26/07/2017


आखिर कब तक किसानों के साथ राजनीति होगी

अवैस अहमद उस्मानी

 

जहाँ आज कल मौजूदा केंद्र सरकार तीन पूरे होने का जश्न धूम धाम से मना रही है वही अब खुद को किसानों और गरीबों की सरकार कहने वाली बीजेपी सरकार देश भर में हो रहे किसानों के प्रदर्शन से घिरी हुई नज़र आने लगी है| विपक्ष भी किसानों को लेकर केद्रं सरकार को घेरने की कोशिश करती नज़र आ रही| वहीँ कई नेता तो किसानों से मिलने के लिए मोटरसाईकिल पर भी जाते दिखे| इससे पहले मार्च में जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसानों ने कई दिनों तक अपना प्रदर्शन किया| यह प्रदर्शन बड़ा ही विचित्र था कभी प्रदर्शन कर रहे किसानों ने खुद को कोड़े लगवाये तो कभी खुद का ही मूत्र पी कर किसानों के हालात को सामने रखने की कोशिश की| पूरे देश में किसान एक बार फिर चर्चा में है लगता है कि राज्यों में चुनाव आने वाला है|

कर्ज-माफी व फसलों के उचित दाम को लेकर महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में किसानों का विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा। कहीं पर विरोध को दिखाने के लिए किसानों ने हजारों लीटर दूध सड़कों पर बहाया गया तो कहीं पर फल-सब्जियों को सड़क पर फेक कर अपना विरोध जताया| वहीँ मध्यप्रदेश में प्रदर्शन कर रहे छह किसानों की हत्या हो गई है| राज्य का गृहमंत्री ने ब्यान दिया कि वहां मौजूद पुलिस और सीआरपीएफ में से किसी ने गोली नहीं चलाई, मगर किसान मरे गोली से ही| इसके चंद घंटे के अन्दर ही गृहमंत्री अपने ब्यान से पलट गए और कहा कि किसान पुलिस की गोली से ही मरे| वही घटना के 24 घंटे के बाद आईजी पुलिस बयान देते हैं कि गोली पुलिस ने चलाई, मगर ये नहीं कहते हैं कि जो 6 किसान मरे हैं वो पुलिस की गोली से मरे हैं|

छ किसानों की हत्या के बाद से  इंदौर, उज्जैन, देवास में कई जगहों पर हिंसा की घटना हुई हैं| कहीं बस जला दी गई है तो कहीं दुकानों को तोड़ा गया है| यहाँ तक कि किसानों ने ज़िलाधिकारी के साथ धक्का-मुक्की की और उन पर हमला किया| तलाम-नीमच लाइन पर रेल की पटरियों को नुक़सान पहुचाया गया जिससे रेल सेवा भी बाधित हुई| वहीँ देवास में किसानों ने थाने के सामने प्रदर्शन किया और थाना परिसर में रखी गाड़ियों में आग लगा दी| सोनकच्छ में प्रदर्शनकारियों ने एक चार्टर्ड बस पर हमला कर उसको आग के हवाले कर दिया| हिंसक प्रदर्शनों को देखते हुए कई जगहों पर कर्फ्यू लगा और मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई| वही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ट्वीट कर कहा है कि वे खुद एक किसान हैं और उनकी परेशानी समझते हैं| आपकी सारी बातों पर सरकार अमल करेगी| इसके बाद आनन फानन में राज्य सरकार ने कुछ क़दम भी उठाये| जैसे 5,050 रुपये क्विंटल तुअर दाल का ख़रीद मूल्य, 5,025 रुपये क्विंटल मूंग दाल का ख़रीद मूल्य, 20 जून से उड़द की ख़रीद, किसानों को फ़ौरन भुगतान इसके साथ और भी कई फैसले लिए साथ ही मरने वाले किसानों के परिवार को एक एक करोड़ की राशि देने का भी एलान किया|

पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान किसानों को स्वामीनाथन आयोग के सुझाव के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य के अतिरिक्त 50 फीसदी लाभकारी मूल्य प्रदान करने का वादा किया गया था, जो अब तक पूरा नहीं हो पाया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2014-2015 के दौरान किसान आत्महत्या में 42 फीसदी की वृद्धि देखी गई। वर्ष 2014 में 5,650 किसानों ने आत्महत्या की थी, जो 2015 में बढ़कर 8,007 तक पहुंच गई। महाराष्ट्र में पिछले वर्ष तीन हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की। आंकड़ों की मानें, तो किसान आत्महत्या के 80 फीसदी मामलों में कारण बैंक लोन है।

 पिछले वर्षों में दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में अपार वृद्धि हुई है। वर्ष 2001 में दूध की कीमत जहां 14-15 रुपये प्रति लीटर थी, वह आज 50 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच चुकी है। 12 रुपये प्रति किलोग्राम बिकने वाली चीनी 40-50 रुपये प्रति किलो के भाव से बेची जा रही है। 1994 से 2014 के आंकड़ों के अनुसार कर्मचारियों का वेतन 300 प्रतिशत बढ़ा है। स्टील, सीमेंट, साबुन व वस्त्र के मूल्य में भी 300 फीसदी का इजाफा हुआ है। रासायनिक खादों के दाम 300 रुपये से बढ़कर 1,100 रुपये हो गए हैं। कीटनाशक, जो 100 रुपये में मिलते थे, अब 400 रुपये के हो चुके हैं। इस परिदृश्य में किसानों की आय दोगुनी करने का प्रारूप स्पष्ट नहीं होता। यदि 2022 तक किसानों की आमदनी वर्तमान से दोगुनी हो भी जाती है, तो क्या बढ़ती महंगाई के अनुपात में यह वृद्धि कारगर होगी?

सवाल यह हैं कि कब तक देश का किसान इसी तरह आत्महत्या करता रहेगा? कब तक प्रदर्शन कर रहे किसानों को गोली खानी पड़ेगी ? कब तक देश का किसान इस आस में जियेगा की सरकार उसके क़र्ज़ को माफ़ कर दे गी? कब तक इस आस में जियेगा की उसको उसकी फसल का उचित दाम मिलेगा? उत्तर प्रदेश व पंजाब के किसानों की आधी-अधूरी कर्जमाफी की पहल से अन्य राज्यों के किसानों में भी आस जगी है। खेती को घाटे से उबारने के लिए अब तक की सरकारें टेढ़ा रुख अपनाती रही हैं और उचित मूल्य से पल्ला झाड़ती रही हैं। स्वामीनाथन रिपोर्ट का सभी दलों ने समर्थन किया था, इसलिए अब सबकी नैतिक जिम्मेदारी है कि इसकी सिफारिशों को लागू करें। 





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