काटते हुए)

आप को तो गौ-शालाओं में खाना खूब मिलता होगा?

गाय भाभी    :      कभी कभी भक्तिपूर्वक और दयालु लोग आते हैं तो कुछ खिला देते हैं और खाने

के लिए कुछ छोड़ भी जाते हैं। वैसे यह कभी कभी आते हैं। लेकिन हमें भूख तो

कभी कभी नहीं लगती ना! हर दिन लगती है!

में           :      आपका स्थान तो भारत में बहुत उच्च है, आप माता और देवी की तरह पूजी

जाती हैं।

गाय भाभी    :      (बात काटते हुए) में बता चुकी न केवल तब तक पूजते हैं जब तक बछड़े

जन्ती हूँ और दूध देती हूँ, वह भी स्वस्थ हालत में। फिर उसके बाद मेरी इज्ज़त 

कम हो जाती है, और यहां तक ​​नौबत आ जाती है कि मुझे पिंक व्यापार हाउसेस को बेच दिया जाता है।

में           :      मेरा कहना था कि आप का सम्मान वेद काल से होता आरहा है।

गाय भाभी    :      यह तो आधा सही है। वेद कॉल में शब्द '' गौ 'के अर्थ कई निकलते थे। जिसमें

एक प्रकाश है तो दूसरा अर्थ गाए. जैसे 'गौ वर्धन' के अर्थ प्रकाश का निचोड़, और

गोविंद के अर्थ तेज से भरा या तेज वाला हैं, यह उच्च बातें हैं, इस घृणित दौर मैं तुम्हें समझ में नहीं आएंगी, फिर से झगड़ों में पड़ जाओगे, छोड़ो इन बातों को। इस संघर्ष का कारण में बनूँ, यह पाप मुझसे नहीं हो सकता।

में           :      मैं ने यह भी सुना है कि आपके अंदर 33 करोड़ देवी देवता रहते हैं।

गाय भाभी    :      आप फिर से ऐसी ही बातें करने लगे? चलो स्पष्ट करना भी आवश्यक है। एक

दौर ऐसा भी बीता है कि मेरी आबादी कम होने जैसी लग रही थी। तो कुछ

मनचलों ने ऐसा गढ़ दिया कि मेरे अंदर देवी देवता रहते हैं, ऐसे चित्र भी बनाए

गए जिन में मेरे शरीर पर देवी देवताओं की आकृतियों बनी हों। जबकि ऐसा

कुछ नहीं मगर लोग एक बात के लगातार पुनरावृत्ति को सच मान जाते हैं। इस

मामले में भी ऐसा ही हुआ। लोग इस बात को सच मान बैठे।

में           :      लेकिन आप तो लोगों के लिए काफी लाभदायक हैं। यह तो मानती हैं?

गाय भाभी    :      मेरे मानने या न मानने से क्या होगा? मानना ​​तो तुम्हें चाहिए। में केवल किसान

ही नहीं बल्कि सभी लोगों की एक अच्छी दोस्त हूँ। मुझे घर में रखें तो समझो

कि आपका बेटा भी आपको इतना कमा कर नहीं देगा  जितना मैं कमा कर देती

हूँ. मगर आप हो कि उसका ना ही सही ज्ञान है न ही पास. मुसलमान तो

ज़मीन से दूर हो गया। कृषि और खेती से दूर हो गया। उसे न गाय मालूम न

बेल। न उनके लाभ का ज्ञान न उनकी मान व इज्जत। हम अल्लाह की नेमतों

में हैं, हम से लाभ उठाओ।

में           :      ऐसा नहीं भाभी, हम भी आप को महत्व देते हैं।

गाय भाभी    :      (फिर से गुस्से में आकर) कहाँ महत्व देते हो? एक दौर था, गांव गांवों में यह बात

आम थी कि जो भी घर मुझे पाला पोसा, समझो कि घर में बरकत ही बरकत है।

दूध, दही, घी, मक्खन, छाँच। यहाँ तक कि घर वाले कुछ दूध खुद भी उपयोग

करते  और थोड़ा बेचकर अपने घरेलू जरूरतों को पूरा करते, यानी कि अपना

जीना संसार चला लेते। में उन्हें गोबर देकर उनके खेतों को उपजाऊ करती और

इसी गोबर से ओप्लियों के में चूल्हा ईंधन प्रदान करती थी और हूँ भी। आजकल

कॉर्पोरेट दौर है। मेरी मान व इज्जत ही नहीं। मुझसे दिए जाने वाले दूध को भी

मशीनों से दोहते हो तुम लोग, और यह नाहंजारे यह तक नहीं जानते कि मेरे

थनों से दूध कब आ रहा है और खून कब?

में           :      (चकित होकर) क्या ऐसा भी होता है?

गाय भाभी    :      कभी विचार किया है इस बात पर? ध्यान से देखो, डायरी वाले मेरे दूध में शामिल

मेरा खून भी पिला रहे होंगे। लेकिन सफेद दूध में थोड़ा सा खून दिखाई नहीं

देगा। हो सकता है कि आप मेरा खून भी पी रहे हों और तुम्हें खबर तक न हो!

में           :      आखिर आप कहना क्या चाहटी हैं? और आप हिंदुओं और मुसलमानों को क्या

संदेश देना चाहती हैं?

गाय भाभी    :      मेरा सन्देश सुनने की स्थिति में न मुस्लिम है न हिन्दू। मगर हाँ उनसे कुछ

बातें ज़रूर पूछना चाहती हूँ।

 मुसलमानों से यह पूछना चाहता हूँ कि क्या अल्लाह ने तुम्हें दुनिया गाय खाने

के लिए भेजा है?

                     हिंदुओं से मेरा सवाल यह है कि क्या परमेश्वर ने तुम्हें दुनिया में मेरी पूजा

करने के लिए भेजा है?

जिद्दी मत बनो, विचार से सोचो, तहमारी जिद के पीछे कहीं नादानी तो कहीं ईर्षा

छिपे नजर आ रहे हैं।

                     इससे बाहर निकलो।

इन दोनों को यही संदेश दूंगी कि अगर बनना ही है तो एक अच्छे इंसान बनो।

यह समझो कि गाय तुम्हारी एक अच्छी दोस्त है ना कि केवल पोषण और पूजा

का सामान।

अगर मुझसे सच्चा प्यार या भक्ति रखते हो तो मुझे मेरे अंतिम दिनों में स्वतंत्र

प्रकृति में छोड़ दो, बाजारों में न लाओ।

                     और पिंक कंपनियों बंद करो।

यह ढकोसलापन छोड़ो कि मुझसे प्रेम है।

मेरा सम्मान करो, में सम्मान के योग्य हूँ।

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