25/09/2017


साहिबो !अब कुछ करिये, यह कंधे जनाज़े उठाते उठाते थक गए हैं

क़ासिम सय्यद

भोपाल सेंट्रल जेल से फरार आतंकवाद के आरोपियों के एनकाउंटर की खबर ने सबको हिलाकर रख दिया है। जहां मध्य प्रदेश सरकार देश को विनाश से बचाने के लिए अपनी पीठ थपथपारही है वहीं देश के विभिन्न क्षेत्रों से मुठभेड़ की सच्चाई पर सवाल उठाने वालों में मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने लानत भेजी है, जबकि केंद्र ने  आतंकवाद के मामले में एक आवाज होने की मांग की। बड़े सलीके से  मुठभेड़ की  वास्तविकता पर संदेह करने वालों की नीयत पर उंगली उठाकर उसे देश भक्ति से भी जोड़ दिया गया है।

 जिस तरह सर्जिकल स्ट्राइक  पर कुछ कहना देशद्रोही हो गया था.  अब ऐसे ही एनकाउंटर पर सवालिया निशान लगाने वालों के डीएनए की खोज के साथ उनको देश द्रोह  तक पहुंचा दिया गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री  अरविंद केजरीवाल ने इन भावनाओं को व्यक्त  करते हुए कहा है कि '' जो भी बोले, सवाल करे, न्याय मांगे वह देश का गद्दार है, यह मोदी राज है, फर्जी एनकाउंटर, फर्जी मामले, रोहित वेमुला,  के जी बंसल , गायब नजीब, दलितों पर अत्याचार, एबी वी पी की बदमाशी, आर एस एस, गोरक्षक  '' यही नहीं जो लोकतंत्र और विकास मॉडल की इस परिभाषा को न माने वह पाकिस्तान चला जाए। देश भक्ति का एक नमूना यह भी है कि पाकिस्तानी कलाकारों की फिल्म के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, मारने पीटने की धमकी मिले मगर जब 5 करोड़ रुपये देने  को फिल्म निर्माता राजी हो जाए तो सभी आपत्तियों खत्म, ऐसी देश भक्ति से कौन लोहा ले सकता है।


मुस्लिम पर्सनल लॉ पर जज़्बाती  नस  दबाकर सरकार ने एक दांव खेला, सर्जिकल स्ट्राइक  के बाद यह मुठभेड़ देश के वातावरण को उत्तर प्रदेश चुनाव में गर्म रखने के लिए पर्याप्त है, यानी आप पाकिस्तान के साथ हैं या भारत के और आप आतंकवादियों के खिलाफ हैं या सरकार के , अब हर सवाल करने पर उन से पूछा जाने लगा है। भाजपा के हारने का मतलब यह है कि पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे। इसका अर्थ बताने की जरूरत नहीं। अब एक बात बिल्कुल साफ है आप मारे जाएं तो विरोध न करें वरना  आप की देशभक्ति संदिग्ध, इसका दायरा बढ़ता जा रहा है। मुठभेड़ पर सवाल उठाना आतंकवाद का समर्थन करना है।

मानवाधिकार आयोग ने भी सरकार से रिपोर्ट मांगी है। कल अगर सुप्रीम कोर्ट भी खुद ही  नोटिस ले ले तो उसे किस श्रेणी में रखा जाएगा। हालांकि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया कह चुके हैं कि क्या आप चाहते हैं कि अदालत में ताला लगा दिया जाए। इसका संकेत बहुत साफ है कि न्यायपालिका में बैठे लोग भी किसी खतरे की आहट महसूस कर रहे हैं। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि इस मुठभेड़ की जांच नहीं कराएगी हालांकि विश्वास का संकट हो तो जांच अति आवश्यक हो   जाती है। यह सरकार की मोरल अथॉरिटी  का भी सवाल है। आतंकवादी मारे जाएं, उन्हें इबरत नाक सजा मिले,उन्हें निशाने  इबरत बना दिया जाए, यह कौन नहीं चाहेगा, लेकिन न्याय और कानून के दायरे में। यही हमारे देश के लोकतंत्र की खूबी है कि वह 26/11 के आरोपी को भी सभी संवैधानिक व कानूनी अधिकार प्रदान करती है, फिर सजा देती है।

