26/09/2017


सुरक्षा के टीके और कठिनाइयां

डॉ. मुजफ्फर हुसैन गजाली


बच्चे कलियों की तरह कोमल होते हैं। वह हवा में तैरते वायरस और बैक्टरिया का मुकाबला नहीं कर पाते। इसलिए उन्हें संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। पहले दुनिया भर में दस्त, निमोनिया, चेचक, खसरा, मलेरिया, हेपटाइटिस बी, डिपथेरिया (गलघोटू , काली खांसी) से बच्चे मर जाते थे। टेटनस और पोलियो से भी बच्चों के अपंग होने या मरने की संभावना रहती। टीकेदो सौ साल पूर्वअस्तित्वमें आए। 1796 में यूनाइटेड किंगडम के एडवर्ड जीनियर ने चेचक से सुरक्षा के लिए वैक्सीन तैयार की थी। इन दिनों चेचक ऐसी बीमारी थी जो महामारी का रूप धारण कर लेती थी। सौ साल पहले 1885 में डॉक्टर लुईस पास्टर ने रेबीज से बचाव का सफल परीक्षण किया। आवारा कुत्तों के काटने से बच्चे और बड़े रेबीज से प्रभावित, यहाँ तक कि कई इस बीमारी के कारण  मौत का निवाला बन जाते थे।

बीसवीं शताब्दी के मध्य में जोन्स सालिक और अल्बर्ट साबिन ने नियमित टीकाकरण की शुरुआत की। उन्होंने इनऐकटीवेटिेड और लाइव पोलियो वैक्सीन का अविष्कार कर लिया था। उनके द्वारा तैयार दवा से दुनिया भर में अनंत बच्चे पोलियो से सुरक्षित हुए। पोलियो की बीमारी की वजह से कितने ही लोगों का जीवन व्हीलचेयर और बैसाखी पर निर्भर हो जाता था।  इस टीके के आने से इसमें कमी आई। इमूनाईज़ेशन आधुनिक चिकित्सा की एक सफल कहानी है। इस के कारण चेचक जैसी बीमारी 1977 में दुनिया से खत्म हो गयी। 1974 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ की स्थापना के बाद टीकाकरण में क्रांतिकारी बदलाव आया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक्सपैंडीड प्रोग्राम ऑन इमूनाईज़ेशन (EPI) बनाया। इसके अनुसार यह लक्ष्य निर्धारित किया  गया कि दुनिया भर के सभी बच्चों को बचपन में होने वाली छह बीमारियों से सुरक्षा के लिए मुफ्त टीके प्रदान किए जाएं। इस काम मेंयूनिसेफ ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर काम किया। इ पी आई के तहत डिपथेरिया, काली खांसी, गलघोटू, पोलियो, दस्त, खसरा और टेटनस के टीके दिए जाते थे।


भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ इ पीआई के तहत बच्चों को स्कूलों में स्माल पोक्स, टीबी, डिपथेरिया, पोलियो, दस्त खसरा और टेटनस से बचाने के टीके देने का इंतेजाम करता था। लेकिन यह काम स्थायी नहीं  था क्यों कि जो बच्चे उस दिन स्कूल नहीं आते वे इससे वंचित रह जाते थे। उन तक टीके पहुंचाने का कोई आधिकारिक प्रबंधन नहीं था। इसलिए बच्चों की मृत्युदर हमारे यहाँ बहुत ज्यादा थी। लाखों बच्चे अपनी पहली और कितने ही बच्चे पांचवीं वर्षगांठ नहीं देख पाते थे। इस स्थिति को देखते हुए भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने 1985 में यूनिवर्सल इमूनाईज़ेशन प्रोग्राम (यू आई पी) शुरू किया। सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उप केंद्र, जिला अस्पताल, आंगनवाड़ी केन्द्रों को इस कार्यक्रम के साथ जोड़ा। आशा वर्कर, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य से जुड़े स्वयंसेवकों की मदद से हमारे देश में इमूनाईज़ेशन कार्यक्रम सफलता की ओर बढ़ा। उनकी कड़ी मेहनत के परिणाम स्वरूप  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को फरवरी 2014 में पोलियो मुक्त देश घोषित कर  सम्मानित किया।


