हकीम लुक़मान (रहमतुल्लाह अलैह) और उनकी क़ीमती नसीहतें

डाक्टर मुहम्मद नजीब क़ासमी

Asia Times Desk

हकीम लुक़मान (रहमतुल्लाह अलैह) का नाम तो बचपन से सुनते चले आ रहे हैं, क्योंकि अल्लाह तआला ने उनके नाम से क़ुरान करीम में एक सूरत नाज़िल फरमाई है। जिसकी क़यामत तक तिलावत होती रहेगी इंशाअल्लाह। लेकिन बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि हज़रत लुक़मान कौन थे। अल्लाह तआला ने उनके नसब, खानदान और ज़माना के बारे में तो अपने कलाम पाक में कोई ज़िक्र नहीं किया, लेकिन उनके हकीमाना अकवाल (बातें) का ज़िक्र फरमाया है। पुरानी तारिख (इतिहास) इस बात की गवाही देती है कि इस नाम का एक शख्स सरज़मीन अरब पर मौजूद था, लेकिन उनकी शख्सियत और नसब के बारे में इख्तिलाफ पाया जाता है। एक रिवायत के मुताबिक वह हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम के भांजे या खालाज़ाद भाई, जबकि दूसरी रिवायत से हज़रत दाउद अलैहिस्सलाम के हमज़माना मालूम होते है।

अकसर तारीखदाँ (इतिहासकार) की राय है कि हकीम लुक़मान अफरिकी नसल थे और अरब में उनकी आम्द (आगमन) बहैसियत गुलाम हुई थी। उलमा का कहना है कि हकीम लुक़मान नबी नहीं थे और न उन पर वही नाज़िल हुई, क्योंकि क़ुरान और हदीस में किसी भी जगह कोई एसा इशारा मौजूद नहीं है जो हकीम लुक़मान के नबी या रसूल होने पर दलालत करता हो। गरज़ ये कि अल्लाह तआला ने हकीम लुक़मान को नबूवत अता नहीं की मगर हिकमत और दानाई अता फरमाई। रिवायात में आता है कि आप सूरत और शकल के एतेबार से अच्छे नहीं थे, जैसा कि मशहूर ताबई हज़रत सईद बिन मुसैयिब(रमतुल्लाह अलैह) ने एक हबशी से कहा था कि तु इस बात से दिलगीर न हो कि तु काला हबशी है, इसलिए कि हबशियों में तीन आदमी दुनिया के बेहतरीन इंसान हुए हैं। हज़रत बिलाल हबशी (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत ऊमर फारूक (रज़ियल्लाहु अन्हु) का गुलाम मेहजा और हकीम लुक़मान (रहमतुल्लाह अलैह)। गरज़ ये कि हकीम लुक़मान के हालाते ज़िन्दगी और ज़माना में इख्तिलाफ के बावजूद पूरी दुनिया उनको एक मशहूर शख्सियत तसलीम करती है। जाहेलियत के चंद कवियों ने भी इनका तजकिरा किया है।

अल्लाह तआला ने सूरह लुक़मान में हज़रत लुक़मान की उन क़ीमती नसीहतों का ज़िक्र फरमाया है जो उन्होंने अपने बेटे को मुखातब करके बयान फरमाई थीं। यह हकीमाना अक़वाल अल्लाह तआला ने इसलिए क़ुरान करीम में नक़ल किए हैं ताकि क़यामत तक आने वाले इंसान उनसे फायदा उठाकर अपनी ज़िन्दगी को खूब से खूबतर बना सकें और एक अच्छा मुआशरा (समाज) वजूद में आसके।

पहली नसीहतशिर्क से दूरी

सबसे पहली हिकमत अक़ाएद की दुरूस्तगी के बारे में है। ऐ मेरे बेटे! अल्लाह के साथ शिर्क न करना, यक़ीन जानो शिर्क बहुत बड़ा ज़ुल्म है। यानी अल्लाह तआला ही पूरी कायनात का खालिक़, मालिक और राज़िक़ है और उसके साथ किसी को शरीके इबादत न करना। इस दुनिया में इससे बड़ा ज़ुल्म नहीं हो सकता कि अल्लाह तआला की किसी मखलूक को उसके बराबर ठहराया जाए। यही वह पैगाम है जिसकी दावत तमाम अम्बिया और रसूल ने दी कि माबूदे हक़ीक़ी सिर्फ और सिर्फ अल्लाह तआला है, वही पैदा करने वाला, वही रिज़्क़ देने वाला और पूरी दुनिया के निज़ाम को तनहा वही चलाने वाला है, उसका कोई शरीक नहीं है। हम सब उसके बन्दे हैं और हमें सिर्फ उसी की इबादत करनी चाहिए। वही जरूरतों को पूरा करने वाला है।