सरकार के हाथ संविधान और कानून से बंधे होते हैं।सवाल यह है कि ऐसे हालात में क्या चुप रहें, होंठ सी लें बयान देकरचुप बैठ जाएं, सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः   नोटिस लेने का इंतजार या एकऔर कॉन्फ्रेंस  इस विषय पर कर  लें। इसमें कुछ ठन्डे  और कुछ गर्म भाषण हों , एक दो प्रस्ताव पारित कर लें, सरकार को वार्निंग   दें, आगे ऐसी घटनाओं को न दोहराने की  नसीहत दें और बस।यह कभी अख़लाक़ , कभी मिनहाज अंसारी, कभी कथित गो तस्करों  को पेशाब पीने व गोबर खाने पर मजबूर करने, यह लव जिहाद , घर वापसी, नजीब की रहस्यमय गुमशुदगी और फिर यह मुठभेड़ एक श्रृंखला है आप की हैसियत और अवक़ात  बताने की। पिछले दिनों एक बदमाश को पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया था, उसके खिलाफ इतना माहौल बना कि गृहमंत्री ने स्पेशल सेल को ही भंग कर दिया।तब किसी ने पुलिस का मोरल गिरने और एंकाउंटर पर सवाल उठाने को देशद्रोह से  नहीं जोड़ा , लेकिन हमारी राजनीतिक हैसियत  शून्य, मुस्लिम संगठनों  की स्थिति ज़ीरो, मुस्लिम नेताओं की अनसुनी यहां तक ​​बढ़ गई कि जब तेलंगाना एनकाउंटर पर केवल फड़फड़ाकर रह गए तो उनके हौसलों को बल मिला जो  अल्पसंख्यकों, दलितों को दबाकर रखना चाहते हैं।हम संतुष्ट हैं कि हमारी दुकानें आबाद  हैं, हमारा  कारोबार फायदे  में है, हमें अपने बिखरने, टूटने की इतनी चिंता नहीं जितनी धर्मनिरपेक्ष लोगों के बिखरने की है।

हम यह क्यों न कहें कि ऐसी स्थिति में जब एक एक करके शिकार किया जा रहा है, मुस्लिमसंगठनों  और मुस्लिम नेतृत्व के होने के क्या मायने हैं, जिन्हें मुसलमान अपने कंधों पर बिठाता है, जान-माल न्योछावर  करता है, एक आवाज़ पर खड़ा हो जाता है और  उनके क़दमों की  धूल अपने सिर में डालने को गर्व समझता है। बदले में उसे क्या मिलता है, बस ताबेदारी। क्या हमारे सवाल को  भी अपमान, नाफरमानी , जबान दराज़ी  कहकर ठुकरा दिया जाएगा। खुद  के लिए कुछ करिये  हमारा जो हश्र होता है उसकी परवाह नहींलेकिन बचेगा कोई नहीं। किसी पर कोई आरोप लगाकर कठघरे में खड़ा करना सरकार के लिए मुश्किल नहीं है, जाकिर नाइक का उदाहरण सामने है।

अब कुछ करिये , यह कंधे जनाज़े उठाते उठाते थक गए हैं । क्या वह समय नहीं आया कि सब कुछ भूल कर  मसलकी दीवारें लाँघ कर  अपने अपने  दायरे से निकल कर एक मेज पर बैठ कर सोचें और बताएंकि हम क्या करें, बड़ी मेहरबानी  होगी।

यह लेख  दिल्ली से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र "रोज़नामा खबरें" के चीफ एडिटर क़ासिम सय्यद का है

 qasimsyed2008@gmail.com





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