स्वास्थ्य मंत्रालय में यू आई पी के उपायुक्त डॉ. एम के अग्रवाल ने बताया कि इस समय ग्यारह बीमारियों से लड़ने के टीके हमारे देश में मौजूद हैं। इनमें डी पी टी, बीसीजी, पोलियो, टेटनस, हेपटाइटिस बी, पेनटावेलैन और खसरा रूबेला (एम आर) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। देश ने इमूनाईज़ेशन में इतनी प्रगति की है कि वायरस और बैक्टरिया जनित बीमारियों से हम अपने बच्चों को सुरक्षित रख सकते हैं। उन्होंने कहा कि मिशन इंद्र धनुष के तहत इन बच्चों तक भी पहुंचने की योजना बनायी गयी है जो टीकाकरण शिविरों तक नहीं आ पाते। जैसे ईंट के भट्टे या निर्माण साइटों पर काम करने औरकारखानों, फेक्ट्रियों, उद्योगों या दिहाड़ी पर काम करने वाली महिलाओं के बच्चे आदि। इस विशेष अभियान का लक्ष्य सौ प्रतिशत बच्चों तक टीके पहुंचाना है क्योंकि एक भी बच्चा यदि छूट जाता है तो वायरस, बैक्टरिया जनित बीमारियों का पूरी तरह सफाया नहीं हो पाता।


डा. प्रदीप हलदर उपायुक्त (आई एम एम) स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि लोग सवाल करते हैं कि बच्चों को टीके क्यों लगवाए जाएं? उन्होंने कहा कि बच्चे इतने कमजोर और छोटे होते हैं कि उन्हें कोई  दवा नहीं दी जा सकती और न ही छह महीने तक उन्हें कुछ पिलाया जा सकता है केवल मां के दूध के। ऐसी स्तिथी में उन्हें वायरल या बैक्टरिल संक्रमण से कैसे बचाया जाए? उनका मानना ​​है कि बच्चों को  प्रतिरक्षाण टीकों के द्वारा ही सुरक्षित रखा जा सकता है। क्यों कि टीके हर तरह से सुरक्षित हैं उन्हें निश्चित तापमान पर रखा जाता है। टिकों को कई चरणों के सुरक्षा चक्र से गुजरने के बाद ही उपयोग करने की अनुमति है। इस मामले में सरकार किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं करती। अगर किसी अनहोनी की खबर आती है तो उस पर गंभीरता से कार्यवाही की जाती है और इससे निपटने का एक प्रोटोकॉल है जिसमें कोल्ड चेन से लेकर टीका लगाए जाने वाले बच्चे तक जितने लोग शामिल होते हैं उन सब कीजाच और स्थिति का आंकलन कर  किसी नतीजे पर पहुंचा जाता है। उन्होंने बताया कि देश में हर साल 2.6 करोड़ बच्चे पैदा होते हैं। इनमें से 13 प्रतिशत निमोनिया और 10 प्रतिशत डायरिया से मौत का शिकार हो जाते हैं। दुनिया भर में खसरा रूबेला से होने वाली मौतों में 39 प्रतिशत मौतें केवल भारत में होती हैं। जो लगभग 30 से 35 हजार हैं। सरकार ने खसरा रूबेला से बच्चों को बचाने के लिए एम आर टीका लॉन्च किया है जो सभी स्कूल जाने वाले बच्चों को चरणबद्ध दिया जा रहा है। यह टीका 9 माह से 15 वर्ष तक के सभी बच्चों को दिया जाएगा। जो बच्चे स्कूल नहीं जाते उन तक भी टीका पहुंचाने का इंतजाम किया जा रहा है। एक बार सभी बच्चों को यह टीका दिए जाने के बाद इसटीके को सामान्य टीकाकरण प्रोग्राम में शामिल कर दिया जाएगा और अन्य टीकों के साथ बच्चों को दिया जा सकेगा।