दूसरी नसीहतअल्लाह का इल्म हर चीज़ को मुहीत (शामिल) है

हकीम लुक़मान की दूसरी नसीहत अपने बेटे को यह थी कि इस बात का यक़ीन रखा जाए कि आसमान व ज़मीन और उसके अन्दर जो कुछ है उसके एक एक ज़र्रा से अल्लाह तआला अच्छी तरह वाकिफ (परिचित) है, कोई चीज़ भी उससे पोशीदा (छिपी) नहीं है और इसपर उसकी कुदरत भी कामिल है। कोई चीज़ कितनी भी छोटी से छोटी हो जो आम नज़रों में न आसकती हो, इसी तरह कोई चीज़ कितनी ही दूर दराज़ पर हो, इसी तरह कोई चीज़ कितने ही अंधेरों और पर्दा में हो अल्लाह तआला के इल्म व नज़र से नहीं छुप सकती। गरज़ ये कि हम दुनिया के किसी भी मैदान में हों, तिजारत कर रहे हों, दरस व तदरीस की खिदमात अंजाम दे रहे हों, मुलाज़मत कर रहे हों, क़ौम व मिल्लत की खिदमत कर रहे हों, लेकिन हमें हमारे माँ बाप और कायनात को पैदा करने वाला हमारी ज़िन्दगी के एक एक लमहे से पूरी तरह वाक़िफ (परिचित) है और हमें मरने के बाद उसके सामने खड़े होकर ज़िन्दगी के एक एक पल का हिसाब देना है। अगर हमने किसी से छुपकर रिश्वत ली है या किसी शख्स पर ज़ुल्म किया है या किसी गरीब को सताया है या किसी का हक मारा है तो मुमकिन है कि हम दुनिया वालों से बच जाएं लेकिन अल्लाह तआला की अदालत में अंधेर नहीं है और हमें इसका जरूर हिसाब देना होगा।

तीसरी नसीहतनमाज़ पढ़ना

हकीम लुक़मान ने अपने बेटे को नसीहत करते हुए यह भी फरमाया, बेटे नमाज़ कायम करो। नमाज़ ईमान के बाद इस्लाम का अहम तरीन रूकन (स्तंभ) है। नमाज़ खुद अहम होने के साथ वह दूसरे आमाल की दुरूस्तगी का ज़रिया भी है जैसा कि अल्लाह का इरशाद है, ‘‘जो किताब आप पर उतारी गई है उसे पढि़ए और नमाज़ कायम कीजिएयक़ीनन नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है” (सूरह अलअनकबूत 45) नमाज़ में अल्लाह तआला ने यह खासियत और तासीर रखी है कि वह नमाज़ी को गुनाहों और बुराईयों से रोक देती है मगर ज़रूरी है कि उसपर पाबन्दी से अमल किया जाए और नमाज़ को उन शराएत और आदाब के साथ पढ़ा जाए जो नमाज़ की क़बूलियत के लिए ज़रूरी हैं, जैसा कि हदीस में है कि एक शख्स नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में आया और कहा कि एक शख्स रातों को नमाज़ पढ़ता है मगर दिन में चोरी करता है तो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि उसकी नमाज़ अनक़रीब उसको बुरे काम से रोक देगी (मुसनद अहमदसही इब्ने हिब्बान) लिहाज़ा हमें नमाज़ों का इहतिमाम करना चाहिए।

