26/07/2017


छत्तीसगढ़ में सुरक्षित मातृत्व अभियान, एक नया अनुभव

डा. मुजफ्फर हुसैन गजाली


हर गर्भवती महिला को गुणवत्ता पूर्ण मातृत्व, जन्म से पहले जांच, जटिल रोगों की समय से पूर्व पहचान तथा इलाज करने के लिए भारत सरकार ने '' सुरक्षित मातृत्व अभियान 'शुरू किया है। इस अभियान के तहत जिला अस्पताल, सामुदायिक एवं प्राथमिक  स्वास्थ्य केंद्रों में प्रतिमाह 9 तारीख को स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा गर्भवती महिलाओं की प्रसूति से पहले पूरी मुफ्त जांच की जाती है। इस अभियान को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरी झंडी दिखाई थी। इस अवसर पर उन्होंने कहा था कि सुरक्षित मातृत्व हर गर्भवती महिला का मौलिक अधिकार है। इसका उद्देश्य बच्चे के जन्म के समय होने वाली तकलीफों से महिलाओं को बचाना  है। उन्होंने आशा व्यक्त की थी कि सुरक्षित मातृत्व अभियान से प्रसूति मृत्यु दर में कमी आएगी। नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' में निजी डॉक्टरों से इस महान उद्देश्य के लिए स्वैच्छिक रूप से साल में बारह दिन देने की अपील की थी। कई राज्यों में निजी स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों के शामिल होने से अच्छे परिणाम सामने आए हैं। यूनिसेफ स्वास्थ्य से जुड़ी अन्य परियोजनाओं की तरह इस अभियान में भी तकनीकी भागीदार है।


महिलाओं को स्वस्थ रखने में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप केंद्र कितने सहायक हैं इसका अंदाजा हाल ही में छत्तीसगढ़ की आर्थिक राजधानी बिलासपुर जाने पर हुआ। यह ऐसा जिला है जहां नवजात मृत्यु दर एक हजार पर 38 है तो एक लाख प्रसूतामहिलाओं में से 261 की मौत हो जाती है। यह अनुपात राज्य की मातृ मृत्यु दर से अधिक है। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. ज्योति कोर जो खुद सुरक्षित मातृत्व अभियान में शामिल हैं ने बताया कि राज्य व जिला अस्पताल में कई मरीज बेहद खराब हालत में आते हैं जिन्हें बचाना संभव नहीं होता। उन्होंने कहा कि 99 प्रतिशत मामले ऐसे होते हैं कि समय रहते उनके रोग की पहचान हो जाती या फिर उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया जाता तो उन्हें बचाया जा सकता था। डॉक्टर अलका गुप्तासंयुक्त निदेशक स्वास्थ्य के अनुसार गर्भवती महिलाएं एनीमिया, उच्च रक्तचाप, गले में नाल अटक जाने, धड़कन कम होने और दर्द का इंजेक्शन बार बार देने से गर्भाशय फट जाने या किसी संक्रमण के कारण मौत का शिकार होती हैं । सीमा भारती आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने बताया कि गांव की महिलाओं में कई तरह की गलतफहमियों के चलते बच्चे की डिलिवरी अस्पताल के बजाय घर पर कराने को प्राथमिकता दी जाती थी। राष्ट्रीय ग्रामीण मिशन और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत अनुबंध पर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को रखनाआसान हुआ है। आशा (मतानिन) और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रयास से स्थिति बदली है, जहां केवल 14 प्रतिशत प्रसव ही अस्पताल में होते थे। आज यह आंकड़ा 70 प्रतिशत को पार कर गया हैडॉ. मधुलिका सिंह ठाकुरने बताया।

 जिला प्रशासन सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए प्रतिबद्ध है। स्टाफ की कमी, संसाधनोंऔर जनता में जागरूकता का अभावबड़ी बाधाएं हैं। जिला कलक्टर अनबलगन पी ने एक सवाल के जवाब में बताया कि 10 से 15 प्रतिशत सरकारी कर्मचारी भी छुट्टी पर रहते हैं। दिसंबर 2016 से प्राइवेट महिला रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों ने समय देना शुरू किया है, इससे स्थिति में बदलाव आया है। इस समय 58 आगंतुक स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर इस कार्यक्रम से जुड़ी हैं। इनमें से कई तो अपने खर्च से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जाकर मरीजों की जांच करती हैं। डॉक्टर पूजा उपाध्याय उनमें से एक हैं जो बिलासपुर से 59 किलोमीटर दूर नारायण जयपुर जाकर अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं। अनबलगन पी ने कहा कि प्रत्येक पंचायत में स्वास्थ्य समिति है जो गांव की महिलाओं को प्रसव से पहले जांच, सही उपचार की जानकारी प्रदान करने और अस्पताल में बच्चे का जन्म कराने की सलाह देती है। मितानिन और आंगन वाड़ी कार्यकर्ताओ को सरपंच की मदद से काम करने में आसानी होती है। मितानिन अपने गांव की रिपोर्ट देती है। रिपोर्टिंग प्रणाली को और बेहतर बनाने की कोशिश की गई है। प्रत्येक ब्लॉक में एक सुपर वाइजर नियुक्त है, जो गांव और सभी केंद्रों का दौरा कर वहां की जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करता है। उप स्वास्थ्य केंद्र में एक एएनएम और एक एम पी डब्ल्यू (पुरुष सदस्य) रहता है। एक सब सेंटर पर तीन से छह गांव की जिम्मेदारी होती है कहीं कहीं सेंटर से आठ गांव भी जुड़े हैं।


महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए गर्भवतीमहिलाओं का पंजीकरण कर जांच पर्ची जारी की जाती है, जिससे महिलाओं की मातृत्व से पहले पूरी जांच की जाती है। इसमें रक्त, मूत्र, रक्तचाप, वजन, उम्र, लंबाई और उनके पुराने इतिहास को भी जाना जाता है। जरूरत के अनुसार अल्ट्रासाउंड, सोनोग्राफी कराई जाती है। यहां 20 पंजीकृत सोनोग्राफी सेंटर हैं जो इस काम में स्वयं मदद कर रहे हैं। इसी रिपोर्ट के आधार पर यह तय होता है कि कौन सा मरीज़ सामान्य है और किसे अधिक ध्यान देने की जरूरत है, उच्च जोखिम वाले रोगी को रेड कार्ड दिया जाता है, जबकि सामान्य रोगी के पंजीकरण कार्ड पर हरा स्टिकर लगा दिया जाता है, अप्रैल 2016 से फरवरी 2017 तक जिले में 13388 गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण किया गया।हर मंगलवार को गर्भवती महिलाओं की जांच होती है और हर महीने की 9 तारीख को महिला रोग विशेषज्ञ  द्वारा विशेष चेकअप किया जाता। बिलासपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर भारत भूषण बोड़े ने अपनी बातचीत में बताया कि हम झोलाछाप अस्वीकृत डॉक्टरों पर भी कार्रवाई कर रहे हैं क्योंकि उनकी वजह से केस बिगड़ जाते थे। उन्होंने सोनोग्राफी सेंटरों पर कार्रवाई की बात भी स्वीकार की। उन्होंने बताया कि मातृ एवं शिशु की सुरक्षा के लिए 102 नंबर सेवा शुरू की गई है। कोई मरीज अगर इस नंबर पर कॉल करता है तो एक घंटा मैं उसे मदद पहुँच जाती है। इसी तरह 104 नंबर से गर्भवती महिलाओं को उनकी जांच, विशेष चेकअप और डिलिवरी की तारीख याद दिलाने का काम किया जाता है।


जिला अस्पताल, मेडिकल कॉलेज आने वाली ज्यादातर महिलाओं के प्रसव के लिए ऑपरेशन किए जाने के बारे में पूछे जाने पर मेडिकल कॉलेज में स्त्रीरोग प्रोफेसर और फोगसी की अध्यक्ष डॉ. संगीता रोहन जोगी ने बताया कि यहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उप केंद्र या किसी दूसरे निजि अस्पताल से मरीज रेफर होकर आते हैं। उनकी हालत ऐसी नहीं होती कि सामान्य डिलिवरी का इंतजार किया जाए। उनके अनुसार जिला अस्पताल में हर महीने 150 सामान्य डलीवरियां होती हैं तो 60-65 आपरेशन से। उन्होंने यह माना कि ऑपरेशन का चलन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है इस का कारण मरीज और डॉक्टर दोनों का सुरक्षित तरीके से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना बताया।


प्रतिरक्षाशक्ति को बढ़ाने के लिए सही समय पर टीके की सही खुराक आवश्यक है, इस से माँ और बच्चा दोनों सुरक्षित रहते हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र वेकसीन को रीफ़्रीजरेटर में सुरक्षित रखते हैं। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और मितानिन टीकों को जरूरतमंदों तक पहुंचाने में अहम रोल अदा करते हैं। स्टाफ नर्स और लैब सहायक गीता रानी ब्लाह अस्पताल ने यह बातें बताईं। इमूनाईज़ेशन कार्यक्रम को मोबाइल  से जोड़ा गया है इससे जरूरत तुरंत पूरी हो जाती है। यहां इलाज के लिए आई महिलाओं और उनके पतियोंसे बात करने पर पता चला कि वह लड़का या लड़की में अंतर नहीं करते। उनके रहते लिंगभेद-भावकीएक भी घटना सामने नहीं आयी, जिला कलेक्टर ने कहा। उन्होंने बताया कि स्मार्ट कार्ड योजना का भी यहाँ की औरतें लाभ उठा रही हैं। इस कार्ड की वजह से निजी अस्पतालों में सभी सुविधाएं मुफ्त में प्रदान होती हैं। कई के इस कार्ड का दुरुपयोग करने  की बात भी सामने आई है। एएनएम ब्लाह पूजा श्रीवास्तव ने बताया कि कम उम्र, कम लंबाई या अधिक उम्र की महिलाओं को डिलीवरी में परेशानी होती है।


यूनिसेफ और जिला प्रशासन साथ मिलकर सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेष तौर  पर महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार के लिए काम कर रहे हैं। इस समय 198 निजी डॉक्टर स्वैच्छिक तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं उनमें 137 स्त्री रोग विशेषज्ञ और 26 रेडयोलोजिसट  हैं। दिसंबर 2016 तक 1,15,611 गर्भवती महिलाएंप्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान से लाभ उठा चुकी हैं। स्वस्थ मां ही स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है। इस कदम से न केवल मातृ शिशु का स्वास्थ्य बेहतर होगा बल्कि देश को विकास की राह पर अग्रसर करने में भी सहायता मिलेगी।





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