गुलामी और शासन सिर्फ और सिर्फ दिमाग का खेल

भारत है जो कभी दुनिया का पेट भरता था आज खुद भूख से बिलख रहा है

एशिया टाइम्स

चाय पे चर्चा: भारत इतिहासिक तौर पर दुनिया के बेहतरीन मुल्कों में शामिल देश है। एक वक़्त था जब दुनिया का अगुआ और सोने की चिड़िया कहलाता था भारत। पहले दुनिया भर की नजरें भारत पर रहती थी। फिर धीरे धीरे समय बदला और हम 18वीं सदी 19वीं सदी फिर 20वीं सदी में आये।

भारत की आबादी भी बहुत तेजी से बढ़ी और गरीबी भी। आज भी भारत की आधी आबादी दो वक़्त की रोटी के लिए तरस रही है।

ये वही भारत है जो कभी दुनिया का पेट भरता था आज खुद भूख से बिलख रहा है।

दुनिया का शासक रहा भारत अभी तक बुनियादी सुविधाओं को ले कर ही परेशान है दुनिया की अगुआई तो बहुत दूर है।

मगर इतना सब हुआ कैसे?

सीधा सा जवाब है कई सालों में भारतवासिओं को दिमागी तौर पर शासक वर्ग द्वारा बहुत पीछे धकेल दिया गया है। भारत की परेशानियों की अहम वजह बढ़ती आबादी और रिसोर्स की कमी नही बल्कि हमारा दिमागी पिछड़ापन है। जिस दिन हम शासक की तरह सोचेंगे यकीनन इस दिन हमारे और हमारे देश भारत दोनों के दिन बदल जाएंगे।

मगर अब ये सब होगा कैसे?

सीधा जवाब है दो लफ़्ज़ों में समाज सेवा| मगर वो समाज सेवा नहीं जो हमारे दिमाग में है कि कुछ पैसे निकालो और गरीबों के पास जाओ और दे आओ और हो गयी आप की मुक्ति और मिल गया जन्नत में आला मुकाम।

किसी गरीब को कुछ समान दे देना उसका भला नहीं कर सकता बल्कि उसे और गरीब बनायेगा क्यूंकि फिर वो कभी भी आगे बढ़ने का नही सोचेगा हमेशा उसी में खुश रहेगा। और अपने हाल को कोसने की बजाये कहेगा ये हाल यूँ ही बरकरार रहे क्यूंकि लोग खुद आएंगे और मुझे दे के जाएंगे।

ये सोच भारत को और पीछे बेइंतेहा पीछे ले के जाएगी।

असली समाज सेवक जो समाज में तब्दीली लाना चाहते हैं न कि वो जो सिर्फ होर्डिंग्स तक सीमित हैं उनसे मुखातिब हो कि मैं ये कहना चाहता हूं कि समाज के नव निर्माण के लिए जरुरी है पुख्ता काम करें ऐसा पुख्ता काम जो इस देश को बहुत आगे ले जाये उस मुकाम तक जो कभी भारत का हुआ करता था|

“सितारों से आगे जहाँ और भी है”

समाज सेवा सिर्फ लोगों को देना लेना ही नही होता है लोगों की दिमागी लेवल को आगे बढ़ाना भी होता है| करोड़ों हम लोग कम्बल राशन बांटने में खर्च कर देते हैं मगर हजारों भी लोगों को दिमागी तौर पर ऊपर उठाने के लिए खर्च नहीं करते|

दिमागी तोर पर पिछड़ापन इस देश की तरक्की में बड़ी रुकावट है|

मैं बहुत सारे तुर्क लोगों से मिला हूँ वो बेचारे चाहे सड़क पर झाड़ू ही क्यूँ न लगातें हों मगर उनका ज़ज्बा हमेशा शासक की तरह ही होता है कोई पूछ ले तो कहते है हम उस्मानिया खिलाफत के वंशज हैं जिसने पूरी दुनिया पर राज किया है|

ये फर्क सोच का है जब आप खुद को गुलाम बना कर ही रखेंगे तो शासन का ख्याल कहाँ से आयेगा|

सबसे बड़ा समाज कल्याण तो ये है की एक गरीब को इतना होंसला दिया जाए कि वो इंसान खुद अपनी तक़दीर को बदलने के लिए कोशिश करे और अपनी नई किस्मत लिखे|

“तू शाहीन है परवाज़ है काम तेरा, तेरे सामने आसमां और भी है”  (अल्लामा इकबाल)

 

लेखक: अनसर इमरान

 

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