चौथी नसीहतइसलाहे मुआशरा (समाज) के लिए कोशिश करना

हकीम लुक़मान अपने बेटे को नसीहत करते हुए आगे फरमाते हैं, अच्छी बातों का हुकुम करो और बुरी बातों से रोको। यानी अपनी ज़ात से अल्लाह और उसके रसूल की इताअत के साथ मुआशरा (समाज) की इसलाह की कोशिश करते रहना यानी इस बात की फिक्र करना कि सारे इंसान अल्लाह को मान कर, अल्लाह की मान कर ज़िन्दगी गुजारने वाले बन जाएं। अमर बिल मारूफ और नही अनिल मुंकर (अच्छाईयों का हुकुम करना और बुराईयों से रोकना) की जिम्मेदारी को अल्लाह तआला ने क़ुरान पाक में बार बार बयान किया है। सूरह तौबह की आयत नं॰ 71 में अल्लाह तआला ने बयान किया है कि “इमान वाले मर्द और इमान वाली औरतें एक दूसरे के मुआविन व मददगार हैं” उनके चार औसाफ ये हैं कि वह अच्छाइयों का हुकुम करते हैं और बुराइयों से रोकते हैंनमाज़ क़ायम करते हैंज़कात अदा करते हैअल्लाह और उसके रसूल की इताअत करते हैं। यानी जिस तरह हर मोमिन पर अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करना, नमाज़ कायम करना और ज़कात अदा करना (अगर माल पर ज़कात फर्ज है) ज़रूरी है, इसी तरह अच्छाईयों का हुकुम करना और बुराईयों से रोकना हर ईमान वाले के लिए ज़रूरी है,अगरचे हर शख्स इस्तिताअत के मुताबिक़ ही अमर बिल मारूफ और नही अनिल मुंकर का मुकल्लफ है।

पांचवीं नसीहतहालात पर सब्र करना

अपने साथ दूसरों की इसलाह की कोशिश करना एसा अमल है कि उसकी पाबंदी में खासी मशक़्क़त बर्दाशत करनी पड़ती है। उस पर साबित क़दम रहना आसान नहीं है खासकर अमर बिल मारूफ और नही अनिल मुंकर (अच्छाईयों का हुकुम करना और बुराईयों से रोकना) की खिदमत का सिला दुनिया में उमूमन अदावतों और मुखालिफतों से मिलता है, इसलिए हकीम लुक़मान ने इसके साथ यह भी वसीयत फरमाई कि दीन पर चलने और इसको दूसरों तक पहुचाने में जो मुश्किलात सामने आएं उन पर सब्र करें, जैसा कि सूरह अलअसर में अल्लाह तआला जमाने की कसम खाकर इरशाद फरमाता है कि “तमाम इंसान खसारे और नुकसान में है मगर वह लोग जो अपने अन्दर चार सिफात पैदा करलें।” इमान लाएं, नेक आमाल करें, महज़ अपनी इसलाह पर किनाअत न करें बल्कि उम्मत के तमाम अफराद की भी कामयाबी की फिक्र करें। दीन पर चलने और इसको दूसरों तक पहुचाने में जो मुश्किलात आएं उन पर सब्र करें।

हकीम लुक़मान की चन्द दूसरी नसीहतें आदाबमुआशरत (समाज) के मुतअल्लिक

हकीम लुक़मान अपने बेटे को नसीहत करते हुए फरमाते हैं: लोगों के सामने (तकब्बुर से) अपने गाल मत फैलाओ। यानी लोगों से मुलाकात और उनसे गुफतगू के वक्त उनसे मुंह फेर कर बात न करो जो उनसे एराज करने और तकब्बुर करने की अलामत और अखलाके शरीफाना के खिलाफ है। अल्लाह तआला अपने नबी के मुतअल्लिक क़ुरान पाक (सूरह अल कलम 4) में इरशाद फरमाता है ‘‘और यक़ीनन तुम अखलाक के आला दर्जा पर हो।” हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अखलाक के मुतअल्लिक सवाल किया गया तो हज़रत आइशा ने फरमाया आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अखलाक क़ुरानी तालीमात के एैन मुताबिक था (बुखारी, मुस्लिम)। गरज़ ये कि हकीम लुक़मान की अपने बेटे की नसीहत को अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम में ज़िक्र करके पूरी इंसानियत को यह पैगाम दिया कि तमाम इंसानों के साथ अच्छे अखलाक पेश करने चाहिए। और साथ में यह भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो बन्दा दरगुजर करता है अल्लाह तआला उसकी इज्ज़त बढ़ाता है और जो बन्दा अल्लाह के लिए आजज़ी इखतियार करता है अल्लाह तआला उसका दर्जा बुलंद करता है। (मुस्लिम)