इमूनाईज़सेशन कार्यक्रम में आने वाली समस्याओं पर बात करते हुए प्रसिद्ध अभिनेत्री शबाना आजमी ने कहा कि जानकारी की कमी, शिक्षा न होना और अफवाहों के चलते टीकाकरण अभियान की गति धीमी रही है। अभी तक 66 प्रतिशत बच्चों तक ही टीके पहुंच सके हैं। उन्होंने कहा कि सही जानकारी सही स्रोतों से लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है। राष्ट्रीयपरिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक कई राज्यों  में टीकाकरण में वृद्धि हुई है। इन राज्यों में दोगुना बच्चों को टीके लगे हैं। 2005-06 के दौरान बिहार में केवल 32.8 प्रतिशत बच्चों को टीके लगे थे लेकिन 2015-16 में यह आंकड़ा 61.7 प्रतिशत पहुंच गया। इसी तरह यूपी में 32 प्रतिशत से बढ़कर यह 51 प्रतिशत हो गया। जबकि दिल्ली में 66.4 प्रतिशत बच्चे प्रतिरक्षण टीकों के दायरे में हैं। किन्तु हरियाणा का मेवात सबसे अधिक पिछड़ा इलाका है वहां केवल 13 प्रतिशत बच्चों को ही टीके लग सके हैं। 


अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर तबस्सुम शहाब ने टीकों की सुरक्षा के बारे में कहा कि टीकों से किसी को नुकसान हो ही नहीं सकता क्योंकि टीके सुरक्षा गाइड लाइन के अनुसार तैयार किए जाते हैं। मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने एक सवाल के जवाब में कहा कि जो लोग यह कहते हैं कि टीके लगने से बच्चे नपुंसक हो जाते हैं यह सरासर अफवाह और अज्ञानता की बात है। गलतफहमी के चलते ही हमें पोलियो को अपने देश से समाप्त करने में 2014 तक इंतजार करना पड़ा। उन्होंने कहा कि सभी बच्चों को एक ही टीका दिया जाता है तो यह कैसे संभव है कि एक ठीक रहे और दूसरा नपुंसक हो जाए। दरअसल कुछ लोग यह काम जानबूझकर करते हैं ताकि कमजोर वर्ग हमेशा कमजोर ही रहें। मौलाना आजाद विश्वविद्यालय जयपुर के कुलपति प्रो. अखतारूल वासे ने कहा कि टीकाकरण हर बच्चे का अधिकार है यह उसे समय पर मिलना चाहिए। क्यों कि इससे बच्चों को घातक बीमारियों से निजात मिल जाती है। उन्होंने कहा कि सभी माता पिता अपने बच्चों को उनका अधिकार दिलाएं ताकि स्वस्थ समाज तैयार हो सके।


टीकाकरण ऐसा काम है जिसे सरकार अकेले नहीं कर सकती। टीके साझा प्रयास से ही हर बच्चे तक पहुँच सकते हैं। समाज और सिविल सोसाइटी को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संवेदनशील होना होगा। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम खुद भी स्वस्थ रहें और अपने आस-पड़ोस के लोगों को स्वस्थ रखने के लिए उनकी मद्द करें गलतफहमी और अफवाहों को फैलने न दें। अपने गांव, क्षेत्र और बस्ती में जागरूकता पैदा करें। उन का डर दूर कर उनमें विश्वास पैदा करें। इस में सरकारी कर्मचारियोंकेसाथ सामुदायिक नेताओं, धर्म गुरूओं, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय के शिक्षकों, मीडिया और सामाजिक संगठनों को बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेना चाहए। ताकि सामान्य टीकाकरण की राह में आ रही कठिनाइयां दूर हों और सो प्रतिशत बच्चे इमूनाईज़। तभी हमारी आगामी पीढ़ी स्वस्थ और बिमारियों से सुरक्षित होगी।





अन्य समाचार

2
3
4