हकीम लुक़मान अपने बेटे को नसीहत करते हुए फरमाते हैं कि ज़मीन पर इतराते हुए मत चलो। यानी तुम ज़मीन से पैदा हुए, इसी पर चलते फिरते हो, अपनी हक़ीक़त को पहचानो, इतराकर न चलो जो काफिरों का तरीक़ा है। इसके बाद अल्लाह तआला फरमाता है यक़ीन जानो अल्लाह किसी इतराने वाले शैखी बाज़ को पसंद नहीं करता। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिस शख्स के दिल में ज़र्रा बराबर भी तकब्बुर होगा वह जन्नत में नहीं जाएगा। एक शख्स ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह! आदमी चाहता है कि उसका कपड़ा अच्छा हो और जूता अच्छा हो। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अल्लाह तआला जमील है, जमाल को पसंद करता है। किब्र और गुरूर तो हक को नाहक करना और लोगों को छोटा समझना है। (मुस्लिमयानी अपनी वुसअत के मुताबिक अच्छा कपड़ा पहनना किब्र और गुरूर नहीं बल्कि लोगों को हकीर (छोटा) समझना तकब्बुर और गुरूर है।

हकीम लुक़मान अपने बेटे को नसीहत करते हुए फरमाते हैं ‘‘और अपनी चाल में मयाना रवी इखतियार करो” यानी इंसान को दरमियानी रफतार से चलना चाहिए, रफतार न इतनी तेज़ हो कि भागने के करीब पहुंच जाए और न इतनी आहिस्ता कि सुस्ती में दाखिल हो जाए। यहां तक कि अगर कोई शख्स जमाअत की नमाज़ को हासिल करने के लिए जा रहा हो तो उसको भी हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भागने से मना फरमा कर इतमिनान व सुकून के साथ चलने की ताकीद फरमाई है।

हकीम लुक़मान की अपने बेटे को एक और अहम नसीहत ‘‘अपनी आवाज़ आहिस्ता रखो” आहिस्ता से मुराद यह नहीं कि इंसान इतना अहिस्ता बोले कि सुनने वाले को दिक्कत पेश आए बल्कि मुराद यह है कि जिनको सुनाना मकसूद है, उन तक आवाज़ वज़ाहत के साथ पहुंच जाए लेकिन इससे ज्यादा चीख चीख कर बोलना इस्लामी आदाब के खिलाफ है। गरज़ ये कि हमें इतनी ही आवाज़ बुलंद करनी चाहिए जितनी उसके मुखातिबों को सुनने और समझने के लिए ज़रूरी है, ‘‘बेशक सबसे बुरी आवाज़ गधे की आवाज़ है।

आखिर में आदाबे मुआशरत से मुतअल्लिक चार नसीहतें ज़िक्र की गई। पहला ‘‘लोगों से गुफतगू और मुलकात में मुतकब्बिराना अंदाज से रूख फेर कर बात करने से मना किया गया है।” दूसरा ‘‘ज़मीन पर इतराकर चलने से मना किया गया है।” तीसरा ‘‘दरमयानी रफतार से चलने की हिदायत दी गई।” और चौथा ‘‘बहुत ज़ोर से शोर मचाकर बोलने से मना किया गया है।” इन तमाम ही नसीहतों का खुलासा यह है कि हर वक्त हम दूसरों का ख्याल रखें, किसी शख्स को भी चाहे वहमुसलमान हो या काफिर हम उसको जानते हों या न जानते हों लेकिन हमारी तरफ से कोई तकलीफ किसी भी इंसान को नहीं पहुंचनी चाहिए। मगर हम इन उमूर में कोताही से काम लेते हैं, हालांकि इन उमूर का तअल्लूक हुक़ूक़ुल इबाद से है और हुक़ूक़ुल इबाद में हक तलफी इंसान के बड़े बड़े नेक आमाल को खत्म कर देगी। लिहाज़ा हमें चाहिए कि हम हकीम लुक़मान(रहमतुल्लाह अलैह) की इन क़ीमती नसीहतों पर अमल करके एक अच्छे मुआशारा (समाज) की तशकील दें।

 (www.najeebqasmi.com)    

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